शशिकांत गुप्ते
आज सीतारामजी बहुत ही गंभीर विषय पर विचार कर रहे हैं। वैचारिक क्रांति के लिए पहल कैसी की जाए?
मैने कहा आप व्यंग्यकार हो,व्यंग्य लिखना ही तो वैचारिक क्रांति है।
सीतारामजी ने कहा जितने प्रयास वैचारिक क्रांति के लिए किए जा रहें हैं उससे कई गुणा अधिक भ्रांति फैलाने वाले सक्रिय हो रहें हैं। भ्रांति फैलाने वाले आमजन के मानस में सक्रियता पैदा करने बजाए निष्क्रियता का संचार कर रहें हैं। कारण भ्रांति फैलाने वालों के लिए संचार माध्यम भी सहयोगी हैं?
कहावत है झूठ के पांव नहीं होते हैं। इसीलिए भ्रांति फैलाने वालों के लिए शायर अख़्तर नज़मी
का यह शेर एकदम सटीक है।
वो ज़हर देता तो सब की निगाह में आ जाता
सो ये किया कि मुझे वक्त पे दवाएँ न दीं
इस शेर से यह स्पष्ट हो जाता है कि, साहित्य समाज का दर्पण है।
सन 1975 में जब घोषित आपातकाल लगा हुआ था,तब प्रख्यात कवि स्व.बाल कवि बैरागीजी ने सार्वजनिक मंच से आपातकाल के विरुद्ध गीत सुनाया था। सर्वविदित है के बाल कवि राजनीति में सक्रिय थे,वे मंत्री भी बने थे।
बाल कवि का यह गीत बहुत प्रसिद्ध हुआ था।
इस गीत में अन्याय के विरुद्ध आव्हान है। तानाशाही के विरुद्ध जन चेतना है।
गीत के कुछ बंद प्रस्तुत है।
हर कोयल को हक आता है,अपने सुर में गाने का
हर कोंपल को हक आता है, अम्बर तक उठ जाने का
हर पीढ़ी को पूरा हक है,अपने सपन सजाने का
अंगारों को पूरा हक है, जलने और जलाने का
बेशक आग लगाओ रे अंगारों,मावस के गलियारों में
देखो आज लगा मत देना,पूनम के पखावरों में
जिन कांटों ने घाव दिए हों,उनसे दो दो हाथ करो
उनसे उनकी ही भाषा में,खुलकर सीधी बात करो
इस बिजली पर खूब सोच लो, जिसने रंग बिगाड़े हों
उन भंवरो के पंख नोच लो, जिनने बाग उजड़े हों
इस माली को माफी मत दो,जिसने गंध चुराई हो
जिसके होते हर क्यारी में नागफनी उग आई हो
माली को परखा जाता है,बेमौसम पतझारों में
देखो आग लगा मत देना…..
गीत की कुछ पंक्तियां ही प्रस्तुत की है। गीत तो बहुत ही बड़ा है।
इतना सब सुनने पढ़ने के बाद भी गलती होने का कारण निम्न शेर में मौजूद है।
चमन के रंग-ओ-बू ने इस क़दर धोका दिया मुझ को
कि मैं ने शौक़-ए-गुल-बोसी में काँटों पर ज़बाँ रख दी
शायर अख़्तर होशियारपुरी
शशिकांत गुप्ते इंदौर





