नासा के जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप (JWST) ने एक बार फिर अपना लोहा मनवाया है. इस शक्तिशाली दूरबीन ने अंतरिक्ष में एक बेहद पुरानी और धुंधली लाल रोशनी को कैद किया है. यह रोशनी किसी साधारण तारे की नहीं, बल्कि एक ‘सुपरनोवा’ (Supernova) की है. यह विस्फोट आज से करीब 13 अरब साल पहले हुआ था. यह अब तक देखा गया सबसे पुराना और सबसे दूर स्थित सुपरनोवा है. वैज्ञानिकों के मुताबिक, यह घटना बिग बैंग (Big Bang) के मात्र 72 करोड़ साल बाद हुई थी. इसे ‘कॉस्मिक डॉन’ (Cosmic Dawn) यानी ब्रह्मांड की सुबह का समय कहा जाता है. इस खोज ने पिछले रिकॉर्ड को बुरी तरह ध्वस्त कर दिया है. इससे पहले जो सबसे पुराना सुपरनोवा देखा गया था, वह बिग बैंग के 1.8 अरब साल बाद का था.
बिना किसी मदद के कैसे देखा गया यह धमाका?
इस खोज की सबसे खास और हैरान करने वाली बात कुछ और है. आमतौर पर इतनी दूर की चीजों को देखने के लिए वैज्ञानिक ‘ग्रैविटेशनल लेंसिंग’ (Gravitational Lensing) का सहारा लेते हैं. इसमें आगे मौजूद विशाल गैलेक्सी का गुरुत्वाकर्षण पीछे की रोशनी को मैग्निफाई (बड़ा) कर देता है. लेकिन इस नए सुपरनोवा की रोशनी को किसी ने मैग्निफाई नहीं किया था.
जेम्स वेब ने इसे सीधे देखा है. यह अपने आप में एक चमत्कार है कि इतनी कम रोशनी वाली घटना को बिना किसी कुदरती लेंस के पकड़ लिया गया. नए डेटा के एनालिसिस से एक और चौंकाने वाली बात सामने आई है. यह 13 अरब साल पुराना सुपरनोवा बिल्कुल ‘नॉर्मल’ था. इसमें कोई भी ऐसी अजीबोगरीब बात नहीं थी, जो इसे सामान्य से ज्यादा चमकदार बनाती. यह बिल्कुल आज के दौर के सुपरनोवा जैसा ही था.

GRB 250314A से शुरू हुई थी सारी कहानी (NASA, ESA, CSA, STScI, A. Levan/IMAPP, Image Processing: A. Pagan/STScI)
इस ऐतिहासिक खोज की कहानी जेम्स वेब से नहीं, बल्कि एक दूसरे मिशन से शुरू हुई थी. इसका श्रेय फ्रेंच-चाइनीज सैटेलाइट ‘SVOM’ (Space Variable Objects Monitor) को जाता है. यह सैटेलाइट पृथ्वी की कक्षा में घूमते हुए ब्रह्मांड की सबसे चमकदार घटनाओं पर नजर रखता है. जिन्हें गामा-रे बर्स्ट (Gamma-ray bursts) कहा जाता है.
ये गामा किरणें इतनी शक्तिशाली होती हैं कि कुछ ही सेकंड में उतनी ऊर्जा छोड़ देती हैं, जितनी हमारा सूरज अपनी पूरी जिंदगी में नहीं छोड़ पाएगा. 14 मार्च 2025 को SVOM के उपकरणों ने अंतरिक्ष में एक तेज चमक पकड़ी. यह चमक बहुत खास थी.
जब वैज्ञानिकों ने इसकी बारीकी से जांच की, तो पता चला कि यह लंबी अवधि का गामा-रे बर्स्ट था. यह रोशनी बहुत दूर से आ रही थी. इसका सिग्नल धीरे-धीरे कम होता जा रहा था. इसे वैज्ञानिकों ने ‘GRB 250314A’ नाम दिया.
वैज्ञानिकों ने कैसे पता लगाया धरती से कितनी दूर हुआ धमाका?
