पीएम मोदी ने दुनिया की सबसे बड़ी अनाज भंडारण योजना के तहत 11 गोदामों का उद्घाटन किया।कांग्रेस नेता राहुल गांधी के नेतृत्व वाली ‘भारत जोड़ो न्याय यात्रा’ शनिवार को उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद से आगे बढ़ी, जिसमें प्रियंका गांधी भी अपने भाई के साथ शामिल हुईं।भारत और एशिया के सबसे बड़े रईस मुकेश अंबानी के छोटे बेटे अनंत अंबानी की प्री-वेडिंग सेरेमनी एक से तीन मार्च तक जामनगर में हो रही है। इसमें देश-विदेश की कई जानी-मानी हस्तियां आ रही हैं। लेकिन इनमें एक नाम की सबसे ज्यादा चर्चा है। वह नाम है लैरी फिंक का। आखिर कौन है यह शख्स…

देश की सबसे वैल्यूएबल कंपनी रिलायंस इंडस्ट्रीज के चेयरमैन मुकेश अंबानी के छोटे बेटे अनंत अंबानी और राधिका मर्चेंट की 12 जुलाई को मुंबई में शादी होगी। उससे पहले प्री-वेडिंग सेरेमनी एक से तीन मार्च तक जामनगर में हो रही है। इसके लिए देश और दुनिया की कई जानी-मानी हस्तियों को न्योता दिया गया है। इनमें दुनिया की सबसे बड़े एसेट मैनेजमेंट कंपनी ब्लैकरॉक इंक के सीईओ लैरी फिंक भी शामिल हैं। फिंक को दुनिया का सबसे ताकतवर इंसान माना जाता है। इसकी वजह ब्लैकरॉक दुनिया में 10 ट्रिलियन डॉलर का एसेट मैनेज करती है। भारत की जीडीपी का करीब ढाई गुना और अमेरिका की जीडीपी का आधा है। ब्लैकरॉक की हैसियत का अंदाजा आप इसी बात से लगा सकते हैं कि दुनिया के कुल शेयरों और बॉन्ड्स का 10 फीसदी यही कंपनी संभालती है।
ब्लैकरॉक एक तरह से दुनिया का सबसे बड़ा शेडो बैंक है। अगर यह कहा जाए कि पूरी दुनिया अमेरिका की इस मल्टीनेशनल इन्वेस्टमेंट कंपनी के कब्जे में है तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। दुनिया के हर बड़े सेक्टर की बड़ी कंपनी में इसका हिस्सा है। ब्लैकरॉक इंक का हेडक्वार्टर अमेरिका में है। लेकिन इसका इन्वेस्टमेंट पूरी दुनिया में फैला है। दुनिया की हर बड़ी कंपनी में इसकी हिस्सेदारी है। इसकी ताकत का अंदाजा इसी बात से लगा सकते हैं कि चीन भी इसे अपने यहां आने से नहीं रोक पाया था। ब्लैकरॉक की दुनिया की सबसे वैल्यूएबल कंपनी माइक्रोसॉफ्ट में 5.19% और ऐपल में 5.14% हिस्सेदारी है। इसी तरह ऐमजॉन, एनवीडिया, गूगल, मेटा और टेस्ला में भी हिस्सेदारी है। भारत की भी कई बड़ी कंपनियों में इसकी हिस्सेदारी है। इससे आप अंदाजा लगा सकता है कि ब्लैकरॉक कितनी पावरफुल कंपनी है।
कैसे हुई शुरुआत
इस कंपनी की स्थापना फिंक ने 1988 में की थी। फिंक कंपनी के सीईओ और चेयरमैन हैं। फिंक ने पॉलिटिकल साइंस की पढ़ाई की थी लेकिन पैसा कमाने का ऐसा चस्का लगा कि शेयर मार्केट में घुस गए। उन्होंने 23 साल की उम्र में बोस्टन डायनामिक्स से करियर की शुरुआत की। डेट सिंडिकेशन की शुरुआत करने का श्रेय इन्हीं को दिया जाता है। 31 साल की उम्र में वह बैंक के एमडी बन गए। एक साल में उन्होंने बैंक को एक अरब डॉलर कमाकर दिया। फिंक ने और जोखिम लेना शुरू किया लेकिन एक तिमाही में बैंक को 10 करोड़ डॉलर का घाटा हो गया। इससे बैंक ने उनकी छुट्टी कर दी। साल 1988 में 35 साल की उम्र में फिंक ने खुद की कंपनी खोलने का फैसला किया। तब जाने माने इन्वेस्टर और ब्लैकस्टोन इंक के फाउंडर स्टीव श्वार्जमैन ने उनका हाथ थामा।
