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जबलपुर कृषि विश्वविद्यालय ने खेती का अनूठा तरीका खोजा, पथरीली जमीन पर भी ले सकते हैं एक साथ 29 फसलें

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जबलपुर

पथरीली, जलभराव या उबड़-खाबड़ खेत में खेती करना क्या संभव है? शायद सभी का जवाब ना में होगा। पर ये संभव कर दिखाया है एमपी के सबसे बड़े कृषि विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों और शोधार्थी छात्रों ने। छोटे किसान अपनी बेकार पड़ी जमीन से भी हर हफ्ते कुछ न कुछ आमदनी कमा सकते हैं। जवाहर मॉडल से खेती कर कोई भी किसान आधा एकड़ क्षेत्रफल जगह में एक साथ 29 फसलें ले सकता है।  कैसे छोटे किसान अपनी बेकार आधे एकड़ जमीन में भी खेती करके 50 हजार रुपए तक मुनाफा कमा सकते हैं। आईए, जानते हैं एक्सपर्ट डॉक्टर मोनी थाॅमस ( मुख्य वैज्ञानिक, जवाहर लाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय) से कि बिना ट्रैक्टर और कम पानी में कैसे किसान मालामाल हो सकता है…

अरहर की आधे एकड़ में 600 बोरी लगी है। उसके बीच में व नीचे हल्दी लगाई है।

अरहर की आधे एकड़ में 600 बोरी लगी है। उसके बीच में व नीचे हल्दी लगाई है।

खेती का जवाहर मॉडल

ये मॉडल हमारे बच्चों के दिमाग की उपज है। 6 साल से वे रिसर्च कर रहे हैं। हर साल कुछ न कुछ नया कर रहे थे। तब जाकर एक मॉडल स्थापित हुआ है। इससे छोटे व सीमांत किसानों का आय दुगनी हो सकती है। पीएम का संकल्प था कि 2022 तक किसानों की आय दुगनी करना है। लेकिन इके लिए कोई मॉडल नहीं था। ये मॉडल सबसे गरीब किसान, जिसके पास बेकार से बेकार जमीन है, वो भी हर हफ्ते कुछ न कुछ आमदनी निकाल सकता है।

एक बोरी में 45 किलो मिट्‌टी व गोबर की खाद को 2-1 के अनुपात में डालते हैं।

एक बोरी में 45 किलो मिट्‌टी व गोबर की खाद को 2-1 के अनुपात में डालते हैं।

एक बोरी, मिट्‌टी और गोबर की खाद की पड़ती है जरूरत

जवाहर मॉडल में न तो अधिक पानी की जरूरत पड़ती है और न ही ट्रैक्टर से खेत की जुताई का झंझट रहता है। अच्छे खेत की भी जरूरत नहीं होती है। बस बोरी हो, हल्की मिट्‌टी और गोबर की खाद की जरूरत पड़ती है। अरहर के लिए एक बोरी में 45 किलो मिट्‌टी व गोबर की जरूरत पड़ती है। इसमें दो हिस्सा मिट्‌टी व एक हिस्सा गोबर का रखते हैं। साथ में विवि द्वारा विकसित बायो फर्टीलाइजर मिलाकर सीधे बीज की बुआई करते हैं। वहीं अन्य फसलों के लिए 15 से 20 किलो मिट्‌टी की एक बोरी में जरूरत पड़ती है।

जिला पंचायत और नाबार्ड अपनाने जा रहा ये मॉडल

जिला पंचायत के सहयोग से 615 महिला कृषकों ने इस मॉडल को अपनाया है। महिला कृषकों ने इसे अपनी बाड़ी में लगाया है। दरअसल ये महिला कृषकों को ध्यान में रखकर ही ये मॉडल विकसित किया गया है। पिछले दिनों नाबार्ड के जिला मैनेजर व चीफ मैनेजर आए थे। उन्होंने जवाहर मॉडल अपनाने और छोटे किसानों को लोन देकर इस तरह एमपी में खेती को प्रोत्साहित करने का संकल्प लिया है।

