प्रदेश की औद्योगिक शांति पर प्रतिकूल असर की दी धमकी एरियर्स सहित न्यूनतम वेतन वृद्धि भुगतान करो
श्रम मंत्री व श्रमायुक्त को सौंपा ज्ञापन
*इंदौर मध्यप्रदेश सरकार का बगैर केन्द्रीय श्रमिक संगठनों से चर्चा किये तीन महत्वपूर्ण श्रम कानूनों, क्रमशः ठेका श्रम (विनियमन और उत्सादन) अधिनियम, 1970, कारखाना अधिनियम, 1948 तथा औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 में कारखाना मालिकों के पक्ष में मजदूर विरोधी संशोधन करने के निर्णय का ट्रेड यूनियनों के संयुक्त मोर्चे ने तीखा विरोध किया। आज इंदौर में ट्रेड यूनियनों के संयुक्त मोर्चा, मध्यप्रदेश द्वारा श्रमायुक्त कार्यालय पर सम्पन्न धरने तथा कार्यालय द्वार पर हुए जंगी प्रदर्शन में केन्द्रीय श्रमिक संगठनों के नेताओं ने राज्य सरकार की जमकर आलोचना की। इस धरना व प्रदर्शन में प्रदेश भर से संगठित-असंगठित श्रमिक, आशा ऊषा समेत योजना कर्मी, महिला श्रमिक, कोयला, भेल जैसे सार्वजनिक उपक्रम, बीमा, बैंक,केन्द्रीय कर्मचारी, मेडीकल रिप्रेजेंटेटिव्ह, औद्योगिक श्रमिक बड़ी तादाद में उपस्थित थे।


धरने व प्रदर्शन को संबोधित करते हुए इंटक प्रदेशाध्यक्ष श्याम सुंदर यादव, एटक प्रदेश महासचिव एस एस मौर्य, सीटू प्रदेश अध्यक्ष रामविलास गोस्वामी, एचएमएस के वरिष्ठ उपाध्यक्ष हरिओम सूर्यवंशी, एआईयूटीयूसी प्रदेश महासचिव रूपेश जैन, सेवा की रेखा सुर्वे, इंदौर के श्रमिक नेता सी एल सर्रावत, रामस्वरूप मंत्री, रुद्रपाल यादव, प्रमोद नामदेव, लक्ष्मीनारायण पाठक आदि ने कहा कि प्रदेश की भाजपा सरकार केंद्र द्वारा 29 श्रम कानूनों को समाप्त कर चार काली श्रम संहिताओं को पिछले दरवाजे से लागू करने की कोशिश में है।

संयुक्त मोर्चा के नेताओं ने कहा कि प्रदेश की सरकार कितनी श्रमिक विरोधी है, यह हाल में न्यूनतम वेतन पुनरीक्षण की प्रक्रिया व परिणाम में उजागर हुआ है। श्रमिकों के वैधानिक अधिकार पर कुठाराघात करते हुए सरकार ने न्यूनतम वेतन अधिनियम के तहत पांच वर्ष में न्यूनतम वेतन पुनरीक्षण के बजाय लगभग 10 वर्ष में 1 अप्रैल 2024 से पुनरीक्षण कर तथा नवंबर 2019 से मार्च 2024 तक की मासिक वृद्धि की राशि को मजदूरों के जेब से निकाल मालिकों की तिजोरी में डाल दिया। हद तो यह है कि प्रदेश के लाखों श्रमिकों को वैधानिक रूप से 1 अप्रैल 2024 से बड़ी दरें तथा एरियर्स देय हैं लेकिन प्रदेश के लाखों श्रमिक आज भी इन पुनरीक्षित दरों के एरियर्स तक से वंचित है। जिनमें दसियों हजार तो म प्र शासन व उसके अधीन कार्यरत बिजली कंपनियों के कार्यालयों में संविदा, आऊटसोर्स और ठेके आदि पर कार्यरत कर्मी है।
धरना व प्रदर्शन पश्चात श्रमिक नेताओं के नेतृत्व में श्रमायुक्त कार्यालय के गेट पर श्रमायुक्त व श्रम मंत्री को ज्ञापन सौंपा। ज्ञापन में मांग की गयी है कि कैबिनेट द्वारा श्रम कानूनों में बदलाव के निर्णय को तत्काल निरस्त कर प्रदेश के श्रमिकों पर हो रहे कुठाराघात पर रोक लगाई जाए। प्रदेश में श्रम कानूनों को सख्ती से लागू करने के लिए प्रभावी कदम उठाए जाए। प्रदेश में श्रमिकों से संबंधित सभी त्रिपक्षीय समितियों को कारगर किया जाए तथा उनके गठन में अनियमितताओं को दूर कर पूर्व से मान्य प्रावधानों व परंपराओं के अनुसार सभी प्रमुख केन्द्रीय श्रम संगठन के प्रतिनिधियों को उनमें शामिल किया जाए। रजिस्ट्रार व्यावसायिक संघ, मध्यप्रदेश के पद पर नियुक्ति संबंधी प्रक्रिया को तुरंत पूरा किया जावे। 01 अप्रैल 2024 से प्रभावशील न्यूनतम वेतन की पुनरीक्षित दरों को एरियर्स समेत भुगतान के लिए सख्त कदम उठाए जाए तथा आदेश का अनुपालन न करने वाले नियोक्ताओं व अधिकारियों पर सख्त कार्रवाई की जाए। मध्य प्रदेश में तीन नए नियोजनों की अधिसूचना 17 जनवरी 2025 में जारी हुई। हाल ही में न्यूनतम वेतन की पुनरीक्षण नवंबर 2019 से हुआ और अक्टूबर 2024 तक इसके 5 वर्ष पूर्ण हो गए। इसलिए टेक्सटाइल व उससे संबंधित अन्य नियोजनों के श्रमिकों को 17 जनवरी 2025 से पूर्व की अवधि का एरियर्स दिया जावे। चूंकि न्यूनतम वेतन का पुनरीक्षण वैधानिक रूप से वर्ष 2019 से देय था, अतः 2019 से आज दिनांक तक पुनरीक्षित दरों के एरियर्स का भी भुगतान किया जाए। 01 अक्टूबर 2024 से देय हो चुके न्यूनतम वेतन के नये पुनरीक्षण को शीघ्र कराया जाए। मध्य प्रदेश के टेक्सटाइल मिल्स एसोसिएशन ने प्रदेश सरकार से कारखाना अधिनियम 1948 में कार्य के घंटे 12 करने, कार्यावधि हेतु लचीला प्रावधान करने व एक पखवाड़े के ओवरटाइम की अवधि 125 से 150 घंटे करने की मांग की है। ऐसी मजदूर विरोधी मांगों को निरस्त किया जाए।
ट्रेड यूनियनों के संयुक्त मोर्चा, मध्यप्रदेश ने ज्ञापन में श्रमायुक्त व श्रम मंत्री से प्रभावी व सकारात्मक कदम उठाने की मांग करते हुए चेतावनी दी गयी कि यदि ऐसा नहीं होता तो प्रदेश स्तर की औद्योगिक शांति पर प्रतिकूल असर पड़ेगा।
उल्लेखनीय है कि ट्रेड यूनियनों के संयुक्त मोर्चा, मध्यप्रदेश ने इन्ही मांगों को लेकर 26 जून को प्रदेश के मुख्यमंत्री को भी पत्र दिया है।





