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चेतन~तत्व और आत्म~तत्व की यात्रा

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 डॉ. विकास मानव

      रात्रि का समय !

      नींद नहीं आ रही थी। सोचने लगा–क्या कपिला आनन्द (पार्थिव शरीर से मुक्त एक शुद्ध आत्मा अपने आत्म शरीर में) से समाधान हो जाएगा मेरी जिज्ञासा का ? फिर रहा न गया मुझसे। आत्मा के आवाहन की क्रिया जानता ही था मैं।

      व्यक्तिगत रूप से कपिला आनन्द की आत्मा के आवाहन की मुद्रा में बैठ गया।  एक-एक क्षण घड़ी की सेकेंड की सुई की तरह आगे बढ़ रहा था समय। अचानक कमरे का वातावरण सुगन्धित हो उठा।

       देखा–अपने पार्थिव शरीर में खड़ी थी कपिला आनन्द मेरे सामने। मेरी क्या जिज्ञासा है ? मैं क्या जानना चाहता हूँ ? मैं क्या सोच रहा हूँ ?–निश्चय ही वह सब कुछ जान गई थी दिव्यात्मा।

     जरा हँसकर मन्द स्वर में बोली कपिला आनन्द–यह तो तुम जानते ही हो कि मानव शरीर अत्यन्त दुर्लभ है। तुमको थोड़ा गहराई से समझना पड़ेगा। पहले तुमको यह समझा दूँ कि विश्वब्रह्माण्ड में दो मूल तत्व हैं–ब्रह्माण्डीय तत्व और सूक्ष्मतम प्राणतत्व।

       इन दोनों तत्वों की ऊर्जाएं आपस में मिलकर एक विलक्षण तत्व को जन्म देती हैं और वह तत्व है–‘चेतनतत्व’। नैसर्गिक रूप से उसमें आकाशतत्व, वायुतत्व, अग्नितत्व, जलतत्व और पृथ्वीतत्व का समावेश हो जाता है समयानुसार।

      इसका परिणाम यह होता है कि उस चेतनतत्व में जीवभाव का उदय स्वयं हो जाता है और जीवभाव का उदय होते ही उसकी यात्रा शुरू हो जाती है और उस यात्रा की शुरुआत होती है पार्थिव अथवा स्थूल आधार पर। वास्तव में जीवभावापन्न चेतना की यह आरम्भिक जीवन-यात्रा है। अपने हज़ारों-हज़ार वर्षों की दीर्घकालीन यात्रा में अंडज, पिंडज, स्थावर और जंगम–इन चार भागों में विभक्त 84 लाख योनियों में भ्रमण करती हुई और क्रमशः विकसित होतीे हुई चेतना अन्त में हाथी की योनि में जन्म लेती है।

        पशु योनि की अन्तिम योनि ‘हाथी’ है। इस योनि में चेतनतत्व में एक और मौलिक तत्व का समावेश होता है और वह तत्व है– ‘बुद्धितत्व’। पशुओं में केवल हाथी में ही विकसित बुद्धितत्व है।

      *मध्य योनि :*

      पशु योनि का अन्त होने पर मानव जीवन का आरम्भ है। यह अवसर जीव-सृष्टि का संक्रांति-काल है। आरम्भ और अन्त के मध्य  एक योनि विशेष और है जिसे ‘मध्ययोनि’ कहते हैं और वह मध्ययोनि है–बन्दर की जिसे वानर (वननर) की भी संज्ञा दी गयी है।

         _प्राकृतिक रूप से मनुष्य योनि का आरम्भ वननर की योनि से ही हुआ है क्योंकि जीवतत्व-चेतना पहली बार नर से जुड़ती है, मनुष्य के रूप में विकसित होती है। इस मनुष्य योनि में एक विशेषतत्व का नैसर्गिक रूप से आविर्भाव होता है और वह तत्व है–‘मनस्तत्व’।_

        बुद्धितत्व का आश्रय लेकर मनस्तत्व का विकास इसी योनि में आरम्भ हो जाता है। मन का अंश होने के कारण इसे वानर (वननर) कहा जाता है। इतिहासकारों (मुख्य रूप से फ्रायड जैसे विद्वान) का कहना है कि मनुष्य के पूर्वज बन्दर हैं। उनका अनुमान अपने स्थान पर सही ही है लेकिन आधुनिक अनुसंधानों ने इस तथ्य को झुठला दिया है कि बन्दर मनुष्य के पूर्वज हैं।

        सृष्टि की प्रक्रिया में जहां-जहां पर क्रमशः एक-एक तत्व के जुड़ते जाने का मतलब है  विकास का वह पायदान बिल्कुल अलग है। प्रकट रूप से उसका पिछले पायदान से कोई सीधा सम्बन्ध नहीं है।

