*अजय असुर
साथीयों यह लेख मैने घटना के पश्चात अन्तिम अरदास के बाद लिखा था। इस सुनयोजित जनसंहार के एक साल से ऊपर समय बीत गया पर इन शहीद किसानों को अभीतक न्याय नहीं मिला तो संयुक्त किसान मोर्चा ने उन शहीदों को न्याय के लिये 18 अगस्त से 21 अगस्त कुल 75 घण्टे का लखीमपुर में धरना जारी है और इस अवसर पर यह लेख आपको इस सुनयोजित जनसंहार की याद ताजा कर देगा कि इस सुनयोजित जनसंहार को कैसे अंजाम कैसे दिया गया था।*
3 अक्टूबर 2021 को केन्द्रीय गृह राज्यमंत्री अजय मिश्रा टेनी का बेटा आशीष मिश्रा उर्फ मोनू ने शांतिपूर्ण प्रदर्शन करके वापस जा रहे किसानों को अपने काफिले की कारों से बेरहमी से रौंद दिया। जिससे पांच किसान मौके पर ही शहीद हो गये तथा दर्जनों घायल हुए। मंत्रीपुत्र ने अपने बाप की सह पर अपने पालतू गुण्डों के साथ इस जघन्य कृत्य को अन्जाम दिया। यह सब मंत्री के उकसावे पर हुआ। इतनी बड़ी घटना हो जाने पर भी भारत के माननीय प्रधानमंत्रीजी के मुंह से एक शब्द भी नहीं निकले। माननीय मूक-बधिर प्रधानमंत्री जी ऐसे रिएक्ट कर रहें हैं, जैसे कोई घटना घटी ही नहीं। माननीय प्रधानमंत्रीजी एक कुत्ते की मौत पर दुखी हो जाते हैं पर पांच किसान की बर्बरता पूर्ण हत्या हो जाती है और उस पर एक भी शब्द नहीं फूटते।
सरकार का एक जिम्मेदार मंत्री भाषण देकर उकसाता है और उसका बेटा किसानों पर जीप दौड़ाता है, पांच किसानों की जान ले लेता है। फिर मंत्री, सरकार, प्रवक्ता और दलाल मीडिया मिलकर मंत्री के बेटे को बचाने के लिए अभियान चलाते हैं। क्या यह सुविधा, संसाधन और वीआईपी ट्रीटमेंट इस देश में किसी भी मेहनतकश जनता को हासिल है? इस घटना पर एक केंद्रीय मंत्री बोला है कि उनका भी दुख सुना जाना चाहिए।
उक्त नरसंहार की घटना सुनकर 4 अक्टूबर को हम अपने साथियों के साथ लखीमपुर खीरी जा रहे थे मगर सीतापुर में ही हमें रोक दिया गया। इसके बाद पांचो किसान शहीदों के परिवार वालों और घायल किसानों से मिलने के लिए तथा पूरे घटना की तहकीकात के लिए संयुक्त किसान मोर्चा की तरफ से हम (अजय असुर), मारूति मानव, गुरमीत सिंह महमा, राजेश, तजेन्द्र चीमा, सुखवेंद्र सिंह, शशिकांत आदि तिकुनिया, लखीमपुर खीरी गये। वहां आयोजकों, प्रत्यक्षदर्शी किसानों, शहीद किसानों के परिवार और घायल किसानों से बात किया तो पूरी सच्चाई का पता चला।
प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार घटनाक्रम:-
लखीमपुर से 80 किलोमीटर दूर तिकुनिया थाना है, जहां से 4 किलोमीटर दूर बनबीरपुर गांव है जो केन्द्रीय गृह राज्यमंत्री अजय मिश्रा टेनी का पैतृक गांव है, जंहा प्राथमिक पाठशाला में दंगल का आयोजन था। इसके अध्यक्ष रहे मंत्री अजय मिश्रा टेनी के बेटे आशीष मिश्रा ऊर्फ मोनू टेनी। अपने पैतृक गांव में लगभग चालीस साल से जनवरी महीने में मकरसंक्रांति (खिचड़ी) के पर्व पर टेनी के परिवार के लोग दंगल कराते रहे हैं। पता नहीं किस साज़िश के चलते इस साल इसका आयोजन अक्टूबर महीने में किया जा रहा था।
कार्यक्रम में केंद्रीय मंत्री अजय मिश्रा टेनी के अलावा उत्तर प्रदेश के उप-मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य को भी शामिल होना था। जिसके लिए उप-मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य को हेलिकॉप्टर से तिकुनिया उतरना था, जिसके लिए तिकुनिया में एक अस्थाई हेलीकाप्टर हेलीपैड बनाया गया था। केंद्रीय मंत्री की धमकी के विरोध में प्रोग्रेसिव फार्मर फ्रंट के गुरमनीत सिंह मांगट ने किसानों से आवाह्न किया था कि तिकोनिया गांव में उपमुख्यमंत्री के लिए निर्मित अस्थाई हेलीपैड पर रविवार 3 अक्टूबर को सुबह 9 बजे काले झंडे के साथ एकत्र होना है। इसलिए लखीमपुर खीरी और आसपास के और जिलों के किसान प्रदर्शन के लिए लखीमपुर के पलिया के तिकुनिया में जुटे थे।
सुबह करीब साढ़े नौ बजे आसपास के गांवों से हजारों की संख्या में किसान तिकुनिया हैलीपैड पर जमा हो चुके थे। वहां आयोजकों की अपेक्षा से कहीं अधिक भीड़ इकट्ठा हो गयी थी, और इसके बाद यह निर्णय लिया गया कि काले झंडे दिखाने के अलावा, वे अस्थायी हेलीपैड को भी अपने कब्जे में ले लेंगे ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि वहां हेलिकॉप्टर उतर ही न पाए जिससे उप-मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य का कार्यक्रम रद्द हो जाए और समय बीतने के साथ-साथ हेलीपैड वाले मैदान के अंदर और सड़क पर भी काफी किसान आ गए थे। प्रदर्शन के दौरान भी बहुत सारे वाहन सड़क से गुजरे, उनमें से ज्यादातर स्थानीय भाजपा नेताओं के थे, जो दंगल देखने के लिए बनबीरपुर जा रहे थे। किसी को भी रोका या मारा नहीं गया, ना ही किसी भी गाड़ी पर पत्थर चलाए गए। प्रत्यक्षदर्शी किसानों, शहीद किसानों के परिवार और घायल किसानों से बात कर पता चला कि सुबह 10 बजे तिकुनिया गाँव में निर्मित अस्थाई हेलीपैड को किसानों ने घेर लिया और 10:30 बजे के करीब किसान हेलीपैड पर कब्जा कर लिया और हेलीपैड पर ट्रैक्टर खड़ा कर दिया। दोपहर करीब सवा दो बजे ड्यूटी पर तैनात एसडीएम ने किसान नेताओं को बताया कि उप-मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने बनबीरपुर जाने के लिए अपना रास्ता बदल लिया है। कार्यक्रम स्थल पर आगमन का रोड रूट बदलने के कारण कार्यक्रम खत्म करने की घोषणा तराई किसान संगठन के अध्यक्ष तजिंदर सिंह विर्क ने किसानों की जीत का दावा करते हुए अंतिम भाषण के साथ किया और सभी के प्रति धन्यवाद प्रकट किया। उसके बाद किसान सड़क पर बहुत आराम से वापस अपने घरों की तरफ जा रहे थे, किसानों के हाथ में काले झंडे थे। चूंकि प्रदर्शन ख़त्म करने की घोषणा हो गई थी और किसानों को ये बताया जा रहा था कि गुरुद्वारे से चाय आ चुकी है, अत: चाय पीकर किसानों को घर लौटना था। 