कुछ लोग
बैंक की लाइन में मर गए खड़े खड़े
कुसूर उनका था,
जोर नही था गर पैरों में
तो क्यों खड़े हुए
कुछ लोग पलायन में मर गए
रेलवे ट्रैक पर गडमड मिली उनकी रोटियां और बोटियाँ
कुसूर उनका ही था
रेलवे ट्रैक सुस्ताने की जगह थोड़े ही है,
कोई जिंदा बचा होता उनमे तो बताता
कि सुस्ताये नही थे वे
सामूहिक आत्महत्या थी वह
कुछ लोग मर गए सरकार से हक मांगते हुए
हक किस बात का
जब चुना है तो ईश्वर समझो उसे
ईश्वर पर विश्वास करो
अविश्वास में मरे वे सब
उनकी ही गलती थी
कुछ लोग महामारी में मर गए
उनका तो पक्का ही कुसूर था
जब फेफड़े नहीं झेलते महामारी
तो क्यों आये चपेट में
जनता जो जनार्दन थी
दनादन मानने लगी कि भूल उनकी ही थी
उन्होंने भूल मानी अपनी और ऑक्सीजन नही मांगी
उन्होंने भूल मानी अपनी और शांति से मर गए
उन्होंने भूल मानी अपनी
और चुपचाप बहा आये परिजन गंगा में
गंगा रोई
ईश्वर नही रोया
गंगा हैरत में थी
कि ईश्वर प्रलय चुन रहा है
ईश्वर मुतमईन था कि मर कर भी जनता
उसे ही ईश्वर मान रही है।
वीरेंदर भाटिया।।