किसान आंदोलन नाजुक दौर में, बढ़ रहे हैं नेताओं में मतभेद; पंढेर ने बताई पांच दिनों की योजना

किसान आंदोलन इस समय नाजुक दौर पर खड़ा है। 21 फरवरी को खनौरी सीमा पर एक युवा किसान की मौत के बाद से आंदोलन में फिलहाल एक ठहराव सा आ गया है। उधर, किसान नेताओं में आपसी मतभेद लगातार बढ़ रहे हैं। इससे आंदोलन में किसानों की आगे की राह आसान नहीं लग रही। यह आंदोलन केवल दो जत्थेबंदियों संयुक्त किसान मोर्चा (गैर राजनीतिक) और किसान मजदूर संघर्ष कमेटी के नेतृत्व में चलाया जा रहा है, जबकि संयुक्त किसान मोर्चा (एसकेएम) ने इससे दूरी बना रखी है, जिसके बैनर तले साल 2020 में पहला किसान आंदोलन चला था।किसान नेता सरवन सिंह पंढेर ने कहा कि आज शंभू और खनौरी में मोर्चों का 13वां दिन है। आज हम दोनों सीमाओं पर एक सम्मेलन करेंगे क्योंकि डब्ल्यूटीओ पर चर्चा होगी। हमने मांग की है कि कृषि क्षेत्र को WTO से बाहर रखा जाए। हम शाम को प्रेस कॉन्फ्रेंस करेंगे।
हाल ही में एसकेएम ने बैठक करके शंभू व खनौरी सीमा पर किसानों पर हुए अत्याचार के खिलाफ संघर्ष के कार्यक्रमों का एलान किया। इससे लगा कि शायद अब किसान नेता सभी आपसी गिले-शिकवे भुलाकर एक मंच पर आएंगे और मांगों के हल के लिए लड़ेंगे, लेकिन अब भारतीय किसान यूनियन एकता (उगराहां) के अध्यक्ष जोगिंदर सिंह उगराहां ने तल्ख बयान दिया है। उन्होंने कहा, यह किसान आंदोलन केवल दो जत्थेबंदियों से जुड़ा है। इन जत्थेबंदियों का आंदोलन करने का तरीका सही है या गलत, इसकी जवाबदेही हमारी नहीं बनती।
हमारे संगठन ने जब मानांवाली में मोर्चा लगाया था तो उस समय इन जत्थेबंदियों ने हमारा साथ नहीं दिया था। तब हमने तो नहीं कहा था कि साथ क्यों नहीं दिया। फिर अब हम पर सवाल क्यों उठाए जा रहे हैं कि दिल्ली कूच में साथ क्यों नहीं दिया। हमारे बीच कितने ही वैचारिक मतभेद हों, लेकिन फिर भी जब सीमा पर किसानों पर गोले फेंके गए, हमारी जत्थेबंदी ने रेल रोको आंदोलन किया, टोल फ्री कराए और भाजपा नेताओं के घरों के बाहर प्रदर्शन किया।
ऐसे में हम पर अंगुली उठाना सही नहीं है। भारतीय किसान यूनियन एकता (डकौंदा) के प्रदेश महासचिव एवं एसकेएम के नेशनल को-ऑर्डिनेशन मेंबर जगमोहन सिंह ने कहा, इस आंदोलन में जोश के साथ होश की कमी दिख रही है। उन्होंने माना कि अगर पंधेर व डल्लेवाल के संगठन एसकेएम के साथ मिलकर यह आंदोलन आगे बढ़ाते तो केंद्र पर ज्यादा दबाव बनाया जा सकता था। इसलिए एसकेएम की ओर से छह मेंबरी कमेटी बना दी गई है, जो पंधेर व डल्लेवाल के संगठनों के साथ बैठकर चर्चा करेगी।