2:30 बजे ही सब मैदान से बाहर चले गए थे। मैदान के किनारे से शूट किया गया एक छोटा सा वीडियो दाईं ओर से प्रवेश करते तीन वाहनों को दिखाता है। एक दूसरे वीडियो का एक हिस्सा, कारों को बाईं ओर से आते हुए दिख रहा है, जो पहले थोड़ा धीमें और फिर अचानक तेज हो जाता है। इस वीडियो में लोगों को यह कहते हुए दिखाया जाता है कि इन कारों की वजह से कोई दुर्घटना हो सकती है और लोगों को उनके पीछे रोकने के लिए भागते हुए भी दिखता है। दंगल का कार्यक्रम लगभग खत्म हो चुका था इसके बाद तकरीबन दोपहर 3:30 बजे बनबीरपुर की तरफ से तीन गाड़ियां आती हैं, जिसमें सबसे आगे थार महेन्द्रा जीप थी, उसके बाद काले रंग की फारचयूनर तथा उसके पीछे सफेद रंग की स्कार्पियो थी जो हूटर बजाती हुई तकरीबन 80-100 की रफ्तार से आई और तीनों गाड़ियां प्रदर्शनकारियों को रौंदती हुई चली गईं। यदि आगे रास्ते में बस ना खड़ी होती तो ये लोग बचकर साफ निकल जाते। सबसे पहले थार की चपेट में नौजवान किसान लवप्रीत सिंह, 18 वर्ष और उसका मित्र प्रभजीत सिंह 17 वर्ष आए, गाड़ी की टक्कर से लवप्रीत वहीं सड़क पर गिर गया और जसप्रीत ठोकर खाकर हवा में उड़कर थोड़ा दूर खेतों में जा गिरा। सड़क पर गिरे घायल लवप्रीत को पीछे से आ रही फार्चूनर और स्कार्पियो ने कुचल के मार दिया, लवप्रीत की मृत्यु मौके पर नहीं हुई उन्हें अस्पताल ले जाया जा रहा था उसी दौरान रास्ते में अस्पताल पहुंचने से पहले ही हो गयी थी। यदि ये फारच्यूनर और स्कार्पियो ना होती तो निश्चित ही शहीद लवप्रीत बच जाता। लवप्रीत और प्रभजीत दोनों ही स्थानीय गांव चौखड़ा फार्म के निवासी थे जो तिकुनिया से नजदीक ही है। कार्यक्रम खत्म होने के बाद वे घर जाने के लिए अपनी मोटरसाइकिल लेने जा रहे थे। उसके बाद किसान दलजीत सिंह 35 वर्ष अपने दो बेटों के साथ सड़क के एक किनारे खड़े बात कर रहे थे पर वो भी गाड़ियों के चपेटे में आ गए। आशीष टेनी और उनके गुण्डे पूर्वनियोजित प्लान के तहत ही वंहा पर आए जो कि किसानों को गाड़ियों तले रौंदना रखते थे और सड़क किनारे खड़े दलजीत सिंह और उनके दोनों बेटों को भी को बहुत ही तेज से थार की टक्कर लगी और दोनों लड़के घायल अवस्था में सड़क किनारे खेतों में जा गिरे और शहीद दलजीत सिंह ठोकर खाकर वहीं सड़क पर ही गिर गए जिससे पीछे से आयी दोनों गाड़ियां भी शहीद दलजीत सिंह को रौंदते हुवे आगे बढ़ गयीं। पर शहीद दलजीत सिंह वहां गंभीर अवस्था में घायल होकर अचेत अवस्था में पड़े रहे और उनके बेटों और बाकी किसान साथियों की मदद से उनको अस्पताल के लिए रवाना कर दिया गया पर अफसोस कि दलजीत सिंह भी अस्पताल पहुंचने से पहले ही रास्ते में शहीद हो गये। शहीद किसान दलजीत सिंह का बड़ा बेटा राजदीप जो कि 16 वर्ष का है उसके अनुसार लवप्रीत सिंह, दलजीत सिंह आदि को रौंदते हुए बीच में जो भी आया उनको भी रौंदते हुए किसान नक्षत्र सिंह 60 वर्ष, किसान नेता तजिंदर सिंह विर्क सहित कुछ और किसान जो आपस में बात करते हुए धीरे-धीरे चल रहे थे, भी गाड़ियों की चपेट में आ गए, जिसमें से तेजिंदर सिंह विर्क, गुरजीत सिंह कोटिया, शमशेर सिंह आदि किसान घायल हो गए और किसान नक्षत्तर सिंह मौके पर ही शहीद हो गये। उसके बाद गुरविंदर सिंह 19 वर्ष और कई किसान थार की चपेट में आए जिसमें गुरविंदर सिंह को थार से ठोकर लगी और घायल होकर सड़क के नीचे खेतों में चला गया और आशीष मिश्रा के थार गाड़ी से उतरने के बाद मौके से पैदल भागने से बाकी किसानों (कुछ किसान आशीष मिश्रा टेनी को पकड़ने के लिए उसके पीछे भगे थे) से बचने के लिए गोली फायर कर रहा था और खेत में पड़े घायल किसान गुरविंदर सिंह को एक गोली लग गयी जिससे गुरविंदर सिंह की मौके पर ही मौत हो गयी। वंही गुरविंदर सिंह के सेवादार के साहब सिंह ने भी दावा किया है कि पहले गुरविंदर सिंह को गोली मारी गयी है फिर गाड़ी चढ़ी है गुरविंदर सिंह के ऊपर और उस वक्त पुलिस भी मौजूद थी पर पुलिस मदद करने के बजाए आशीष मिश्रा टेनी को बचा के ले गयी। इससे साफ प्रतीत होता है कि किसान गुरविंदर सिंह की मौत गोली लगने से ही हुई है। साहब सिंह और गुरविंदर सिंह साथ में ही तिकुनिया आए थे। इसके बाद आखिर में किसान पत्रकार रमन कश्यप 35 वर्ष की मृत्यु हुई, जो कि थार गाड़ी के नीचे पहिए में फंस गया। कुछ प्रत्यक्षदर्शी किसानों के अनुसार करीब 600 मीटर चलने के बाद थार अचानक रुक गई और पक्की सड़क से नीचे उतर गई क्योंकि यह एक मृत शरीर को अपने नीचे खींच रही थी और इस कारण आगे नहीं बढ़ पा रही थी और वह शरीर शहीद रमन कश्यप का था। थार गाड़ी रुकते ही आशीष मिश्रा मोनू गाड़ी से उतर कर मौके से भागने लगा कुछ किसान आशीष मिश्रा टेनी को पकड़ने के लिए उसके पीछे दौड़े थे, वह फायर करते हुए भाग रहा था जिससे खेत में घायल पड़े किसान गुरविंदर सिंह को एक गोली लग गयी जिससे गुरविंदर सिंह की मौके पर ही मौत हो गयी। कुछ प्रत्यक्षदर्शी किसान बताते हैं कि आशीष मिश्रा को भागते हुए गुरविंदर सिंह ने पकड़ लिया और आशीष मिश्रा ने छूटने के लिए गोली मार दी जिससे गुरविंदर सिंह की वहीं मौके पर मृत्यु हो गयी।
शहीद रमन के छोटे भाई पवन कश्यप के मुताबिक भाई रमन कश्यप पार्ट टाइम पत्रकारिता साधना न्यूज में कर रहे थे। घर नहीं पहुंचने के कारण सब चिंतित थे और भाई का फोन भी नहीं मिल रहा था। रात को तीन बजे के क़रीब उनके फ़ोन पर तिकुनिया थाने की पुलिस की कॉल आई थी, लेकिन वो कॉल उठा नहीं पाए। कुछ देर बाद पुलिस ने उनके चाचा को फोन किया और लखीमपुर खीरी मोर्चरी पहुंचने के लिए कहा गया। हम लोग सुबह चार बजे के करीब मोर्चरी पहुंचे। मेरे भाई पवन का शव घटना में मारे गए बीजेपी समर्थकों के साथ जमीन पर रखा था। हमने उनके कपड़ों से पहचान की।
आगे पवन बताते हैं कि भैया मोर्चरी में जमीन पर पड़े हुए थे। उनके शरीर से ताजा खून बह रहा था। पुलिस ने उन्हें अस्पताल नहीं पहुंचाया बल्कि सीधे मोर्चरी पहुंचाया। उनके शरीर पर चोटें इतनी गंभीर नहीं थीं कि उनकी मौके पर मौत हो जाए। यदि उन्हें डॉक्टरों को दिखाया गया होता तो वो बच जाते। उनके शव की तस्वीरें दिखाते हुए पवन बताते हैं कि मैंने उनके शरीर की एक-एक चोट देखी, कहीं भी पीटे जाने का निशान नहीं था। सड़क पर घिसटने की खरोंचे थीं। उनकी बांह से कोलतार चिपका था, शरीर में कई जगह बजरी लगी थी जैसे वो कार के साथ दूर तक घिसटे हों। रमन के सबसे छोटे भाई बताते हैं कि आलू की तरह शरीर छीला हुआ था। आगे शहीद रमन के छोटे भाई ने बताया कि ‘आजतक’ चैनल वालों ने धमकाते हुए यह बयान देने को कहा था कि आप रमन को किसानों द्वारा पीट-पीट कर मारने का बयान दीजिए परंतु उन्होंने बगैर डरे ‘आजतक’ को झूठा बयान देने से मना कर दिया, जिसका विडियो भी खूब वायरल हुआ।
