यह बात शायद 1950 की है. नवकेतन फिल्म्स के ऑफिस में चेतन आनंद , देवानंद, बलराज साहनी, गुरुदत्त आदि की टीम वहां बैठी थी. ‘बाज़ी’ बनाने के बारे में विचार-विमर्श चल रहा था. तभी एक मरियल सा अंजान आदमी वहां घुस आया. नशे में बुरी तरह से धुत्त. कपड़ों का होश नहीं और पैर भी ज़मीन पर ठीक से टिक नहीं रहे थे. किसी तरह स्टाफ ने उसे संभाला. फिर उसने अगड़म-बगड़म बोलना शुरू किया. सबने उससे मज़ा लेना शुरू कर दिया. बिलकुल टैक्स फ्री एंटरटेनमेंट. लेकिन एक स्टेज ऐसी आई कि जब लगा कि अब बहुत ज्यादा हो गयी है. इसे अब बाहर करो. और भी बहुत काम हैं. लेकिन तभी बलराज साहनी ने हस्तक्षेप किया – बदरू, हो गया. अब बस करो. और साहब लोगों को सलाम करो.
बलराज का हुक्म सुनते ही वो आदमी एकदम से सीधा और हाथ जोड़ कर खड़ा हो गया. उसने चेतन आनंद और वहां मौजूद तमाम हज़रात को सैल्यूट किया. यानी उस आदमी ने दारू बिलकुल नहीं पी रखी थी. सिर्फ एक्टिंग कर रहा था.
बलराज साहनी ने उस आदमी का परिचय कराया – यह बदरूद्दीन जलालुद्दीन काज़ी हैं. हैं तो ये बस कंडक्टर मगर साथ ही बेवड़े की एक्टिंग करते हुए पब्लिक का एंटरटेनमेंट भी करते हैं. और मज़े की बात यह है कि खुद इन्होंने दारू की दो बूंद भी नहीं चखी हैं.
वहां मौजूद सभी लोगों ने उनकी एक्टिंग बेहद तारीफ़ की. चेतन आनंद ने उन्हें फ़ौरन ‘बाज़ी’ के लिए साइन कर लिया. गुरूदत्त तो बदरू की बेवड़े की एक्टिंग पर बहुत मोहित हुए. उसी वक़्त से उन्हें दोस्त बना लिया. उन्होंने गुरुदत्त की ज्यादातर फिल्मों में काम भी किया. लेकिन वो अपने नाम से नहीं मशहूर ब्रांड की व्हिस्की के नाम से पहचाने गए, ज़िंदगी के आखिरी लम्हों तक. और यह फ़िल्मी नाम उन्हें गुरुदत्त ने दिया था – जॉनी वाकर.