      मनुष्य योनि में आकर  बुद्धि और मन के मिश्रण से एक और तत्व जन्म लेता है और वह तत्व है–‘अहंकार’। मन, बुद्धि और अहंकार– इन तीनों तत्वों से आत्म-चेतना में जीवभाव उत्पन्न होता है और तभी आत्मा को ‘जीवात्मा’ की संज्ञा हो जाती है।

       यहीं से आरंभ हो जाती है जीवात्मा (मानव योनि) की दीर्घकालीन जीवन-यात्रा जिसकी समाप्ति होती है–मोक्ष के परम् प्राप्तव्य में। 

      अहंकार के कारण ही आत्मा को जीवात्मा की संज्ञा दी गयी है। शुद्धात्मा बनने के लिए अहंकार का त्याग अनिवार्य है। इसके लिए आत्मा को मन, बुद्धि और अहंकार के प्रभाव की परिधि से बाहर निकलना पड़ता है।

     समस्त साधनाओं का एकमात्र लक्ष्य है–अहंकार का नाश और आत्मा की दिव्य, शुद्ध-विशुद्ध रूप की उपलब्धि ही ‘मोक्ष’ की धारणा है।

      _मन और आत्मा एक ही वस्तु के दो रूप हैं। बस थोड़ा-सा भेद है। मन चंचल और अस्थिर है जबकि आत्मा शान्त और स्थिर।_

     मानव योनि में दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। मन और आत्मा इतनी गहराई से आपस में संयुक्त हैं कि उन्हें सहज रूप से अलग नहीं किया जा सकता, सिवाय साधना के और वह भी समाधि की अवस्था में।

        मन और आत्मा की संयुक्त यात्रा एक विकासशील यात्रा है। इस यात्रा का आरंभ होता है मनुष्य के निम्नतम स्तर से और अन्त होता है ‘कैवल्य’ अथवा ‘मोक्ष’ में। यह यात्रा जन्म-मरण के बीच की ही यात्रा नहीं है और आगे के लोकों का अतिक्रमण कर अन्तिम पड़ाव *मोक्ष* में जाकर समाप्त होती है यह, भले ही लाखों बार आवागमन क्यों न करना पड़े आत्मा को।

      _मनुष्य की जीवन-यात्रा उसकी निम्नतम योनि से आरम्भ होकर ब्राह्मण योनिपर्यन्त की यात्रा है।( यहां ब्राह्मण योनि का उल्लेख जातिसूचक नहीं है बल्कि विकसित व्यक्तित्व से है, संस्कारित व्यक्तित्व से है।) ब्राह्मण की काया जीवात्मा के विकास-क्रम की अन्तिम काया है।_

         इस अन्तिम काया के बाद ऊपर के लोकों के लिए सीढियां आरम्भ हो जाती हैं। ब्राह्मण मनुष्य की योनि प्राप्त कर जो भी जीवात्मा अपने उद्धार के लिए जप-तप, साधना-उपासना की सीढ़ियों पर चढ़कर आगे बढ़ने का प्रयास नहीं करती, उससे ज्यादा दुर्भाग्यशील प्राणी कौन हो सकता है। लेकिन हम-आप आज यदि मनुष्य की दशा-दिशा देखें, उसके क्रिया-कलाप देखें तो पश्चाताप करने के सिवाय और कर ही क्या सकते हैं ?

      _मनुष्य स्वयं ही अन्धा-बहरा बनकर अंधकूप में गिरकर आत्महत्या करने को आमादा हो चुका है और इस स्थिति के लिए उत्तरदायी है वह स्वयं, सदियों की गुलामी, सनातन धर्म-संस्कृति से मनुष्य मात्र को जानबूझकर वंचित किया जाना, श्रेष्ठ उदात्त सनातन मान्यताओं और परम्पराओं से मनुष्य समाज को काट देना।_

       पाश्चात्य शक्तियों का यह कुत्सित प्रयास कम कारण नहीं है जो सदियों से चलता आ रहा है।

      यदि इस ब्राह्मण शरीर में आकर जीवात्मा जीवनमुक्त होने का प्रयास नहीं करती तो समझ लीजिए कि उसके जीवन का मिलना व्यर्थ ही है।

     _यहां यह समझ लेना चाहिए कि एक बार मनुष्य शरीर प्राप्त करने के बाद जीवात्मा फिर कभी भी मानवेतर शरीर स्वीकार नहीं कर सकती–यह अकाट्य नियम है।_

Ramswaroop Mantri

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