पुलिस की भूमिका पर सवाल उठाते हुए रमन के पिता ने कहा कि उन्हें बेटे की मौत की जानकारी 9-10 घंटे बाद दी गई। बेटे के हत्यारों को सजा दिलवाने के लिए उन्होंने पुलिस शिकायत भी दर्ज करायी है लेकिन उन्हें अभी तक न तो एफआईआर की कॉपी मिली और न ही पोस्टमार्टम रिपोर्ट की दी गई है। हालांकि, मुआवजे के तौर पर 45 लाख रुपये का चेक जिला प्रशासन ने रमन की पत्नी को सौंप दिया है। उन्होंने आगे प्रशासन की संवेदनहीनता पर सवाल खड़े करते हुये कहा है कि – “यह घटना तकरीबन पौने 4 बजे की है। ना तिकोनिया और ना ही निघासन में उसका इलाज किया गया। सीधे-सीधे लखीमपुर में उसके शव को पोस्टमॉर्टम के लिए भेज दिया गया। अगर सही समय पर बेटे को इलाज मिल जाता तो उसकी मौत नहीं होती।
घटनास्थल पर मौजूद पत्रकार विनीत कुमार गुप्ता बताते हैं कि – किसान काला झंडा दिखाने का अपना कार्यक्रम कर रहे थे, तभी बीजेपी की तीन गाड़ियां तिकोनिया से आ रही थीं और उनकी स्पीड काफ़ी ज्यादा था। आगे एक थार गाड़ी थी। उसके पीछे फॉरच्यूनर थी। किसान प्रदर्शन कर रहे थे और उनके बीच में हमारा पत्रकार भाई था जब उसे ठोकर लगी तो वह गिर गया। इसके बाद पीछे चोट लगी और उसे घसीटते हुए निकल गए। जब यह घटना घटी तब सब लोग अपनी जान बचाने के लिए भाग रहे थे, लेकिन प्रशासन सिर्फ बीजेपी कार्यर्ताओं को बचाने में लगा हुआ था।
घायल किसान शमशेर सिंह बताते हैं कि रविवार 3 सितंबर को मुझे गाड़ी से ठोकर मारी गई और मेरा पाँव फ़्रैक्चर हो गया था सिर पर चोट आई है और शरीर पर रगड़न लगी है। मेरे पिता पीछे थे लेकिन वो बच गए आगे शमशेर बताते हैं कि वहाँ मौजूद किसान उन्हें उठाकर अस्पताल ले गए। उन्होंने सोचा नहीं था कि ऐसा हादसा हो जाएगा।
कार्यक्रम के मुख्य आयोजक किसान गुरमनीत सिंह मांगट जी के अनुसार सबसे पहले, महिंद्रा थार उस ओर मुड़ी जहां मैं खड़ा था। मेरे पास खड़े किसी व्यक्ति ने मुझे खींच कर किनारे कर दिया। फिर वह दूसरी तरफ मुड़ गयी। एक व्यक्ति पूरी तरह कुचल गया और दूसरा गाड़ी के धक्के से हवा में फेंका गया। (जो कुचल गया वो शहीद लवप्रीत और जो ठोकर से हवा में उछल कर दूर जा गिरा वो प्रभजीत) चूंकि प्रदर्शनकारी सड़क के किनारे थे, इसलिए यह अगल-बगल घूमता रहा और जितने लोगों को चोट मार सकता था, मारा। मांगट आगे बताते हैं कि जैसे ही यह थार रुकी, उसके पीछे चल रही काली (टोयोटा) फॉर्च्यूनर दुर्घटनाग्रस्त होने से बचने के लिए तेजी से दाहिनी ओर मुड़ी और उससे आगे निकलने की कोशिश की, लेकिन वह भी सड़क से उतर गई। आगे एक बस खड़ी थी और उसके बाहर निकलने के लिए कोई जगह नहीं थी। दोनों वाहनों के रास्ते से हटने के साथ ही तीसरी गाड़ी स्कार्पियो आगे निकल गयी। मांगट जी दावे के साथ कहते हैं कि उन्होंने और कई किसानों ने आशीष मिश्रा मोनू और उनके लोगों को थार से उतरते हुए और गन्ने के खेतों की ओर भागते हुए देखा था। आगे मांगट जी बताते हैं कि थार से आशीष मिश्रा को निकलकर भागते हुए जब स्थानीय लोगों ने उसे देखा तो पहचान लिया और डर के मारे उससे दूर भागने लगे क्योंकि उसके हाथ में पिस्तौल थी और वो लगातार फायरिंग कर रहा था। जिससे उसके आगे की जगह खाली हो गई, और वहां की पुलिस भी उसके पीछे गयी और उनके गन्ने के खेतों में भागते समय उन्हें कवर फायर दिया। एक छोटे से वीडियो क्लिप के हवाले से मांगट जी की बात सही साबित हो जाती है, जिसमें प्रदर्शनकारियों को पुलिस के पीछे खेतों में दौड़ते हुए दिखाया गया है जिसमें वे कह रहें हैं कि उन्हें (पुलिस को) उसे (आशीष मिश्रा को) भागने में मदद नहीं करनी चाहिए थी। इस विडियो से ये भी स्पष्ट हो जाता है कि प्रशासन ने भी खुलकर टेनी और उनके गुंडो की मदद की। निश्चित ही अगर पुलिस प्रदर्शनकारियों को नहीं रोकती तो टेनी और आर एस एस के गुंडे पकड़े जाते।
यह बताते हुए मांगट के आंखो से आंसू आ जाते हैं और बहुत ही भावुक हो होकर बताते हैं कि जब कार्यक्रम खत्म हो गया और सब घर की तरफ वापस जा रहे थे। ये सब इतनी तेजी से हुआ कि कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि ये सब क्या हो गया। मैं वाहनों की ओर भागा। वहां का नजारा बहुत ही वीभत्स था, लोग सड़क पर बिखरे पड़े थे और उनके टूटे हुए हाथों और पैरों से खून लगातार निकल रहा था। जगह-जगह सड़क खून से लाल हो गयी थी, कुछ की मौके पर ही मौत हो चुकी थी और कुछ लोग घायल पड़े कराह रहे थे। चारों और चीख और चित्कार….. ये सब देखकर दिल बैठा जा रहा था। मैंने किसी तरह खुद को सम्हाला और ड्यूटी पर तैनात अतिरिक्त एसपी और अतिरिक्त डिप्टी कमिश्नर की तलाश की, जो कारों के आगे खड़े थे तथा और अधिक सुरक्षा बलों के आने के लिए कॉल कर रहे थे।
अब मुख्य सवाल यह है कि जब मंत्री के आने का रूट बदल दिया गया था तो फिर मंत्री टेनी के बेटे की गाड़ियां उस रोड पर क्यों आईं जिस पर प्रदर्शनकारी मौजूद थे? इससे साफ-साफ नजर आता है कि वे प्रदर्शनकारी किसानों को सबक सिखाने के लिए आये थे जैसा कि केंद्रीय गृह राज्यमंत्री अजय मिश्रा टेनी 25 सितंबर को धमकी देते हुए कहते हैं कि अगर मैं उतर जाता तो उनको भागने का रास्ता नहीं मिलता…. हम सुधार देंगे, दो मिनट लगेगा केवल…. और धमकी के अनुसार किसानों को सुधारने और दहशत पैदा करने के लिए प्रायोजित कार्यक्रम के तहत मंत्री के बेटे आशीष मिश्रा और उसके साथी साथ में आर एस एस के गुंडे तेज रफ्तार में तीन गाड़ियों से आए और उन्होंने किसानों को कुचल दिया। एक और बात उल्लेखनीय है कि जब घटनास्थल से थार जीप के एक व्यक्ति परेसहरा गांव निवासी मृतक हरिओम मिश्रा जिसे आशीष मिश्रा अपना ड्राइवर कहता है, को लोगों ने पकड़ कर पहले पीटा और कुछ किसानों के बीच-बचाव के बाद पूछ-ताछ कर पुलिस को सौंप दिया था और जिसका फोटो भी उपलब्ध है और इस फोटो में ड्राइवर हरिओम मिश्रा ठीक-ठाक अवस्था में था और अपने पैर से चल कर जा रहा था तो पुलिस कस्टडी में उसकी मृत्यु कैसे हो गई? और दूसरा सवाल हरिओम मिश्रा की लाश घटनास्थल से अलग कैसे मिली?