मार्केट में जब टमाटर के रेट होते हैं अधिक, तब मिलती है पैदावार।

मार्केट में जब टमाटर के रेट होते हैं अधिक, तब मिलती है पैदावार।

आमदन फसलों के चयन पर तय होगी

जवाहर मॉडल में एक साथ 29 फसलें बोई गई हैं। इस मॉडल को अपनाने वाले किसानों पर निर्भर करता है कि वह मिश्रित खेती में कौन सी फसल की बुआई करते हैं। इसी पर आमदनी तय होगा। हमने आधा एकड़ में 600 बोरी में अरहर की फसल लगाई है। एक पौधे से दो से ढ़ाई किलो अरहर पैदा होता है। अरहर के साथ ही हम दो बार पत्ती वाली धनिया की फसल लेते हैं। एक बार में 500 ग्राम धनिया की पत्ती तैयार होती है। तब मार्केट में धनिया की कीमत 200 रुपए होती है। साथ ही अरहर पर लाख का कीड़ा भी चढ़ाते हैं। नवंबर में चढ़ाते हैं और 8 महीने में एक पौधे से 350 ग्राम के लगभग लाख प्राप्त होता है। इसकी कीमत प्रति किलो 350 रुपए मार्केट में है। साथ ही एक पौधे से 5 किलो जलाऊ लकड़ी प्राप्त करते हैं।

अरहर के नीचे हल्दी व अदरक की फसल

अरहर के नीचे बोरी में ही हल्दी व अदरक की फसल लगाए हैं। एक बोरी में 50 ग्राम बीज लगता है और दो से ढाई किलो तक उपज छह महीने में तैयार हो जाता है। छांव में अदरक व हल्दी का उपज और अच्छा होता है।

बैगन के साथ पालक, तो टमाटर के साथ लौकी

जवाहर मॉडल में एक बोरी में दो फसल लेते हैं। जैसे बैगन के पौधे के साथ पालक या धनिया, टमाटर के साथ लौकी, मिर्ची के साथ करेला, मिर्ची, सेम के साथ गिलकी लगा देते हैं। अरहर के बीच में एक लाइन में पपीता लगा देते हैं। वहीं मेड़ पर प्लास्टिक के खाली बॉटल को उल्टा कर गेंदे का फूल लगा देते हैं। एक बोरी में चना, मटर, लहसुन, मेघायल का सरसो, कपास, पपीता लगाए हैं। साथ ही यहां 288 वर्गफीट में एक पाली हाउस भी बनाया गया है, इसमें खीरे की फसल लगाई गई है। जवाहर मॉडल में कुल 29 फसलें एक साथ लगाई गई है। उद्देश्य ये है कि किसान को हर हफ्ते किसी न किसी फसल से नकद आमदनी होती रहे।

डॉ. थॉमस के साथ छात्र भी रिसर्च कर रहे हैं।

डॉ. थॉमस के साथ छात्र भी रिसर्च कर रहे हैं।

बाद में किसी खाद की जरूरत नहीं

बोरी में पौधे लगाने का सबसे बड़ा फायदा ये है कि इसमें बीज की मात्रा कम लगती है। बोरी में मिट्‌टी व गोबर के साथ बाॅयो फर्टीलाइजर शुरू में ही मिला देते हैं। बाद में किसी और खाद की जरूरत नहीं पड़ती है। पौधे को जरूरत के अनुसार पोषक तत्व मिलते रहते हैं। यदि पौधे जमीन में लगाते हैं और खाद डालते हैं तो वो मिट्‌टी के नीचे चली जाती है। बोरी में जो खाद है वो मिट्‌टी में रहती है और जड़ों के पहुंच में रहती है। खाद पौधा खींच लेता है और बेहतरीन उत्पाद देता है।

पर ड्राप मोर कॉप

जवाहर मॉडल वॉटर बजट को भी कम कर देता है। प्रयास रहता है कि एक-एक बूंद से हम कितनी उपज निकाल सकते हैं। अरहर के पौधों को 6 फीट तो हल्दी की बोरी की दूरी तीन फीट रखते हैं। अन्य फसल एक फीट तो कुछ को सटाकर भी रखते हैं। इस मिश्रित खेती का लाभ ये है कि यहां 25 तरह के पक्षी आ रहे हैं। पूरे विवि कैम्पस में एक जगह इतने पक्षी नहीं मिलेंगे।

बोरी और गमले में क्या अंतर है?

