लोकतांत्रिक अधिकारों से समझौते की गंभीर आशंका और लोकतांत्रिक ढांचे के साथ खिलवाड़ है एसआईआर का फॉर्मूला
मतदाता सूची की विश्वसनीयता पर संकट पैदा करेगी एसआईआर की योजनाबद्ध साजिश
विजया पाठक,
मध्यप्रदेश जैसे विशाल और विविधतापूर्ण राज्य में मतदाता सूची का निर्माण केवल एक प्रशासनिक औपचारिकता नहीं, बल्कि लोकतंत्र की पूरी बुनियाद है। चुनावी प्रक्रिया की शुचिता और विश्वसनीयता इसी पर निर्भर करती है। ऐसे में जब निर्वाचन आयोग और राज्य सरकार द्वारा मतदाता सूची की जांच, अर्थात एसआईआर (स्पेशल समरी रिविजन) प्रक्रिया को जल्दबाज़ी और आधी-अधूरी तैयारी के साथ लागू किया गया है तो यह न केवल चिंताजनक है बल्कि लोकतांत्रिक ढांचे के साथ खिलवाड़ भी प्रतीत होता है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता एवं पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ ने भाजपा सरकार द्वारा चुनाव आयोग के ऊपर दबावपूर्ण ढंग से करवाये जा रहे इस कार्य को पूरी तरह से निरर्थक और लोकतांत्रिक ढांचे के साथ खिलवाड़ बताया है। कमलनाथ स्वयं एक वरिष्ठ राजनेता हैं और लंबे समय तक केंद्र सरकार और मुख्यमंत्री जैसे जिम्मेदार पदों का निर्वहन कर चुके हैं। ऐसे में कमलनाथ द्वारा इस पूरी प्रक्रिया को कटघरे में खड़े कर देना साफ तौर पर इस बात की ओर इशारा करता है कि एसआईआर का यह फॉर्मूला पूरी तरह गलत है। यह कहना पूरी तरह सार्थक है कि एसआईआर प्रक्रिया जिस तरह प्रदेश में शुरू की गई है, उसने मतदाता सूची निर्माण की पूरी प्रक्रिया का मज़ाक बना दिया है। जिस कार्य के लिए महीनों की तैयारी, सुचारु समन्वय और पर्याप्त संसाधनों की आवश्यकता होती है, उसे केवल दिखावे की तत्परता में शुरू कर दिया गया है, जिसके परिणाम गंभीर रूप से प्रदेश के मतदाताओं के अधिकारों को प्रभावित कर सकते हैं।
मतदाताओं पर थोपी गई जिम्मेदारी
चुनाव आयोग मतदाता सूची के सत्यापन में 2003 को आधार वर्ष मानता है, लेकिन यहाँ स्थिति यह है कि बीएलओ 2003 की सूची माँगने पर मतदाताओं को ही इंटरनेट से खोजने को कह रहे हैं। पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ के अनुसार मध्यप्रदेश एक व्यापक ग्रामीण आबादी वाला राज्य है, जहाँ आज भी बड़ी संख्या में लोग इंटरनेट तक सुचारु और सुलभ पहुँच नहीं रखते। ऐसे में मतदाताओं पर यह ज़िम्मेदारी डाल देना कि वे स्वयं इंटरनेट से 20 साल पुरानी सूची ढूँढें, सरासर अन्याय है। यह लोकतांत्रिक दायित्व का स्पष्ट उल्लंघन है, क्योंकि संविधान के अनुसार मतदाता बनाना और मतदाता सूची को सही एवं अद्यतन रखना चुनाव आयोग की प्राथमिक जिम्मेदारी है, मतदाताओं की नहीं।
संदेह और तुगलकी कदम है एसआईआर की शीघ्रता
इतने कम नोटिस पर और इतनी सीमित अवधि में एसआईआर प्रक्रिया शुरू करना एक ऐसा निर्णय है, जिसे कमलनाथ ने ‘तुगलकी फ़रमान’ की संज्ञा दी है। सामान्य परिस्थितियों में मतदाता सूची जांच के लिए विस्तृत समय, जनजागरण, संसाधन और प्रशासनिक समन्वय की आवश्यकता होती है। लेकिन यहाँ ऐसा प्रतीत होता है। मानो किसी अदृश्य दबाव या संदेहास्पद मंशा के तहत यह कार्य तुरंत निपटाने की कोशिश की जा रही है। जब किसी प्रक्रिया को इतनी गैर-गंभीरता और लापरवाही से चलाया जाता है तो यह स्वाभाविक है कि जनता के मन में संदेह पैदा हो। क्या उद्देश्य केवल औपचारिकता पूरी करना है? क्या मतदाता सूची में छेड़छाड़ का रास्ता खोला जा रहा है? या फिर प्रशासनिक विफलताओं को छुपाने के लिए जल्दबाजी की आड़ ली जा रही है?