एक अन्य वीडियो में, वहां खड़ा होकर देखने वाले लोग गाड़ियों के जलने के साथ होने वाले तेज़ धमाकों के बारे में बात कर रहे हैं। एक दूसरे वीडियो में गोलियों की आवाज भी सुनाई दे रही है। निश्चित ही ये वाहन गोला-बारूद से भरे हुए थे, जो फट रहे थे। पुलिस को जली हुई थार से कई कारतूस भी मिले हैं जो साफ-साफ तस्दीक भी कर रहें हैं और अब तो वारदात के बाद घटनास्थल की जांच में वहां 315 बोर के खाली कारतूस भी बरामद हुए। जिससे साफ पता चलता है कि घटना के दौरान निश्चित ही फायरिंग की गई थी। जिससे टेनी बार-बार मुकर रहे थे।
बाद में सोशल मीडिया पर वायरल हुई एक अन्य वीडियो क्लिपिंग से पता चला कि सफेद शर्ट वाला जीप चला रहा व्यक्ति गृह राज्य मंत्री अजय मिश्रा टेनी का बेटा आशीष मिश्रा ही था, जबकि मंत्री और उसका बेटा घटनास्थल पर मौजूद न होने का दावा करते रहे हैं। पुलिस को घटनास्थल से पहले का एक सीसीटीवी फुटेज मिला है जिसमें आशीष मिश्र जीप में ड्राइवर सीट पर बैठते हुए दिखाई देता है। घटनास्थल पर ड्राइविंग सीट पर सफेद शर्ट वाला व्यक्ति ही दिखाई देता है, जिससे से यह सिद्ध हो गया है कि थार जीप को चला रहा व्यक्ति आशीष मिश्रा ही था जिसे अब गिरफ्तार किया गया है।
‘आज तक’ के एक इटरव्यू में आशीष मिश्रा कहते हैं, वहां घटनाक्रम में हमारी गाड़ी फार्चूनर जला दी गयी। लेकिन हमको कुछ नहीं हुआ, हम बिल्कुल टना-टन आ गए भाईसाब। अब इस पर पत्रकार ने आशीष मिश्रा टेनी उर्फ मोनू की बात पकड़ लेता है और पलटकर आशीष से पूछता है कि फिर आप कैसे आ गए, तब वह अपनी गलती को सुधारते हुए अपनी बात से पलट जाता है और साफ-साफ झूठ बोल देता है। झूठ कितना भी छिपा लें, कहीं न कहीं सच सामने आ ही जाता है और आखिर आशीष के मुंह से सच आ ही गया। उस विडियो को देखकर आप स्वयं सोचें, जो खुद कबूल कर लेता है फिर भी शासन/प्रशासन बहरा बना हुआ है। दलाल मीडिया और उसका पत्रकार भी उस बात पर घेरने की बजाए चुप्पी साध लेता है और जो आशीष कहता है वो मान लेता है।
आप हरी ओम मिश्रा की घटना के वक्त की फोटो देखें तो पाएंगे कि ड्राइवर हरी ओम मिश्रा पीली धारीदार कमीज पहने था जबकि घटना के समय ड्राइवर सफेद रंग की कमीज पहने था जैसा कि भक्त और दलाल मीडिया बार-बार चिल्ला-चिल्ला कर बता रहें हैं कि थार को चलाने वाला सफेद शर्ट में जो व्यक्ति दिख रहा है वो आशीष मिश्रा नहीं बल्कि उनका ड्राइवर हरिओम मिश्रा है। तो आप पहले स्वयं सोचें कि क्या जादू से पीली शर्ट सफेद बन जाती है। जबकि हरिओम मिश्रा इनका राज ना खोल दे इसी डर से उसकी सत्यता की जाती है और किसानों को बदनाम करने के लिए कि देखो ये किसान नहीं खालिस्तानी/मावोवादी/नक्सली…. लोग हैं जो किसान के भेष में बैठे हैं, और तय प्रोग्राम के तहत दलाल मीडिया और उसके पत्रकार चिल्ला-चिल्ला कर गला फाड़कर किसानों को बदनाम कर रहें हैं। इसलिए हरी ओम मिश्र की हत्या कर दी गई, यानी एक तीर से दो निशाने। इसलिए हरी ओम मिश्रा की मौत की जांच किए जाने की भी जरूरत है। यदि हरी ओम मिश्रा की मौत की निष्पक्ष जाँच होती है तो निश्चित ही घटना की सत्यता साफ-साफ नजर आ जाएगी।
दूसरा शख्स श्यामसुंदर निषाद निवासी जैपरा सिंगहाकला थाना सिंगाही की है। जो कि भाजपा का मंडल मंत्री था। वायरल फोटो और वीडियो में श्यामसुंदर निषाद जिंदा दिख रहा है और पुलिस हिरासत में है। उसके शरीर पर चोट है और खून बह रहा है। पर वह अपने पैरों पर चलता हुआ जाता नजर आ रहा है। जिससे यह साफ है कि उसको पीटा गया है, गौर करने वाली बात है कि श्यामसुंदर निषाद की इतनी हालत खराब नहीं दिख रही कि वह मर जाए लेकिन बाद में उसका शव लाया गया। वायरल वीडियो जिसमें किसान उससे अजय मिश्रा टेनी के बारे में सवाल पूछ रहे थे, उसे जवाब देते समय मारते हुए दिखाया गया है और यहीं पर यह वीडियो खत्म हो जाता है, लेकिन हकीकत यह है कि बाद में उसे पुलिस के हवाले कर दिया गया था। जिसकी फोटो पुलिस के साथ चलते हुए खुद पुलिस ने ही शेयर किया था। साजिशन श्यामसुंदर निषाद को किसानों द्वारा मारे गए शख्श के रूप में गिनाया जाता है। जबकि उस विडियो में श्यामसुंदर दहशत में तो दिख रहा है पर फिजिकली ठीक था। यही तस्वीर भाजपा कार्यकर्ताओं ने अपने फेसबुक पेजों पर साझा की है, जिसमें आरोप लगाया गया है कि पुलिस द्वारा ले जाये जाने के बावजूद शाम सुंदर को किसानों ने मार डाला। यह आरोप बिल्कुल बेबुनियाद और गलत है क्योंकि उस वक्त पुलिस इस पर कुछ भी कहने से बच रही थी और कहीं भी किसी भी स्टेटमेंट में पुलिस ने यह नहीं कहा कि पुलिस की कस्टडी से जबरन खींचकर श्यामसुंदर निषाद की हत्या किसानों ने की। ऐसे ही कई सवाल अब उठने लगे हैं। भाजपा के ही जिला उपाध्यक्ष विजय शुक्ला रिंकू ने सवाल उठाया है और कहा है कि पुलिस को यह जांच करनी चाहिए।
तीसरा शख्स लखीमपुर के गढ़ी गांव में बीजेपी के बूथ अध्यक्ष शुभम मिश्रा हैं। जिन्हे घटना के सबसे पहले वायरल वीडियो में तथाकथित किसान लोग डंडो से पीट रहें हैं। इस पर भी सवाल उठ रहा है कि घटना घटित होने के कुछ ही घंटो में ये वीडियो दलाल मीडिया और आर एस एस की आईटी सेल वायरल करती है, जबकि शासन ने पूरे लखीमपुर में और उससे सटे बहराइच के कुछ क्षेत्रों में इंटरनेट सेवा बन्द कर दिया था तो दलाल मीडिया तक वह वीडियो कैसे पहुंचा? यदि किसी तरह पहुंचा भी तो सिर्फ वही वीडियो ही क्यूँ पहुंचा? इस नरसंहार के और भी कई वीडियो जो कि बाद में सोशल मीडिया में वायरल हुए वे क्यूँ नहीं उस वक्त पहुंचे? क्योंकि ये कोई हादसा नहीं ये प्रायोजित नरसंहार था और हमें तो शक ही नहीं यकीन है कि जो किसान शुभम मिश्रा को लाठी-डंडो से पीट रहें हैं वो उन्हीं मंत्री अजय मिश्रा टेनी और आर एस एस के गुंडे थे जो किसान की भेष में किसानों के बीच में घुस गए थे और शुभम मिश्रा की पीट-पीट कर सुनियोजित हत्या करते हैं और उसी का वीडियो शूट कर वायरल करते हैं। यदि मेरा सोचना गलत है तो दलाल मीडिया के पास दूसरा वीडियो क्यूँ नहीं पहुंचता? क्योंकि ये वीडियो उन्हीं के लोगों ने प्रायोजित होकर बनायी थी। अब यहां पर कुछ लोग सवाल उठाएंगे कि वो लोग अपने आदमी को क्यूँ मारेंगे? सुनियोजित घटना में पीट-पीट कर मारा जाना तो तय रहा होगा पर कौन मरेगा ये उस वक्त की भौतिक परिस्थितयों पर निर्भर करता है, अब उस वक्त की भौतिक परिस्थियों में श्याम सुंदर, हरिओम मिश्रा, शुभम मिश्रा या और भी कोई हो सकता था और वैसे भी जब अपनी सत्ता बचाने के लिए पुलवामा कांड करवा कर देश के सैनिकों को मार सकते हैं तो ऐसे छोटे-मोटे कार्यकर्ता की क्या बिसात। कुर्बानी तो छोटे-मोटे कार्यकर्ताओं और भक्तों को ही देनी पड़ती है। तो भक्तों आप चिन्ता ना करें जल्द ही आपकी भी बारी आएगी।
