शशिकांत गुप्ते
आज सीतारामजी ने मुझसे कहा इन दिनों अपना सम्पूर्ण देश धर्ममय हो गया है।
इन दिनों मै (सीताराम) भी धार्मिक फिल्में ही देख रहा हूं।
आज मैने सन 1965 में प्रदर्शित फिल्म शंकर सीता अनसूया देखी।
यह कहते हुए सीतारामजी ने मुझे इसी फिल्म के इस गीत की कुछ पंक्तियां सुनाई। यह गीत लिखा है,
कवि प्रदीपजी ने।
हमने जग की अजब तस्वीर देखी एक हँसता है दस रोते हैं।।
हमे हँसते मुखड़े चार मिले दुखियारे चेहरे हज़ार मिले।।
यहाँ सुख से सौ गुनी पीड़ देखी
दो एक सुखी यहाँ लाखों में आंसू है करोड़ों आँखों में।
मैने कहा साठ दशक के बाद स्थिति ज्यों की त्यों।
सीतारामजी ने कहा नहीं पिछले एक दशक से परिवर्तन हो रहा है।
देश धर्म प्रधान हो रहा है।
दिव्य भव्य मंदिर निर्मित हो रहे हैं। धर्म प्रेमी श्रद्धालुओं की संख्या में वृद्धि हो रही है।
मैने कहा मैं आपसे पूर्ण रूप से सहमत हूं।
जब श्रद्धा जागृत हो जाती है,तब मानव मोह माया से दूर हो जाता है। मानव में विरक्ति जाग जाती है।
इसीलिए उसे सड़कों के गड्ढे दिखाई नहीं देते हैं। बढ़ती महंगाई महसूस नहीं होती है।
विरक्ति युक्त मानव एक ही भजन भाव विभोर गाते रहता है।
तेरा रामजी करेंगे बेड़ा पार
उदासी मन कहे को करें
वैसे भी हम अवतारवाद के सिद्धांत को मानने वाले लोग हैं?
राम भक्त संत तुलसीबाबा ने रामचरितमानस में रचित चौपाई अधर्मी लोगों के लिए है।
बाढ़े खल बहु चोर जुआरा। जे लंपट परधन परदारा॥
मानहिं मातु पिता नहिं देवा। साधुन्ह सन करवावहिं सेवा॥
इस तरह का आचरण करने वालों के लिए तुलसी बाबा ने निम्न चौपाई लिखी है।
जिन्ह के यह आचरन भवानी। ते जानेहु निसिचर सब प्रानी॥
जब लोगों के आचरण आसुरी हो जातें हैं। तब भगवान अवतार लेते हैं।
मेरी बात सुनकर सीतारामजी ने कहा मुझे समझ में नहीं आ रहा है कि,आप गंभीर बात कह रहें हैं या व्यंग्य कर रहें हैं?
पता नही भगवान कब अवतार लेंगे?
मैने कहा गणना भी ऊपर वाला ही करेगा।
अपने को तो सिर्फ भगवान का भजन पूजन ही करते रहना है।
शशिकांत गुप्ते इंदौर