सिर्फ चमक देखना काफी नहीं था. यह पता लगाना जरूरी था कि यह धमाका हमसे कितना दूर है. इसके लिए दुनिया भर के कई टेलीस्कोप काम पर लग गए. इनमें नासा का ‘नील गेहरल्स स्विफ्ट ऑब्जर्वेटरी’, नॉर्डिक ऑप्टिकल टेलीस्कोप और यूरोपीय स्पेस एजेंसी का ‘वेरी लार्ज टेलीस्कोप’ शामिल थे.

इन सबने मिलकर उस बर्स्ट की जगह को पिनपॉइंट किया. जांच में पता चला कि इसका ‘रेडशिफ्ट’ (Redshift) 7.3 है. खगोल विज्ञान में रेडशिफ्ट जितना ज्यादा होता है, वस्तु उतनी ही पुरानी और दूर होती है. कैलकुलेशन से साफ हो गया कि यह घटना बिग बैंग के लगभग 720 मिलियन (72 करोड़) साल बाद की है.
नीदरलैंड की रेडबौड यूनिवर्सिटी के खगोलशास्त्री एंड्रयू लेवन कहते हैं, ‘पिछले 50 सालों में ब्रह्मांड के पहले एक अरब साल के भीतर मुट्ठी भर गामा-रे बर्स्ट ही देखे गए हैं. यह विशेष घटना बहुत दुर्लभ और बहुत रोमांचक है.’
गामा-रे बर्स्ट कब होता है?
वैज्ञानिकों को पता था कि गामा-रे बर्स्ट दो तरह के होते हैं. लंबी अवधि वाले बर्स्ट का सीधा संबंध ‘कोर-कोलैप्स सुपरनोवा’ (Core-collapse supernovae) से होता है. यह तब होता है जब कोई विशाल तारा अपनी ही गुरुत्वाकर्षण शक्ति के नीचे दबकर मर जाता है.
तारे का कोर पिचक जाता है और वह एक ब्लैक होल (Black Hole) या न्यूट्रॉन स्टार में बदल जाता है. इस प्रक्रिया में भयानक विस्फोट होता है. इससे अलग-अलग वेवलेंथ की रोशनी निकलती है. आमतौर पर असली धमाके के कुछ हफ्तों बाद इसकी चमक सबसे ज्यादा होती है.
एक बार जब GRB 250314A की पहचान हो गई और उसकी दूरी पक्की हो गई, तो वैज्ञानिकों ने जेम्स वेब टेलीस्कोप का समय बुक किया. वे उस पल का इंतजार कर रहे थे जब सुपरनोवा का विस्फोट अपने चरम पर होगा. लेकिन यहां एक पेंच था.
गामा किरणों की चमक और ब्लैक होल का जन्म, जेम्स वेब ने सुलझाया ‘कॉस्मिक डॉन’ का सबसे बड़ा रहस्य (NASA, ESA, CSA, STScI, L. Hustak/STScI)
क्या है ‘टाइम डाइलेशन’?
ब्रह्मांड लगातार फैल रहा है. इस फैलाव की वजह से समय भी खिंच जाता है. इसे ‘कॉस्मिक टाइम डाइलेशन’ (Cosmic Time Dilation) कहते हैं. इसका मतलब यह था कि जो घटना वहां कुछ हफ्तों में हुई होगी, उसे पृथ्वी से देखने में कई महीने लग जाएंगे. वैज्ञानिकों ने इस देरी का हिसाब लगाया और सही समय पर जेम्स वेब को उस दिशा में घुमा दिया.
एंड्रयू लेवन बताते हैं, ‘सिर्फ जेम्स वेब ही सीधे तौर पर यह दिखा सकता था कि यह रोशनी एक सुपरनोवा की है. यानी एक विशाल तारे के ढहने की. यह ऑब्जर्वेशन यह भी साबित करता है कि हम जेम्स वेब का इस्तेमाल करके अलग-अलग तारों को तब भी ढूंढ सकते हैं, जब ब्रह्मांड अपनी मौजूदा उम्र का सिर्फ पांच प्रतिशत था.’