कुछ अन्धभक्त लोग किसानों को ही अपराधी बताने पर तुले हुए हैं, और किसानों के खिलाफ कानूनी कार्यवाही की मांग कर रहे हैं। बेशक हर हत्या उतना ही बड़ा अपराध है, फिर भी यदि उनकी बात मान लें तो भी एक मंत्री और उसका बेटा अगर एक प्रायोजित नरसंहार को अंजाम देते हैं तो वे पूरे सिस्टम को रौंदने के अपराधी हैं। जीप दौड़ाकर बर्बरतापूर्वक किसानों को रौंद देना और बदले में गुस्साई भीड़ की प्रतिक्रिया की तुलना नहीं हो सकती। जिन्हें जिम्मेदार होना चाहिए, उन् अपराधियों को मुक्त करके अगर बलि का बकरा किसानों को बनाना है तब तो आपकी नजर में हर तर्क जायज है। आप तर्क दीजिए और अंधराष्ट्रवाद की भक्ति में लीन रहिए। तर्क देने वाले भाईसाब चिन्ता ना करें कल सत्ता के अहंकार में चूर वही जीप आपको भी रौंदेगी।
एक मंत्री ने तो कहा कि दूसरे पक्ष को भी सुना जाना चाहिए, दूसरी तरफ के लोग भी तो मरे हैं। हां बिल्कुल मरे हैं, वह दुखद है! लेकिन मंत्री के बेटे का किसानों को जीप से रौंद देना और बदले में गुस्साए किसानों का उन्हें पीटना बराबर नहीं है। यह देश कृषि प्रधान देश है। यह देश किसान और उनकी किसानी से चलता है। ये हमारे अन्नदाता हैं। जब आप कोई काम धंधा करते हैं, धंधा घाटे में चले जाने पर उसे बन्द कर दूसरा धंधा कर लेते हैं पर किसान जाड़ा, गर्मी, बरसात की परवाह ना करते हुए भी किसानी घाटे में जाने के बावजूद भी किसानी नहीं छोड़ता। यदि वो किसानी छोड़ अन्न उपजाना बन्द कर दें तो हम-आप भूखे मर जाएंगे। हमारे आपके पास कितना भी पैसा हो जाए तो खाएंगे अन्न ही, रुपया, पैसा सारी की सारी दौलत धरी की धरी रह जाएगी। देश के लाखों-करोड़ों किसान मिलकर ही देश बनाते हैं और उनके बेटे इस देश की सीमा रक्षा करते हैं। इस देश के किसान अपने खून पसीने से इस देश को तिनका-तिनका बनाते हैं। लेकिन न्यू इंडिया में जवान हो या किसान, जिसके भी मुंह में जबान है, जो सिस्टम के खिलाफ बोल सकता है उसे उपद्रवी कह देना अब बहुत आसान है।
अगर मंत्री, नेता, अधिकारी, सिपाही और आम जनता सबको आप एक तराजू में रखेंगे तो न कोई कानून बचेगा, न कोई व्यवस्था बचेगी। यदि बीजेपी कार्यकर्ता शुभम मिश्रा को मारने वाले आर एस एस के गुंडे नहीं किसान ही थे, तो आप सबसे पहले घटना को याद करें कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर किसान वापस जा रहे थे, उसी समय केंद्रीय गृह राज्य मंत्री अजय मिश्रा टेनी के बेटे आशीष मिश्रा व आर एस एस के गुण्डों ने किसानों को पीछे से गाड़ियों द्वारा बर्बरतापूर्वक रौंद डाला। इस बर्बरतापूर्ण हमले से 5 किसान, जिसमें रमन कश्यप एक किसान जो पार्ट टाइम पत्रकार था, शहीद हो गया दूसरे कई किसान सड़क पर और नीचे खेत में घायल अवस्था में पड़े कराह रहें हैं और चिल्लाकर गाड़ी से रौंदने वालों को पकड़ने के लिए कह रहें हैं और उन किसानों के नेता तेजिंदर सिंह विर्क गंभीर हालात में घायल होकर सड़क पर पड़े हैं। तो ऐसी अवस्था में जंहा मौत का तांडव उन किसानों के सामने मचाया जा रहा हो तो क्या गुस्सा नहीं आएगा। उस वक्त सही क्या है? गलत क्या है? ध्यान नहीं रहता। जब हम परिवार, रिश्तेदार, मित्र…. के साथ होते हैं और उस वक्त कोई बाहरी व्यक्ति आकर परिवार, रिश्तेदार, मित्र…. को पीटने लगता है तो सबसे पहले अधिकतर लोग उसे छुड़ाकर उस बाहरी लोगों को पीटने लगते हैं, बगैर वजह जाने, चाहे गलती उनके परिवार, रिश्तेदार, मित्र…. की ही क्यों ना हो। घटना घट जाने के बाद हम जानने की कोशिश करते हैं और उक्त घटित घटना पर सोचकर पछताते हैं। तो इतनी बड़ी घटना घट जाने के बाद किसी भी व्यक्ति का गुस्सा होना स्वाभाविक है फिर भी गुस्से का प्रतिफल देखिये कि शुभम मिश्रा पकड़ में आया तो किसानों ने उसे पुलिस के हवाले कर दिया। इसके अलावा दो-तीन लोग और चढ़े किसानों के हत्थे, पर वंहा कुछ किसान और नेताओं ने स्थिति को सम्हाला और पकड़े गए लोगों को भी वहां मौजूद पुलिस के हवाले कर दिया। मगर पुलिस हिरासत में उनकी मौत कैसे हो जाती है? ये बड़ा सवाल है। शुभम मिश्रा को लाठी और डंडो से पीटने वालों का वीडियो शासन/प्रशासन के पास मौजूद है, जिसमें मारने वाले साफ-साफ नजर आ रहे हैं तो सरकार उन तथाकथित किसानों/गुंडो को बेनकाब कर सबके सामने क्यूँ नहीं लाती और बताती कि वो फलां-फलां किसान है जिन्होने बेरहमी से शुभम मिश्रा को मारा है। यदि सरकार ऐसा करती है तो खुद ही बेनकाब हो जाएगी क्योंकि वो पीटने वाले किसान नहीं आर एस एस के गुंडे हैं, जो कि साक्ष्य मिटाने के लिए अपने ही साथियों की क्रूरतम हत्या किये हैं।
मैंने ही नहीं पूरे संयुक्त किसान मोर्चे के लोगों ने भी पुलिस हिरासत में मारे गये लोगों की मौत को दुखद बताया है। इसीलिए संयुक्त किसान मोर्चे से किसान नेता योगेंद्र यादव दूसरे पक्ष के मृतक परिवारजन से मिलने गए और अपनी शौक संवेदना व्यक्ति की।
वायरल वीडियो की कहानी:-
लोग भले ही अपने हितों के अनुसार व्याख्या करके सच को झूठ, झूठ को सच बनाएं मगर यह परखा हुआ सत्य है कि चेतना झूठ बोल सकती है परन्तु पदार्थ झूठ नहीं बोलता। इसी लिये सच्चाई तक पहुंचने के लिये भौतिक परिस्थितियों का अध्ययन ही सबसे अधिक विस्वसनीय होता है। वायरल वीडियो में स्पष्ट रूप से नजर भी आ रहा है कि किसान बीजेपी के लोगों की गाड़ी निकलने के लिए पूरा सहयोग कर रहे थे, भीड़ को किनारे कर रास्ता भी दे रहे थे। एक वायरल वीडियो में कई कारों और बाइकों को प्रदर्शनकारी किसानों की कतारों के पास से गुजरते हुए दिखाया गया है जो नारे लगा रहे हैं और झंडे लहरा रहे हैं। लेकिन, उनमें से कोई भी वाहनों को ठोकर अथवा पत्थर नहीं मार रहे हैं। आयोजकों को प्रदर्शनकारियों को अनुशासित रखने की कोशिश करते हुए और उन्हें वाहनों को हाथ नहीं लगाने के लिए कहते हुए देखा और सुना जा सकता है। इसलिए यह कहना बिल्कुल गलत है कि किसानों ने किसी गाड़ी पर हमला किया। यह बात किसानों को कुचलने की मुख्य घटना के वायरल वीडियो से भी स्पष्ट है। समाचार चैनल ‘यूपी तक’ के फेसबुक पेज द्वारा पोस्ट किए गए एक अन्य वीडियो ((1 मिनट 50 सेकेंड तक वीडियो है) में प्रदर्शनकारियों को वहां से गुजरने वाले वाहनों को झंडों के डंडों के साथ मारते हुए देखा जाता है, जबकि आयोजक लगातार गलत काम न करें की घोषणा कर रहे थे, उस वीडियो में भी स्पष्ट सुनाई दे रहा है और निश्चित ही ये झंडों के डंडे से मारने वाले कोई किसान नहीं ये उन्हीं आर एस एस के गुंडे थे, जिन्हे साजिश के तहत भेजकर किसानों में शामिल होने के लिए भेजा गया था। और जिस वीडियो में भाजपा और दलाल मीडिया गाड़ी का शीशा टूटा हुआ दिखा रही है, वो खुद ही गाड़ी का कांच तोड़कर, किसानों पर तोहमत लगाते हैं। किसी भी विडियो में गाड़ी को पीटते हुए नहीं दिखाया गया है और सबसे मजे की बात कि एक ही गाड़ी का कांच टूटा है और किसी को कोई चोट नहीं। यदि किसानों ने कांच तोड़ा होता तो जिस तरह कांच टूटने से पहले का विडियो और टूटने के बाद का वीडियो शेयर करते हैं तो उस वक्त का वीडियो क्यूँ नहीं बना कर शेयर किया जब कांच तोड़ा जा रहा था और जब किसानों के बीच भीड़ में तोड़ दिया गया तो भीड़ के बीच गाड़ी रोककर विडियो बनाना चहिए। तो इससे साफ और स्पष्ट है कि किसानों को बदनाम करने के लिए ये पूर्व नियोजित सारी कवायद की गयी है और दलाल मीडिया भी इसमे लगी हुई है। पर झूठ तो झूठ ही होता है। इससे सिद्ध होता है कि किसानों पर एक और बे बुनियाद और मनगढ़ंत आरोप है इन भाजपाईयो और दलाल मीडिया का।