पंढेर ने बताई पांच दिनों की योजना
किसान नेता सरवन सिंह पंढेर ने कहा कि आज शंभू और खनौरी में मोर्चों का 13वां दिन है। आज हम दोनों सीमाओं पर एक सम्मेलन करेंगे क्योंकि डब्ल्यूटीओ पर चर्चा होगी। हमने मांग की है कि कृषि क्षेत्र को WTO से बाहर रखा जाए। हम शाम को प्रेस कॉन्फ्रेंस करेंगे। 26 फरवरी की सुबह विरोध स्वरूप WTO, कॉरपोरेट घरानों और सरकारों की अर्थियां जलाई जाएंगी। दोपहर में दोनों बॉर्डर पर 20 फीट से ज्यादा ऊंचे पुतले जलाए जाएंगे। 27 फरवरी को किसान मजदूर मोर्चा, एसकेएम (गैर राजनीतिक) देश भर के अपने सभी नेताओं की बैठक करेगा। 28 फरवरी को दोनों मंच बैठेंगे और चर्चा करेंगे। 29 फरवरी को अगले कदम पर फैसला किया जाएगा। हम पीएम मोदी से किसानों के साथ जो कुछ भी हो रहा है उस पर बोलने के लिए कह रहे हैं।
किसानों से बर्बरता देश के लिए सही नहीं : बजरंग
किसान आंदोलन-2 में दिल्ली कूच के दौरान युवा किसान की मौत और दूसरे के गंभीर रूप से घायल होने को लेकर ओलंपियन पहलवान बजरंग पूनिया ने सोशल मीडिया पर कहा, किसानों के साथ बर्बरता किसी भी लोकतांत्रिक देश के लिए सही नहीं है। विदेश में ओलंपिक की तैयारी में जुटे पहलवान पूनिया ने शनिवार को एक्स पर लिखा, 21 फरवरी को एक नौजवान किसान शहीद हो चुका है और दूसरा गंभीर है। हरियाणा-पंजाब की सीमा पर स्थित दाता सिंह वाला सीमा से दिल्ली कूच के दौरान शुभकरण की मौत हो गई थी और प्रीतपाल सिंह घायल हुए थे।
धूप आने दो: देश का मूड तय करते हैं फैशन के रंग, इन्हें कहां से देखें?

छ हफ्ते पहले, जब अयोध्या में रामलला की प्राण-प्रतिष्ठा समारोह की गूंज के साथ देश का ज्यादातर हिस्सा नारंगी हो गया था, तब सवाल उठ रहे थे कि सांस्कृतिक और रचनात्मक उद्योग इस पर कैसी प्रतिक्रिया देंगे। सवालों में फैशन था। आखिर कोई घटना ऐसी हो सकती है, जिसमें फैशन न हो? दिमाग में यह सवाल उठा। एक समाजशास्त्री बेशक फैशन को रचनात्मक उद्योग न समझे और सामाजिक-सांस्कृतिक घटनाओं पर प्रतिक्रिया देते वक्त इसे जरूरी भी न समझे, लेकिन राजनीति के लिए फैशन कोई नई चीज नहीं है। इसके पीछे एक लोकप्रिय संदेश छिपा होता है। ये घटनाएं ऐसी होती हैं कि अगर इनमें फैशन न ढूंढा जाए, तो वह अक्सर छिपा ही रह जाता है।राजनीति फैशन का उपयोग कर सकती है, लेकिन फैशन उद्योग राजनीति के रंग से कैसे बचता है, यह देखने की बात होगी… चुनाव आ रहे हैं, रंग छा रहे हैं। राजनीति अब फैशन स्टेटमेंट दे रही है। फैशन के रंग दरअसल कोड की तरह होते हैं, जो किसी देश का मूड तय करते हैं।
रंग फैशन का एक महत्वपूर्ण तत्व है। हम हर साल या हर मौसम में जिन रंगों को स्वीकार या अस्वीकार करते हैं, फैशन ही उन्हें निर्धारित करता है। फैशन के रंग दरअसल कोड की तरह होते हैं, जो किसी देश का मूड तय करते हैं। बात सिर्फ एक खास रंग की नहीं है, बल्कि हर तरह के राजनीतिक संदेश की है, जो ज्यादा लोगों तक फैशन के जरिये पहुंचाए जाते हैं। आने वाले चुनावों में भी राजनीतिक दलों द्वारा सोशल मीडिया क्रिएटर्स के साथ विज्ञापनों इत्यादि पर भी लाखों-करोड़ों रुपये खर्च किए जाएंगे। ताकत और पैसे का भरपूर प्रदर्शन होगा।
