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क्रांतिकारी बिरसा मुंडा की जयंती पर झारखंड नाखुश

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सुसंस्कृति परिहार


15नवम्बर जब केन्द्रीय सरकार के आव्हान पर तमाम क्षेत्रों में बिरसा मुंडा की जयंती पर जनजाति गौरव दिवस के रूप में कई आयोजन हुए। वहीं झारखंड में इस दिवस को लेकर नाखुशी देखी गई।आज झारखंड राज्य का अपना जन्मदिन भी था।जो सन् 2000 में क्षेत्र के भगवान की तरह मान्य बिरसा मुंडा के जन्मदिन पर अस्तित्व में आया था। यहां बिरसा मुंडा का जन्म और शहादत भी हुई।
सवाल ये है कि यहां के लोग इस पवित्र दिन नाखुश क्यों रहे ?बताया जाता है कि वे बिरसा मुंडा को :धरती आबा’ या दूसरे शब्दों में धरती के पिता की तरह देखते हैं वे कांति सूर्य और धरती आबा को भगवान मानते हैं।इस तरह उन्हें सिर्फ जनजाति का गौरव बताना  मंजूर नहीं।वे तमाम जगती के मसीहा जैसे थे।वे जल ,जंगल,जमीन और जानवरों के प्रति भी समर्पित थे।सबके प्रति उनमें करुणा भाव था।वे इसीलिए मांस का सेवन नहीं करते थे।

Leaders pay tributes to Birsa Munda, greet Jharkhand on Foundation Day -  The Hindu


दूसरा उनका सवाल भी महत्वपूर्ण और विचारणीय है वे पूछते हैं कि क्या देश के तमाम आदिवासी जनजाति सूची में है नहीं, तब क्यों और किस आधार पर जनजाति गौरव दिवस हुआ। इस दिवस की घोषणा का अर्थ तो यही हुआ की जो आदिवासी जनजातीय सूची में है वे गौरव महसूस करे और जो आदिवासी  जनजातीय सूची में नहीं है उनके लिए गौरव जैसा कुछ नहीं,, राजनेताओ को कम से कम आदिवासियों की भावनाओं की कद्र करना चाहिए।असम के मुंडा,उरांव,संथाली इत्यादि जनजातीय सूची में नहीं है अर्थात उनके लिए यह दिवस जनजातीय गौरव दिवस नहीं होगा?इन सब प्रश्नों का उत्तर तो प्रत्येक आदिवासी को चाहिए, क्योंकि आज वर्तमान सरकार ने आदिवासी वीर पुरुष,अमर पुरखा बिरसा मुंडा के जयंती को जनजातीय गौरव दिवस घोषित कर, इस दिन को जनजातीय वर्ग तक सीमित कर रहा है,क्या धरती आबा बिरसा मुंडा जनजातियो तक ही सीमित हैं? 
विदित हो वर्ष 1899-1900 में बिरसा मुंडा के नेतृत्व में हुआ मुंडा विद्रोह छोटा नागपुर (झारखंड) के क्षेत्र में सर्वाधिक चर्चित विद्रोह था। इसे ‘मुंडाउलगुलान’ (विद्रोह) भी कहा जाता है। जिसमें महिलाओं की भी भागीदारी रही।  बिरसा का बचपन आम भटकते आदिवासी परिवार में बीता। वे जब अध्ययन करने मिशनरी स्कूल गए तब उन्हें बिरसा डेविड बना पड़ा।बाद में उन्हें बिरसा दाऊद भी कहा गया लेकिन स्कूल जाकर उन्होंने अंग्रेजों की नीतियों को भली-भांति समझा और जल्द ही स्कूल छोड़ उन्हें हटाने संकल्पित हो गए ।उनके जीवन में ‌‌‌‌‌‌‌‌बदआव आ गया । 1895तक बिरसा मुंडा एक सफल नेता के रुप में उभरने लगे जो लोगों में जागरुकता फैलाना चाहते थे।1894 में आए अकाल के दौरान बिरसा मुंडा ने अपने मुंडा समुदाय और अन्य लोगों के लिए  अंग्रेजों से लगान माफी की मांग के लिए आंदोलन किया ।