घटना की राजनीतिक पृष्ठभूमि:–
जाहिर है कि मोदी सरकार किसानों पर तीन काले कृषि कानूनों को जबरन लाद रही है, हमारे देश के किसान इन कानूनों का विरोध कर रहे हैं। लगभग एक साल बीतने वाले हैं, किसान दिल्ली की सड़कों पर अपना घर-बार, छोड़ कर बैठे हुए हैं। जाड़ा, गर्मी, बरसात और पुलिस की लाठी, गोली झेलते हुए लगभग 600 से अधिक किसान शहीद हो चुके हैं, मगर मोदी सरकार के कान पर जूं नहीं रेंग रहा। एक तो सुनवाई नहीं ऊपर से हरियाणा के मुख्यमंत्री खट्टर ने आंदोलनरत किसानों के खिलाफ अपने प्राइवेट गुण्डों को हिंसात्मक प्रेरणा देते हुए कहा कि “लट्ठ उठाओ, मारो, बहुत होगा दो-तीन महीने के लिए जेल जाओगे…. जेल से निकलोगे तो नेता बनकर निकलोगे।…. “
इन्हीं कारणों से संयुक्त किसान मोर्चा ने तय किया था कि संवेदनहीन हो चुकी सरकार के मंत्रियों, विधायकों, सांसदों को शांतिपूर्ण तरीके से काले झण्डे दिखाकर उनकी संवेदना को जगाया जाय। इसके बाद अलग-अलग प्रांतों में भाजपा सरकार के सांसद, विधायक, मंत्री के खिलाफ शांतिपूर्ण तरीके से काले झण्डे दिखाई जाने लगे। इसी कड़ी में उत्तर प्रदेश के लखीमपुर जिले में 24 सितंबर को, प्रोग्रेसिव फार्मर फ्रंट ने 25 सितंबर को किसान गोष्ठी में जाने वाले केंद्रीय गृह राज्यमंत्री अजय मिश्र टेनी को खजुरिया और संपूर्णा नगर की उनकी यात्रा के दौरान काले झंडे दिखाने के लिए किसानों से आवाह्न किया था। पर अगले दिन 25 सितम्बर की सुबह को ही प्रोग्रेसिव फार्मर फ्रंट के अध्यक्ष गुरमनीत सिंह मांगट को उनके सम्पूर्णा नगर के निवास पर नजरबंद कर दिया गया। इसके बावजूद किसानों ने गदनियां चौराहे और महंगापुर गुरुद्वारा के पास मंत्री अजय मिश्रा टेनी को काले झंडे दिखाने में कामयाब रहे। जवाब में, मंत्री टेनी किसानों को थंब डाउन(अंगूठा नीचे) का इशारा करके प्रदर्शनकारी किसानों को अंगूठा नीचे कर चिढ़ाया, जिसका वीडियो भी खूब वायरल हुआ। थोड़ी देर बाद किसान गोष्ठी में पहुंचकर मंत्री टेनी अपने 20 मिनट की भाषण में किसानों को धमकाते हुए कहते हैं कि “….अगर मैं उतर जाता तो उनको भागने का रास्ता नहीं मिलता। 10 से 15 लोग शोर मचा रहे हैं…. मैं ऐसे लोगों को कहना चाहता हूं सुधर जाओ…. नहीं तो सामना करो आकर, हम आपको सुधार देंगे, दो मिनट लगेगा केवल…. मैं केवल मंत्री, सांसद या विधायक नहीं हूं, जो लोग मुझे विधायक या मंत्री बनने से पहले मेरे बारे में जानते होंगे, वे जानते हैं कि मैं किसी चुनौती से भागता नहीं हूं। जिस दिन मैंने उस चुनौती को स्वीकार करके काम कर लिया, उस दिन पलिया क्या, लखीमपुर तक छोड़ना पड़ जाएगा। ये याद रखिएगा….”
क्या एक केंद्रीय मंत्री की इस तरह की भाषा होनी चाहिए? वो किसानों के खिलाफ खुलेआम एक बाजारू गुंडे की तरह धमकी दे रहा है, मंत्री के इस वीडियो को हिंसा भड़काने वाला क्यों नहीं माना जाना चाहिए? इसी देश में और इसी उत्तर प्रदेश में हिंसा भड़काने वाले बयान के आधार पर कई लोगों पर UAPA जैसे कई कानून लगा कर जेल में डाल दिया जाता है, कई लोगों को सिर्फ इस आशंका के आधार पर जेल में डाला गया है कि वो हिंसा भड़का सकते हैं। लेकिन यहां तो माननीय मंत्री जी सीधे-सीधे गुंडागर्दी वाली भाषा इस्तेमाल करके किसानों को धमका रहे हैं और उनको भड़का भी रहे हैं। इसके बाद इतनी बड़ी घटना के बाद भी मंत्री पर कोई कार्यवाही नहीं। आखिर क्यूँ? क्या वजह है? यदि मंत्री को उसी वक्त बर्खास्त करके गिरफ्तार कर लिया गया होता तो 3 अक्टूबर को भयानक नरसंहार न हुआ होता।
घटना की आर्थिक पृष्ठ भूमि:–
छानबीन करने पर पता चला कि गृह राज्यमंत्री अजय मिश्रा टेनी भी एक अर्धसामन्त हैं। टेनी ने इसे खुद धमकी भरे लहजे में स्वीकार भी किया है कि ” जब मैं मन्त्री, विधायक, सांसद नहीं था तो….”
इस पूर्व सुनियोजित घटना के पीछे कहीं ना कहीं वह व्यवस्था ही है जिसमें जमीन का निर्णायक हिस्सा आज भी मुट्ठी भर सामंतों के कब्जे में है। अब टेनी महाराज को ही ले लीजिए अब ये टेनी महाराज कौन है? उस क्षेत्र में केंद्रीय गृह राज्यमंत्री अजय मिश्रा को लोग टेनी महाराज कहकर ही पुकारते हैं। टेनी महाराज ने 25 सितम्बर को ठीक ही कहा था कि मैं केवल मंत्री, सांसद या विधायक नहीं हूं। वास्तव में वे कुछ और भी हैं। वह गुण्डा है, बदमाश है,…… ऐसा कहना छोटी बात हो जाएगी। दरअसल वो एक खूंख्वार सामन्त हैं, सामान्यतः तो खूंख्वार होते ही हैं चाहे वो कोई भी भेष बना लें। उनके गाँव के आस-पास के कुछ विश्वस्त सूत्रों ने नाम ना छापने की शर्त पर बताया कि टेनी महाराज के पास नामी और बेनामी मिलाकर लगभग 900 एकड़ जमीन है। जमीन की हैसियत के आधार पर ठेका, पट्टा, कोटा, परमिट, लाइसेंस, एजेन्सी, अनुदान, आदि हासिल कर लेते हैं। जमीन की हैसियत पर ही बड़े-बड़े बैंकों से सस्ते कर्ज ले लेते हैं उस धन को ऊंचे व्याज दर पर कर्ज देते हैं। इनका धंधा नेपाल तक फैला हुआ है वहां भी अच्छी खासी बेनामी जमीन है टेनी महाराज के पास राइस प्लांट भी है, कई पेट्रोल पम्प हैं। एक पेट्रोल पम्प तो नेपाल में भी है, जब भारत में तेल सस्ता था तो यंहा से ले जाकर तस्करी के जरिए नेपाल ले जाता था और अब नेपाल में सस्ता है तो नेपाल से भारत अपने पेट्रोल पम्प पर तस्करी के जरिए लाता है और सामन्त टेनी महाराज का मुख्य काम तो तस्करी ही है जो इस पार का माल उस पार करना है। सिर्फ तेल ही नहीं खाद, बीज, लौंग, इलायची, हींग और कई मसाले, सोना आदि की तस्करी इसमें शामिल है। भारत की बैंको से सस्ते दर पर कर्ज लेकर नेपाल में महंगे दर पर सूदखोरी का बहुत बड़ा करोबार है। जो इनके खिलाफ मुह खोलता है उसको मार देते हैं। वहां के लोगों में बड़ा खौफ है टेनी महाराज का। सामन्त के अलावा तस्कर और बहुत बड़ा गुंडा, माफिया की छवि है उनकी। वैसे भी ये सब तो सामन्तों का मुख्य गुण है। ये सब शासन/प्रशासन की नाक के नीचे होता है। यहां तक कि शासन/प्रशासन का सहयोग भी रहता है क्योंकि जमीन की हैसियत के आधार पर ठेका, पटरा, कोटा, परमिट, लाइसेंस…. सरकार ही देती है जिसके बदौलत सामन्त वर्ग खुलेआम गुंडई और तस्करी करता है।
