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प्रासंगिक है साहिर…हम अम्न चाहते हैं मगर जुल्म के खिलाफ

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जंग तो खुद ही मसअला है* *जंग क्या मसअलों का हल देगी?

हरनाम सिंह

       रूस और यूक्रेन के मध्य जारी भीषण युद्ध ने इंसानी बिरादरी को संकट में डाल दिया है। युद्ध के परिणाम की भविष्यवाणियां भयावह है, डराने वाली है। वैश्वीकरण के वर्तमान समय में कोई भी युद्ध केवल लड़ने वाले देशों को ही नहीं अपितु सारी दुनिया की अवाम को प्रभावित करता है। विश्व में शांति प्रेमी, युद्ध विरोधी अपने देश के शासकों से युद्ध को लेकर कई सवाल पूछ रहे हैं। सोशल मीडिया पर युद्ध विरोधी कविताएं, व्यंग चित्र, मीम छाए हुए हैं। इनमें सर्वाधिक चर्चित है साहिर लुधियानवी ( जिनकी जन्म शताब्दी मनाई जा रही है ) की वह नज्म जो शांति और अमन चाहने वालों की प्रतिनिधि आवाज बन चुकी है।  इसी नगमे में साहिर सवाल उठाते हैं कि

जंग तो खुद ही मसअला है, जंग क्या मसअलों का हल देगी।
आग और खून आज बख्शेगी, भूख और एतियाज कल देगी।

वर्ष 1965 में भारत पाकिस्तान युद्ध पर लिखी उनकी यह नज्म इंसानियत के पक्ष में युद्ध विरोधी पहचान बना चुकी है। युद्ध के जरिए इंसानी खून बहाए जाने पर साहिर का मानना है कि

खून अपना हो या पराया हो, नस्ले अदम का खून है आखिर, जंग मगरिब में हो या मशरिक में,
अम्ने आलम का खून है आखिर।

शायर के अनुसार बम कहीं भी गिरे उसका असर इंसानी रुह पर और भूख के रूप में जिस्म पर होता है। आगे वे कहते हैं…
बम घरों में गिरे या सरहद पर, रुहे तामीर जख्म खाती है,
खेत अपने जले या औरों के,
जि
स्त फाकों से तिलमिलाती है

टैंक आगे बढ़े कि पीछे हटें, कोख धरती की बांझ होती है, फतेह का जश्न हो कि हार का सोग,
जिंदगी मय्यतों पे रोती है।

साहिर सवाल करते हैं कि- बरतरी के सबूत की खातिर,
खूं बहाना ही क्या जरुरी है,
घर की तारीकियां मिटाने को,
घर जलाना ही क्या जरुरी है?

साहिर कामना करते हैं
इसलिए ऐ शरीफ इंसानों, जंग टलती रहे तो बेहतर है, आप और हम सभी के आंगन में,
शमा जलती रहे तो बेहतर है।

दुनिया में मानवता के पक्षधर सदैव युद्ध और हिंसा का विरोध करते रहे हैं। साहिर भी उसी परंपरा के वाहक थे। लेकिन वर्गों में बंटी दुनिया जहां ताकतवर है कमजोर भी, शोषक है शोषित भी । जहां जुल्म करने वाले और जुल्म सहने वालों के बीच संघर्ष जारी हो, वहां शांति की बात करना इतना आसान नहीं है। इसी सामाजिक, राजनीतिक चेतना ने साहिर को बदल दिया। 1965 में जंग को मसला बताने वाले साहिर 1971 में बांग्लादेश की विभीषिका और वहां की अवाम पर हो रहे अत्याचारों को देख कर कह उठे कि

हम अमन चाहते हैं, मगर जुल्म के खिलाफ
गर जंग लाजमी है तो फिर जंग ही सही
जालिम को जो न रोके वो शामिल है जुल्म में,
कातिल को जो न टोके वह कातिल के साथ है।

साहिर युद्ध के जितना खिलाफ है उतना ही जुल्म के भी।वे जुल्म के सामने तटस्थ नहीं रह सकते। इसीलिए साहिर आव्हान करते हैं कि

आओ इस तीराबख्त दुनियां में
फिक्र की रोशनी को आम करें, अम्न को जिनसे तक्वियत पहुंचे,
ऐसी जंगों का एहतमाम करें

हरनाम सिंह

Ramswaroop Mantri

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