अग्नि आलोक
script async src="https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-1446391598414083" crossorigin="anonymous">

सुधारवाद और क्रांतिकारी विचार के बीच फर्क किये बिना चिंतको को समझना  असम्भव

Share

जेपी नरेला

आज शोषित वर्ग में बहुत सारे भ्रम दिखाई पड़ रहे है । हमारे देश मे बहुत सारे चिंतक मौजूद है ।अलग अलग चिंतको के अनुयायी भी मौजूद है । अपने एकांगी दृष्टिकोन से ये अनुयायी पूरी दुनिया को नापते रहते है । वे  समझते है,कि जितना ज्ञान उनके पास है ।उतना ही सम्पूर्ण सम्पूर्ण ब्रह्मांड है ।उनसे ज्यादा सूचनाये और ज्ञान  किसी के पास नही है ।

मेरी राय है ,कि जितना हम जान और समझ पाए है ,वह बहुत कम है ,इसलिए अपने दिमाग की खिड़की हमेशा खुली रखनी चाहिए और सच्चाई की तलाश जारी रखनी चाहिए ,बेशक किसी भी विचार को आँख मूंदकर नही स्वीकारा जा सकता हूं ,उसको प्रमाणिकता की कसौटी पर कसना होगा ।

समाज मे मुख्यत: तीन तरह के महा पुरुष और चिंतक मौजूद रहे है एक, प्रतिक्रियावादी ।दो, सुधारवादी । तीन , क्रांतिकारी ।

अगर हमारे पास तीनो में अंतर करने का दृष्टिकोण विकसित नही हुआ है , तो फिर हमें और ज्यादा चीजो को समझने की जरूरत है ।ज्यादातर ज्यादातर कन्फ्यूजन यहीं से शुरू होता है । सुधारवाद, प्रतिक्रियावाद और क्रांतिकारी विचारों के बीच की बहसों से इतिहास भरा पड़ा है और आज भी जारी है ।

विषय वस्तु के सम्बंध मैं आज कल चल रही अम्बेडकर औऱ मार्क्सवाद के विचारों के बीच की बहस की तरफ आपका ध्यान आकर्षित करना चाहूंगा। कई देश के छद्म क्रांतिकारियों ने लाल और नीले के बीच के भेद को भी धूमिल करने का प्रयास किया है । 

 तीन कसौटियों पर तय किया जा सकता है । एक दर्शनशास्त्र ।दूसरा, अर्थशास्त्र ।तीसरा ,वैज्ञानिक समाजवाद।

द्वंद्वात्मक ऐतिहासिक भौतिकवाद प्रकृति और समाज को देखने का वैश्विक दृश्टिकोण है ,जो प्रकृति और समाज के विकास और पतन के नियमो को पहचानता है । यह मार्क्सवादी दर्शन है । दूसरा, अध्यात्मक वादी दृस्टि कोण है । यह दोनों दृश्टिकोण दुनिया को देखने के अलग अलग चश्मे है ।

वैसे तो मैंने डॉ आंबेडकर की दर्शन शास्त्र में कोई राइटिंग देखी नही है , अगर कंही लिखा है तो मैं उसको पढ़ना और समझना चाहूंगा, लेकिन जैसे उनकी जाति के सवाल पर पोजीशन है, कि मिथकों को हटा देने या उनका निषेध कर लेने से जाति व्यवस्था समाप्त हो जाएगी, मिथकों का भौतिक आधार को वे नजरअंदाज कर देते है । यानी मूलाधार औऱ अधिरचना में डॉ भीमराव   जड़ को छोड़कर तने को काटने का रास्ता बता रहे है , इससे इनके विचारों का प्रचार प्रसार तो हुआ ,अपने अधिकारों के प्रति एक हिस्सा जागरूक भी हुआ, एक हिस्सा लाभान्वित भी हुआ ,,लेकिन बहुसंख्यक हिस्सा आज भी जातिवाद औऱ गरीबी का शिकार है यानी ,मिथक औऱ जाति आज भी मजबूती से बरकरार है । इस तरह से यह चीजो को यह देखने और समझने का दर्शन शास्त्र कौनसा है। मैं तो यह कह सकता हु कि यह द्वंद्वात्मक ऐतिहासिक भौतिकवाद के दर्शन का तो निषेध है ।और दूसरा वैश्विक दर्शन अध्यात्मक वाद है , बीच का कोई रास्ता है नही, तो आप तय कर लीजिए कि डॉ साहब कहा खड़े थे ।

डॉ साहब ने अर्थ व्यवस्था के सम्बंध में जो उपाय सुझाया वह उनके 1946 के ज्ञापन से पता चलता है । उन्होंने कहा कि उद्योगों और जमीन का राष्ट्रीयकरण कर देना चाहिए। जो ड्राफ्ट संविधान में जोड़ा नही गया। कांग्रेस पार्टी के लिए इसको लागू करना संभव ही नही था । कांग्रेस इन्ही वर्गों का ही तो प्रतिनिधित्व करती थी। सामन्तोंऔऱ पूंजीपतियों का, इस प्रस्ताव को लागू करना कांग्रेस के लिए अपनी जड़ों पर कुल्हाड़ी मारने के बराबर था। हाँ यह तय है,कि डॉ साहब के प्रस्ताव को लागू कर दिया जाता तो सामन्तवाद जिस की जड़ में जाति है कि रीढ़ की हड्डी जरूर टूट जाति, उससे कोई आमूलचूल परिवर्तन तो नही होता ,लेकिन भारतीय समाज की पिक्चर जरूर बदल जाती ।

 डॉ साहब के राष्ट्रीयकरण के मेमोरंडम से उनका राजकीय समाजवाद की पिक्चर निकलती है । अंततोगत्वा वे भारत मे राजकीय समाजवाद की स्थापना चाहते थे । नतीजा , सत्ता पूंजीपतियों व जमींदारों के प्रतिनिधियों के हाथ मे रहे और जमीन औऱ उद्योग राज्य के अधीन कर दिए जाएं।यही राजकीय समाजवाद है । इसमें  व्यवस्था में शोषण को कैसे समाप्त किया जाएगा । यानी अतिरिक्त मूल्य को पैदा होने से कैसे रोका जाएगा। इस पर डॉ साहेब ने कोई उपाय नही सुझाया। 

 मार्क्स का समाजवाद वैज्ञानिक समाजवाद है ,जिसमे मजदूर वर्ग की प्रतिनिधि पार्टी के हाथ मे सत्ता होतो है । औऱ उद्योगों व जमीन को राज्य के अधीन लेने के बाद तमाम तरह के शोषण उत्पीडन पर भी    लगाम लगाती है । अतिरिक्त मुनाफे को पुनः समाज के विकास के हित मे लगाती है निजी पूंजी के उन्मूलन के साथ जाति के उन्मूलन की दिशा में ले जाती है ।

बुनियादी फर्क यही है अम्बेडकरवाद औऱ मार्क्सवाद में ,राजकीय समाजवाद और वैज्ञानिक समाजवाद में औऱ सुधारवाद औऱ क्रांतिकारी चिंतन में ।

*जेपी नरेला*

Ramswaroop Mantri

Recent posts

script async src="https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-1446391598414083" crossorigin="anonymous">

प्रमुख खबरें

चर्चित खबरें