इस तरह टेनी ही नहीं टेनी जैसे अनेकों अर्धसामन्तो के द्वारा किये जा रहे सारे अत्याचारों का बुनियादी कारण वह आर्थिक सिस्टम है जिसमें एक तरफ 80% किसान भूमिहीन व गरीब हैं जब कि दूसरी तरफ हजारों ऐसे अर्धसामन्त हैं जिनमें प्रत्येक के कब्जे में सैकड़ों से लेकर हजारों एकड़ तक जमीन है। हजारों मठाधीश, बड़े अधिकारी, बड़े नेता,अभिनेता और खिलाड़ी हैं, जिनके पास सौ दो सौ एकड़ से ज्यादा, जमीन है, कईयों के पास तो नामी-बेनामी हजारों एकड़ जमीन है। इन सब सामंतों की कुल जमीन मिला दीजिए तो लाखों ही नहीं करोड़ों एकड़ हो जाएगी। जमीन की हैसियत के आधार पर ही ये लोग देशी-विदेशी कम्पनियों एवं उनकी सरकारों से ठेका, पट्टा, कोटा, परमिट, लाइसेंस, एजेन्सी, अनुदान, सस्ते कर्ज आदि हासिल कर लेते हैं। इन्हीं आर्थिक स्रोतों के बल पर ये लोग सैकड़ों गुण्डे पालते हैं, यही इनकी प्राइवेट सेना होती है। इस सेना के बल पर अपने क्षेत्र विशेष में अपने विरोधियों को ठोकते रहते हैं, दबे कुचले वर्ग में से उभरती हुई प्रतिभाओं को अपनी तरफ मिला लेते हैं, वह नहीं मिलना चाहता तो उसे योगी की भाषा में ठोक देते हैं, ब्लाक, तहसील, थाने व जिले के बड़े से बड़े अधिकारियों को इनकी बात मानना पड़ता है, यदि नहीं मानते तो जियाउल हक जैसे डीएसपी की तरह उन्हें ठोक दिया जाता है। बिहार की रणवीर सेना तो एक बानगी भर है, पूरे देश में ऐसी कई प्राइवेट सेनायें हैं जिन्हें स्थानीय सामन्त चला रहे हैं। इन सेनाओं के जो सरगना हैं उनमें से कुछ तो बाहुबली के रूप में कुख्यात हैं तो कई ऐसे हैं जो समाज में संत, महन्त, नेता, अभिनेता, खिलाड़ी आदि के रूप में सम्माननीय समझे जाते हैं, मगर वे भी अन्दर से सरगना ही होते हैं। ये लोग पूरी तरह से गांधीवादी बनते हैं, अपने हाथ से एक चींटी भी नहीं मारते। ये अपनी लाइसेंसी बंदूकों की आड़ में सैकड़ों अवैध बंदूकें रखते हैं, इनमें से कई बन्दूकें इनके गुर्गों के पास भी होती हैं इस तरह जनता को मारना इन अर्धसामन्तों के लिए बहुत ही आम हो जाता है। शासन/प्रशासन भी इन्हीं का साथ देता है। ये लोग जिन्हें मारना चाहते हैं उन्हें कानूनी दांव-पेंच में फंसाकर सेना, पुलिस द्वारा फर्जी एनकाउंटर में मरवा देते हैं, अगर वो कानूनी दांव में नहीं फंसता तो इनकी प्राइवेट सेना (आर एस एस और उनकी अनेकों विंग के गुण्डावाहिनी) उसी तरह से ठिकाने लगा देती है जिस तरह गौरी लंकेश, एमएम कलबुर्गी, गोविन्द पान्सारे, नरेन्द्र दाभोलकर, हेमन्त करकरे को ठिकाने लगाया था। ये अपने पालतू गुण्डों से ठगी, तस्करी, मिलावटखोरी, कालाबाजारी आदि करवाते रहते हैं। जिसमें से उन्हें कमीशन मिलता रहता है। आमदनी के इन्हीं सारे स्रोतों के बल पर पूंजीवादी पार्टियों से चुनावी टिकट खरीद लेते हैं। और जनता को जाति-धर्म, क्षेत्र, रंग, लिंग, नस्ल, भाषा आदि के झगड़े में फंसाकर, नौजवानों को गुमराह करके और उनका वोट खरीदकर चुनाव जीतते हैं।
इसी सिस्टम से ही ऐसे हजारों टेनी महाराज इस देश में पैदा होकर खुल्ला घूमते हैं और जब चाहते हैं और जब जहां चाहते हैं झपट्टा मारकर गरीबों का हाड़ मांस खा जाते हैं। इस सिस्टम के भीतर इनको रोकने और टोकने वाला कोई नहीं, उल्टा सिस्टम ही ऐसे लोगों के लिए खुला रास्ता बनाता जाता है। इस सिस्टम में बहुसंख्यक जनता को न्याय नहीं मिल सकता और गरीबों को न्याय मिले इसकी उम्मीद भी नहीं की जा सकती क्योंकि जेल, अदालत, सेना, पुलिस इन्हीं अर्धसामन्तों की रक्षा के लिए बनी है। जब ये अर्धसामन्त विकास दूबे की तरह सिस्टम लिए खतरा बन जाते हैं अर्थात सिस्टम की रक्षा करने वाली पुलिस को ही निशाना बनाने लगते हैं तब उन्हें सजा देने के लिए न्यायालय तक का इन्तजार नहीं किया जाता, सिस्टम के मालिक उन्हें किसी न किसी बहाने ठोक देते हैं। फिर वो दावा करते हैं कि गुण्डे या तो जेल में हैं या प्रदेश छोड़कर भाग गये हैं या ठोक दिए गये हैं, जब कि सच्चाई यह है कि गुण्डों के सरगना ही धर्म, संस्कृति और राष्ट्रवाद का लबादा ओढ़कर सरकार चला रहे हैं।
ये ही लोग देशी-विदेशी बड़े पूंजीपतियों से मिलकर तीन काले कानून बनाकर हमारे छोटे-छोटे किसानों की जमीन भी छीन लेने पर आमादा हैं। इनकी हिम्मत देखिये कि जब हम अपनी जमीन बचाने के लिए सिर्फ काले झंडे दिखा देते हैं तो ये लोग हमें गोली मारते हैं और अपनी मंहगी कारों से रौंद देते हैं। आम लोगों में यह भ्रम है कि जेल, अदालत सेना, पुलिस, नौकरशाही आम जनता के हितों की रक्षा के लिए है। परन्तु यह सबसे बड़ा झूठ है। सेना का उपयोग भी बहुसंख्यक जनता के विरुद्ध ही किया जाता है। जब किसानों की जमीन छीननी हो तो सेना-पुलिस को उतारा जाता है।
यह जगजाहिर है कि अमीर लोग ही गरीबों का शोषण कर रहे हैं। मगर कभी भी कोई सेना, पुलिस उन अमीरों से यह नहीं पूछ सकी कि तुम्हारे पास इतनी दौलत क्यूं इकट्ठा हो गयी है, किसी सामन्त से यह नहीं पूछा कि जब तुम जमीन पर पैर नहीं रखते तो तुम्हारे पास हजारों एकड़ जमीन क्यूं है। यदि पुलिस जनता के लिए होती तो भारत के किसी भी प्रांत के किसी भी थाने में गरीबों की सुनवाई जरूर होती। कोई गरीब अपना दुखड़ा लेकर थाने में जाता है तो उसकी बात सुनने के बजाए उसे गाली देकर भगा देते हैं यदि सिपाही/दरोगा का बस चला तो मारकर भगा देते हैं। भारत की पुलिस जबरिया जब जिसको, जिस केस में, जिस धारा में उसको नाम डालकर गिरप्तार कर जेल में डाल देती है और वह पीड़ित व्यक्ति मुंहमांगा घूस दे दे तो मामला रफा-दफा कर देती है। यहां तक कि यदि आपको किसी से भी दुश्मनी निकालनी हो तो पुलिस को पैसा देकर किसी भी केस चाहे मर्डर, चाहे चोरी, चाहे डकैती, चाहे छिनैती…. केस में निर्दोष को दोषी करार दे सजा दिला सकता है। इसी तिकुनिया केस को ले लें आशीष मिश्रा पर भारतीय दंड संहिता की धारा 302 सहित गंभीर धाराओं पर केस दर्ज हुआ। इन धाराओं पर तो आम आदमियों को उठाकर तुरंत चालान कर अदालत में उपस्थित कर जेल भेज देते हैं और अदालत में भी तुरंत जमानत नहीं मिलती पर यंहा जेल तो दूर की बात गिरप्तार तक नहीं किया गया। जब सोशल मीडिया पर थू-थू होने लगी तब कंही जाकर रेड कारपेट पर गिरप्तारी हुई और सबको मालूम है और बताने की जरूरत भी नहीं कि आशीष मिश्रा के साथ कैसा बर्ताव हुआ। सारा पुलिस विभाग जी हुजूरी करता रहा। यानी कहने के लिये कानून सबके लिये बराबर है मगर उसी धारा में आम आदमी के लिए अलग व्यवहार और रसूखदार के लिए अलग। ये कैसा और किसके लिए सिस्टम तैयार किया गया है?