हैरान करने वाला खुलासा: सब कुछ ‘नॉर्मल’ था
जेम्स वेब से मिले डेटा ने वैज्ञानिकों को सबसे बड़ा सरप्राइज दिया. वे उम्मीद कर रहे थे कि शुरुआती ब्रह्मांड के तारे बहुत अलग होंगे. शायद वे बहुत विशाल होंगे या उनमें अजीब तरह के तत्व होंगे. लेकिन नतीजे बिल्कुल उलटे निकले.
यूके की लीसेस्टर यूनिवर्सिटी के खगोलशास्त्री नायल तानवीर कहते हैं, “हम खुले दिमाग से गए थे. और देखिए, वेब ने दिखाया कि यह सुपरनोवा बिल्कुल आधुनिक सुपरनोवा जैसा दिखता है.”
इसका मतलब है कि 13 अरब साल पहले भी तारे ठीक वैसे ही मर रहे थे और फट रहे थे, जैसे आज फटते हैं. यह खोज इसलिए मायने रखती है क्योंकि यह घटना ब्रह्मांड के इतिहास के एक बेहद नाजुक समय में हुई थी.
यह वह दौर था जिसे ‘ए इपॉक ऑफ रीआयोनाइजेशन’ (Epoch of Reionization) कहा जाता है. उस समय शुरुआती ब्रह्मांड में न्यूट्रल हाइड्रोजन (Neutral Hydrogen) की एक मोटी और अपारदर्शी धुंध छाई हुई थी. तब तारे और गैलेक्सी अपनी रेडिएशन से इस धुंध को साफ कर रहे थे.
इस प्रक्रिया ने ही अंतरिक्ष को पारदर्शी (Transparent) बनाया, जिससे रोशनी आर-पार जा सकी. वैज्ञानिक लंबे समय से जानना चाहते थे कि उस धुंध को साफ करने वाले तारे कैसे दिखते थे. क्या वे बाद में बने तारों से अलग थे?
GRB 250314A से जुड़ा सुपरनोवा बताता है कि कम से कम कुछ तारे तो बिल्कुल आज के तारों जैसे ही थे. उनमें कोई खास अंतर नहीं था.
भविष्य के लिए एक बड़ा संकेत
यह खोज हमें एक और अहम बात बताती है. हमें यह उम्मीद नहीं करनी चाहिए कि शुरुआती ब्रह्मांड के गामा-रे बर्स्ट वाले सुपरनोवा बाद के सुपरनोवा से ज्यादा चमकदार होंगे. वे भी उतने ही सामान्य हो सकते हैं.
इसका मतलब यह है कि ब्रह्मांड के ‘डार्क एज’ (Dark Age) में ऐसे बहुत से ‘धुंधले’ धमाके छिपे हो सकते हैं. अब तक हम उन्हें नहीं देख पाए थे क्योंकि हमारे पास जेम्स वेब जैसी नजर नहीं थी. अब यह संभावना खुल गई है कि हम ऐसे और भी कई प्राचीन विस्फोटों को खोज सकते हैं.
Explainer: क्या है रेडशिफ्ट?
जब कोई वस्तु हमसे दूर जाती है, तो उससे निकलने वाली रोशनी की तरंगें (Waves) खिंच जाती हैं. जैसे रबर बैंड को खींचने पर वह लंबा हो जाता है. रोशनी की तरंगें खिंचकर लाल रंग की तरफ शिफ्ट हो जाती हैं. इसे ही ‘रेडशिफ्ट’ कहते हैं. जेम्स वेब इंफ्रारेड (अवरक्त) रोशनी को देखता है, इसलिए वह इन पुरानी और खिंची हुई लाल तरंगों को पकड़ने में माहिर है.
इस खोज का ब्योरा ‘एस्ट्रोनॉमी एंड एस्ट्रोफिजिक्स’ जर्नल में छपा है. वैज्ञानिकों की टीम अब और भी ज्यादा पुराने सुपरनोवा की तलाश में है. वे जानना चाहते हैं कि ब्रह्मांड का सबसे पहला तारा कब बना और कब मरा. जेम्स वेब ने वह दरवाजा खोल दिया है, जिसके पीछे हमारी सृष्टि के जन्म के सारे राज छिपे हैं.