मतदाता सूची की विश्वसनीयता पर गहरा संकट
अगर इसी तरह एसआईआर प्रक्रिया चलाई गई तो यह निश्चित है कि मतदाता सूची न्यायपूर्ण और पारदर्शी तरीके से नहीं बन पाएगी। गलती से हटाए गए नामों को वापस जोड़ने की प्रक्रिया भी प्रभावित होगी। गलत नामांकन, दोहराव और बहिष्कार जैसे गंभीर दोष बढ़ेंगे, जिससे चुनाव की निष्पक्षता संदिग्ध बन जाएगी। सही मतदाताओं का नाम सूची से गायब होना या फर्जी नामों का बने रहना लोकतंत्र के लिए खतरनाक है। चुनाव की विश्वसनीयता मतदाता सूची की शुद्धता से ही बनती है। अगर सूची ही सही नहीं है, तो चुनाव की निष्पक्षता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
वोट चोरी की आशंका और जनता के साथ अन्याय
कमलनाथ ने जिस तरह चेतावनी दी है कि इसके पीछे कहीं वोट चोरी का षड्यंत्र तो नहीं, यह सवाल आज लाखों मतदाताओं के मन में है। प्रशासनिक अव्यवस्था, आधे-अधूरे दस्तावेज़, उपलब्ध न कराई गई सूचियाँ और जल्दी में शुरू की गई प्रक्रिया ये सारे संकेत किसी गहरी साज़िश के इशारे हो सकते हैं। यदि किसी भी प्रकार से मतदाता सूची के माध्यम से मताधिकार छीनने का प्रयास किया गया, तो यह सीधे-सीधे संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन होगा। यह केवल मतदाताओं के साथ अन्याय नहीं, बल्कि लोकतंत्र पर हमला होगा। कांग्रेस और कमलनाथ का यह दावा उचित है कि यदि ऐसी किसी भी साज़िश का प्रयास किया गया तो प्रदेश की जनता और कांग्रेस पार्टी दोनों ही हर स्तर पर संघर्ष के लिए तैयार हैं।
संविधान और आयोग की जिम्मेदारी
भारतीय संविधान में स्पष्ट रूप से उल्लेख है कि हर नागरिक को मताधिकार का अवसर मिले और उसे सुनिश्चित करना चुनाव आयोग का दायित्व है। आयोग केवल काग़ज़ों पर नियम लिखकर मुक्त नहीं हो सकता। वास्तविक अमल ज़मीनी स्तर पर होना चाहिए और उसी से आयोग की विश्वसनीयता बनती है। आज सबसे बड़ी आवश्यकता यह है कि आयोग अपनी भूमिका को गंभीरता से निभाए, राज्य सरकार सभी संसाधन समय पर उपलब्ध कराए और मतदाता सूची की प्रक्रिया को पारदर्शी एवं व्यवस्थित तरीके से दोबारा प्रारंभ किया जाए।
बीएलओ की अनुपस्थिति और फ़ॉर्म की कमी
12 राज्यों में 51 करोड़ से अधिक मतदाताओं के लिए किए जा रहे इस कार्य में देश में अब तक 25 बीएलओ की मृत्यु हो चुकी है। मध्यप्रदेश में ही तीन से अधिक बीएलओ की मौत हो चुकी है। काम की अधिकता, निश्चित समयावधि और कार्य का अतिरिक्त दबाव कर्मचारियों और बीएलओ की मौत का कारण है। लेकिन प्रदेश की मोहन सरकार और केंद्र की मोदी सरकार अब तक इस पूरे मामले में चुप्पी साधे बैठी हुई है।