हमारे यंहा न्यायलय को बहुत ताकतवर समझा जाता है, अब न्यायालय की ताकत देख लें जब थाने में किसी आम व्यक्ति की रपट नहीं लिखी जाती तो वो अदालत का दरवाजा खटखटाता है और अदालत थाने को एफ आइ आर का आदेश देता है फिर भी थाने वाले न्यायालय को ठेंगा दिखा देते हैं और एफ आई आर दर्ज नहीं करते। कई मामलो में न्यायालय की बात कई विभाग के अधिकारी भी नहीं सुनते हैं। ये सब तो छोटी-मोटी अदालत की बात है। भारत की सबसे बड़ी अदालत है सुप्रीम कोर्ट। सुप्रीम कोर्ट द्वारा सबरीमाला मंदिर पर दिए गए आदेश पर बीजेपी और सबरीमाला मंदिर समिति ने सर्वोच्य न्यायालय को भी ठेंगा दिखा दिया। तो ये है न्यायालय की ताकत?
जब पुलिस केस दर्ज करती है तो न्याय के लिए अदालत में लाया जाता है, पर अदालत किसकी है शायद गरीब आदमी समझता है। कभी किसी रिक्शे वाले के मुंह से सुना है कि ‘तुम्हें आदलत में देख लेंगे।’ अदालत में देखने की धमकी वो देता है जो मंहगी कारों पर सवार होकर चलता है वही देता है क्योंकि उसे मालूम है कि अदालत में न्याय नहीं फैसला होता है। वह कानून के रखवालों को खरीद कर फैसला अपने पक्ष में करवा लेगा। अदालत में दो पक्षों यानी अमीर और गरीब की सुनवाई में जो अमीर होता है उसी के पक्ष में फैसला होता है। नजीर के लिए अपवाद स्वरूप कुछ फैसले गरीबों के पक्ष में भी किया जाता है ताकि लोगों का अदालत में विश्वास बना रहे।
कानून के हाथ बहुत लंबे हैं, कितने लंबे हैं यहां साफ-साफ दिख रहा है। तिकुनिया की इस घटना पर सर्वोच्य न्यायालय भी खामोश रहा। सर्वोच्य न्यायालय यदि चाहता तो स्वतः संज्ञान लेकर सुनवाई कर सकता था और सरकार को गिरप्तारी और कार्यवाही का आदेश दे सकता था। पर सर्वोच्य न्यायालय के कान पर जूं तक नहीं रेंगी। कुछ वकीलों ने जब तिकुनिया घटना पर पी आई एल डाली गयी तब सर्वोच्य न्यायालय ने सुनवाई की। पर कोई भी आदेश नहीं दिया बस सरकार को फटकार लगा दिया और दलाल मीडिया ऐसे बता रही है जैसे मंत्री के खिलाफ गिरप्तारी का आदेश दे दिया हो। अब आप यहां यंहा भी साफ देख सकते हैं कि अदालत भी रसूखदारों के हितों की ही रक्षा करती है। कभी-कभी आशाराम बापू जैसे एकाध लोगों को जेल भेज देते हैं,सजा सजा सुना देते हैं, तो इसको जनता के बीच नजीर की तरह पेश करते हैं कि देखो फलां महाराज को सजा हुई ना। हमारे न्यायालय में देर से ही सही पर न्याय मिलता है। सही मायने में अदालत की विश्वनीयता बनाये रखने के लिए वक्त-वक्त पर एक-आध की कुर्बानी भी दे देते हैं नजीर के लिए।
अब आप स्वयं देखें कि ये सिस्टम और इस सिस्टम से चलने वाले उन्हीं के रखवाली के लिए जेल, अदालत, सेना पुलिस किसके हित के लिए कार्य करती हैं। पूरे का पूरा सिस्टम लगा हुआ है अजय मिश्रा टेनी और उसके बेटे आशीष मिश्रा को बचाने के लिए और पूरी ताकत लगा रहे हैं, यंहा तक के देश के प्रधानमंत्री भी इस मामले में गूंगे बहरे बने हुआ हैं इन अर्धसामन्तों को बचाने के लिए और यदि संयुक्त किसान मोर्चा किसानों के लिए लड़ ना रहा होता तो जो एफ आई आर दर्ज होकर गिरप्तारी भी ना हुई होती। तो फिर आप कैसे उम्मीद कर सकते हैं कि यह सिस्टम और इससे संचालित संस्थाओं से कि उसके जरिए आपको न्याय मिलेगा।
यंहा दोष सिर्फ टेनी महाराज या उसके बेटे आशीष का नहीं है, दोष तो मौजूदा सिस्टम का है। आखिर इतनी ताकत आती कंहा से है? कईयों को बेरहमी से कुचलने और किसी को भी खुलेआम गोली मार देना इनके लिए आम बात है। इनके पास जो हजारों एकड़ जमीन है, उसी से यह ताकत आती है। किसी के पास एक इंच जमीन नहीं और किसी के सैकड़ो, हजारों एकड़ जमीन! इसी सिस्टम का दोष है, यही सिस्टम ही है जो टैनी जैसों को पैदा करता रहता है। कुछ लोग टेनी को फांसी देने तक की बात कर रहे हैं, मगर उन्हें ध्यान देना चाहिए कि जब तक यह अर्धसामन्ती सिस्टम का बोझ हमारी खेती पर लागू रहेगा तब तक एक नहीं हजारों टेनी पैदा होते रहेंगे। और इसी सिस्टम के दोष का पूरा फायदा उठाकर किसानों को रौंदते रहेंगे। इस सिस्टम को बचाने के लिए जान बूझकर ऐसे कानून बनाये गये हैं ताकि उनका बाल भी बांका ना हो पाए।
बड़े-बड़े पूंजीवादी नेता वादा करते हैं कि हम सिस्टम को बदल देंगे मगर चुनाव जीतकर इसी सिस्टम की सेवा में लग जाते हैं जिस सिस्टम में चन्द लोगों के पास हजारों एकड़ जमीन है, तो वहीं 80% किसान भूमिहीन व गरीब हैं। देश को आजाद हुए 73 साल बीत गए पर सिस्टम बदला नहीं अलबत्ता टेनी जैसे लोगों के लिए और मुफीद कर दिया गया।
जब तक इन अर्धसामंती गुण्डों से जमीन छीनकर भूमिहीन व गरीब किसानों में नहीं बांटी जायेगी तब तक न तो हमारी जमीन बचेगी, न ही लखीमपुर-खीरी जैसी घटनाएं रुकेंगी, न ही किसानों के खिलाफ शोषण, दमन, अत्याचार रुकेगा। जमीन ही इन दरिन्दों की नाभि का अमृत है, जब तक इनके कब्जे में जमीन रहेगी तब तक ऐसे दरिन्दे पैदा होते रहेंगे।
कुछ लोग इन सामंतों से नहीं बल्कि साम्राज्यवाद से लड़ना चाहते हैं मगर आप लड़कर देख लीजिये जब भी आप बड़े पूंजीपतियों या विदेशी साम्राज्यवादियों से लड़ेगे तो टेनी जैसे सामन्त ही आपके सामने मुकाबला करने आयेंगे क्योंकि विदेशी साम्रज्यवाद भी इन टेनी जैसे सामन्तों की पीठ पर ही सवार होकर आता है भारत की जमीन पर जब भी किसी देशी-विदेशी बड़े कार्पोरेट से लड़ेंगे तो सामंती ताकतों से लड़ना ही पड़ेगा क्योंकि विदशी साम्राज्यवादी, देश के बड़े पूंजीपति और सामन्त तीनों का गठबन्धन ही हमारे देश की सत्ता पर काबिज है।
इन्हीं तीनों वर्गों को फायदा पहुंचाने वाला सिस्टम पूरे देश में लागू है। इस देश को बनाने वाले किसान, जवान, मजदूर, मेहनतकश और हर भारतीय के भरोसे को सिस्टम की बदौलत सत्ता का अहंकार और नफरत की थार बेरहमी से रौंद रही है। हम-आप सभी के सतर्क होने का समय है। हमारा-आपका सब कुछ दांव पर है। फिलहाल किसानों के लिए ये तीनों कृषि के काले कानून अब जीवन-मरण का सौदा हो गया है। अब हमें मिलकर, इन कानूनों के खिलाफ एक होकर, एक साथ लड़ना होगा। अन्यथा हम तो बर्बाद होंगे ही और आने वाली हमारी पीढियां भी बर्बाद हो जाएंगी, अपने ही खेतों के मजदूर बन जाएंगे और हमें कोसेंगी कि वक्त रहते हमने इन काले कानूनों के खिलाफ लड़ाई क्यों नहीं लड़ी? तो साथियों आओ मिलकर एकजुट होकर इन तीनों काले कानूनों के खिलाफ और मंत्री की बर्खास्तगी और सजा व उसके पुत्र आशीष के सजा के लिए संयुक्त किसान मोर्चे के साथ अपनी आवाज बुलन्द कर इस फासिस्ट और गूंगी-बहरी सरकार को अपनी प्रतिरोध गूँज सुनाए। नहीं तो ये सत्ता की मद में चूर होकर कल आपको रौदेँगे। अब ये आपको तय करना है कि आपको आवाज उठा विरोध दर्ज कराना है या फिर यूं ही…. फैसला आपके हाथ में है।
*अजय असुर*





