~ पवन कुमार
इन दिनों कई पाकिस्तानी ड्रामा देखे। औरत की हालत ब्यान करते यह ड्रामा पीछे पढ़ी किताब की याद दिला गए।
1991 में अपनी विवादास्पद आत्मकथा ‘माई फ्यूडल लार्ड’ लिख कर लेखिका तहमीना दुर्रानी ने साहित्य जगत में हलचल मचा दी थी। बाईस भाषाओं में इसका आनुवाद हो चुका है।
तहमीना ने अब्दुल सत्तार इदी की जीवनी ‘ए मिरर टु द ब्लाइंड’ भी लिखी है। ‘ब्लासफेमी’ उनकी दूसरी महत्वपूर्ण कृति है।
यह उपन्यास दक्षिणी पाकिस्तान में स्थित एकज दरगाह के पीरों के कारनामों की परतें उधेड़ने वाली सच्ची कथा पर आधारित है।
तहमीना की कलम ने हीर के जरिये एक ऐसे विषय को छुने का दुस्साहस किया है, जिसे छूना इस्लामी देश में लगभग मना है।
तहमीना दुर्रानी ने अपने उपन्यास कुफ्र (जो स्त्री की असल कहानी है) में उस स्त्री की पीड़ा का मार्मिक चित्रण किया है जिसका पति सिर्फ देह से बात करता है।
5 साल की नौकरानी लड़की और ऐसी ही अन्य मासूमों तक से रेप करता रहता है, बीबी के सामने ही. किस तरह उनको मरता पीटता है, अर्धबेसुध करता है, किस तरह से उनकी योनि मेँ… बीबी बेचारी इस अपराध बोध (जबकि वह अपराधी भी नहीं) से मुक्त होने के लिए घंटों शावर के नीचे आंसू बहाती है।
पर्दे के पीछे वाले मुस्लिम कल्चर की विभस्तता को बखूबी साकार करता है यह उपन्यास.
एक महिला को कितना मजबूर किया जाता, उस पर कितना व किस किस तरह का अत्याचार किया जाता है, और, वह महिला फिर भी सपने देखती है, प्यार करने के बारे में, लड़ने के लिए, बदला लेने की सोचती है, रचने की सोचती है.
आगे सब कुछ ठीक हो जाने की उम्मीद करती है…. और जब उसका वक्त आया, उसके दिन ठीक होने को आए तो उसके कोख का ही जना उसके खिलाफ नए खलनायक के रूप में खड़ा हो जाता है.
एक पति अपनी पत्नी को लेकर भी कितना विकृत हो सकता है, उसका किस किस तरह दुरुपयोग कर सकता है, खुदा का प्रतिनिधि समझे जाना वाला एक आदमी कितना गिरा हुआ हो सकता है, उसके लिए हर लड़की सिर्फ एक योनि से ज्यादा कुछ नहीं, उसकी दास्तान पढ़कर आपको जिंदगी, सिस्टम, मनुष्यता, परंपरा, धर्म.. सब कुछ के बारे में दुबारा सोचने का मन करेगा।
समाज ,देश कोई भी हो स्त्री के हालात लगभग अभी भी एक से ही है। इनके अभी कुछ देखे गए ड्रामे तो रोंगटे ही खड़े कर गए। आपने यह किताब नहीं पढ़ी तो जरूर पढ़ें। (चेतना विकास मिशन).