मुख्य उद्देश्य ये है कि खेती की लागत कम-कम से होगी, तो किसानों को इससे फायदा अधिक होगा। एक बोरी डेढ़ से दो साल चल सकती है। पर इतना बड़ा गमला लेंगे तो 100 रुपए का मिलेगा। बोरी में हवा का आना-जाना अच्छा होता है। इससे जड़ों का विकास होता है। यदि किसी पौधे में जड़ गलन का रोग लग गया तो, वह एक बोरी में ही सीमित रहेगा। पूरे खेत में नहीं फैलेगा। हम आसानी से बोरी को अलग कर सकते हैं।

बोरी में अच्छा उत्पाद होता है

अरहर प्रति बोरी औसतन-2 किलो दाना, 350 ग्राम लाख, 05 किलो जलाऊ लकड़ी, 1 किलो धनिया पत्ती

टमाटर-1.50 से 02 किलो

मिर्ची-01 किलो

सेम-15 से 20 किलो

लौकी-20 से 25 किलो

हल्दी-2.50 किलो

मटर-1 किलो

करेला-10 से 15 किलो

अरहर के साथ लाख की खेती भी, एक पौधे से 350 ग्राम लाख प्राप्त कर सकते हैं।

अरहर के साथ लाख की खेती भी, एक पौधे से 350 ग्राम लाख प्राप्त कर सकते हैं।

जवाहर मॉडल के साथ जारी है रिसर्च

जवाहर मॉडल में अधिकतर बीज किसानों से और अलग-अलग जिलों से लाकर लगाया गया है। साक्षी अग्रवाल, गोपी आजना, संदीप बिरला सहित अन्य रिसर्च करने वाले छात्रों के मुताबिक वे इस मॉडल में अलग-अलग किस्मों का फसल ले रहे हैं। सिर्फ अरहर के ही 10 से 12 किस्में, मटर के चार, हल्दी के 8 प्रजातियां लगाई गई हैं। अरहर के कुछ पौधे पर लाख चढ़ाया गया है, तो कुछ पर नहीं। इससे पता चलेगा कि लाख चढ़ाने से उत्पादन पर क्या असर आता है। जलवायु विशेष में कौन सी फसल बेहतर रहेगी।

कपास और हल्हदी को छोड़कर हर बोरी से दो फसल ले सकते हैं।

कपास और हल्हदी को छोड़कर हर बोरी से दो फसल ले सकते हैं।

आधा एकड़ से 50 हजार की कमाई

जवाहर मॉडल अपना कर किसान आधा एकड़ में कम से कम 50 हजार रुपए की कमाई कर सकता है। इस विधि में उसका खेत कभी खाली नहीं रहता है और हर हफ्ते कोई न कोई समय से पूर्व उत्पाद तैयार मिला है। जैविक उत्पाद होने से फसल भी अच्छी होती है और उसकी कीमत भी अच्छी मिलती है। जवाहर मॉडल को किसान का एटीएम माना गया है। मतलब एनी टाइम मनी, जब भी किसान चाहे, कोई न कोई उत्पाद बाजार में बेचकर 200 से 400 रुपए रोज कमा सकता है।

भास्कर खेती-किसानी एक्सपर्ट सीरिज में अगली स्टोरी होगी संतरे व आम की अच्छी पैदावार के लिए किसान क्या करें। यदि आपका कोई सवाल हो तो इस नंबर 9406575355 वॉट्सऐप पर सकते हैं।

Ramswaroop Mantri

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