1895 में ही उन्हें गिरफ़्तार कर लिया गया और हजारीबाग केन्द्रीय कारागार में दो साल के कारावास की सजा दी गयी. लेकिन बिरसा और उनके शिष्यों ने क्षेत्र की अकाल पीड़ित जनता की सहायता करने की ठान रखी थी और यही कारण रहा कि अपने जीवन काल में ही उन्हें एक महापुरुष का दर्जा मिला

उन्हें उस इलाके के लोगों ने सबसे पहले “धरती बाबा” के नाम से पुकारा और उनको भगवान की  मान्यता दी। उनके प्रभाव की वृद्धि के बाद पूरे इलाके के मुंडाओं में संगठित होने की चेतना जागी 1897 से 1900 के बीच मुंडाओं और अंग्रेज सिपाहियों के बीच युद्ध होते रहे और बिरसा और उसके चाहने वाले लोगों ने अंग्रेजों की नाक में दम कर दिया. अगस्त 1897 में बिरसा और उसके चार सौ सिपाहियों ने तीर कमानों से लैस होकर खूंटी थाने पर धावा बोला। 1898 में तांगा नदी के किनारे मुंडाओं की भिड़ंत अंग्रेज सेनाओं से हुई जिसमें पहले तो अंग्रेजी सेना हार गयी लेकिन बाद में इसके बदले उस इलाके के बहुत से आदिवासी नेताओं की गिरफ़्तारियां हुईं ।जनवरी 1900 में जहाँ बिरसा अपनी जनसभा संबोधित कर रहे थे, डोमबाड़ी पहाड़ी पर एक और संघर्ष हुआ था, जिसमें बहुत सी औरतें और बच्चे मारे गये थे. बाद में बिरसा के कुछ शिष्यों की गिरफ़्तारी भी हुई थी. अंत में स्वयं बिरसा 3 फरवरी, 1900 को चक्रधरपुर में गिरफ़्तार हुए.

बिरसा ने अपनी अंतिम सांसें 9 जून, 1900 को रांची कारागर में ली. आज भी बिहार, उड़ीसा, झारखंड, छत्तीसगढ और पश्चिम बंगाल के आदिवासी इलाकों में बिरसा भगवान की तरह पूजे जाते हैं।’अबुआ: दिशोम रे अबुआ: राज’ (हमार देश में हमार शासन) का बिगुल फूंका. बिरसा का संघर्ष देखकर जन-सामान्य का उनमें में काफी दृढ़ विश्वास हो चुका था।वे निरंतर समाज को जागरूक करते हुए हिंसा और मादक पदार्थों से उन्हें दूर करते हुए संगठित करते रहे और मुंडा समुदाय को अंग्रेजों के विरुद्ध तैयार किए उनका क्रांति का आगाज करना ,चेतना ,सेवाकार्य और बलिदान हमेशा हमारा संबल रहेगा।25वर्षीय इस युवा की ज़िंदादिली भगतसिंह तक मिलती है।

उनके आदिवासियों के खिलाफ शोषण एवं भेदभाव के विरुद्ध उनके संघर्ष के कारण ही वर्ष 1908 में छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम (Chotanagpur Tenancy Act) पारित किया गया, जिसने आदिवासी लोगों से गैर-आदिवासियों में भूमि के हस्तांतरण को प्रतिबंधित कर दिया।

देश उन्हें हमेशा याद रखेगा। धरती आबा और भगवान स्वरूप में। झारखंड से उठी असंतोष की आवाज पर सोचने की ज़रूरत है राम,बुद्ध की तरह अवाम यदि उन्हेंं भगवान स्वरुप मानती है तो सिर्फ़ गौरव दिवस के रुप में मनाकर बिरसा भगवान का कद छोटा ना करें । तमाम जगह फैले आदिवासियों को सूची में शामिल किया जाना भी आवश्यक है इस पर तत्काल केन्द्र सरकार ध्यान दें।यह सिर्फ राजनैतिक मुद्रा ना हो  उन्हें आज़ादी के अतिलोकप्रिय जन नायक का दर्जा मिलना चाहिए।वे झारखंड,बिहार , बंगाल में काफी लोकप्रिय हैं।देश के तमाम लोग उनके अवदान को भली-भांति जानते हैं।

Ramswaroop Mantri

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