कॉमनवेल्थ ऐंड कम्परेटिव पॉलिटिक्स में 2022 में प्रकाशित शोधपत्र में सिमोना विटोरिनी लिखती हैं, ‘ऐसे समय में, जब राजनीति में किसी सर्वमान्य विचारधारा का अभाव है और उत्तर-आधुनिक विमर्श राष्ट्रवाद के नए स्वरूप को स्थापित कर रहा है, राजनीति काफी आकर्षक और व्यावसायिक हो गई है, नतीजतन न केवल लोकप्रिय वोटों को पाने के तरीकों में बदलाव आया है, बल्कि लोकप्रिय भावनाओं को संगठित करने और भुनाने के तरीके भी बदल गए हैं।’
विटोरनी अपने शोधपत्र में आगे लिखती हैं, ‘लोगों तक अपनी बात पहुंचाने के तरीके और जनमत निर्माण की प्रक्रिया पहले जैसी पारंपरिक नहीं रही और केवल भाषण ही संवाद का जरिया नहीं है। अब कपड़ों के चयन, रंगों एवं अन्य माध्यमों से मतदाताओं के अवचेतन को प्रभावित किया जा रहा है।’
यहां मेरा मतलब किसी पार्टी या विचारधारा का विरोध या समर्थन करना नहीं है। निश्चित रूप से कोई राजनेता जब आइकन बन जाता है, तो उसकी हर बात फैशन स्टेटमेंट बन जाती है, चाहे वह खाना हो, पहनना हो या चलना। हमारे प्रधानमंत्री मोदी इसका बहुत अच्छा उदाहरण हैं। उनके पहनावे को लोगों, खासकर युवाओं द्वारा खूब अपनाया जा रहा है और इसमें कोई बुराई भी नहीं है। पर बड़ा मुद्दा यह है कि भारतीय फैशन जगत को इस अंधानुकरण से कैसे बचाएं एवं इसकी मौलिकता और रचनात्मकता को रंग, शैली या किसी भी राजनीतिक प्रभाव से कैसे बचाए रखें? बाजार के ट्रेंड से हटकर चलना और डिजाइन में राजनीतिक रंगों, स्टाइल और पैटर्न की नकल से बचना या फिर उसे कम-से-कम करना, वास्तव में चुनौती है।
किसी विचार को उन्माद बनने में समय नहीं लगता और फैशन के संबंध में भी यह बात उतनी ही सही है। यह निश्चित रूप से बराबर की तुलना नहीं है, लेकिन बहुत पुरानी बात नहीं है, जब बार्बी, जो एक मूवी थी, ‘पिंक कल्ट’ बन गई। जल्दी ही बार्बी एक गुड़िया से वॉलपेपर पैटर्न, केक और यहां तक कि कारों पर नजर आने लगी। विभिन्न उत्पादों की पैकेजिंग और उपभोक्ता उत्पाद, जैसे कि टूथब्रश, तौलिया सब ‘बार्बीमय’ हो गए और बाजार ने पिंक की एकरसता व एकरूपता को लंबे समय तक देखा।
ऐसे समय, जब उपभोक्ता को किसी उत्पाद या सेवा को सीधे खरीदने के लिए प्रेरित न कर कंपनियां व विज्ञापन एजेंसियां विभिन्न सर्वेक्षणों के माध्यम से उन्हें निर्णय प्रक्रिया में सहभागी बना रही हैं (ताकि उपभोक्ता को यह भ्रम हो कि उसने ‘इनफॉर्म्ड चॉइस’ ली है), कंप्यूटर के ‘क्लिक’ और मोबाइल के ‘सिलेक्ट’ बटन की ताकत को नजर अंदाज नहीं किया जा सकता है। ऐसे में, फैशन-इंफ्लुएंसर्स, ब्लॉगर्स की महत्ता फैशन ट्रेंड सेट करने में और भी बढ़ गई है।
आज का दौर वास्तव में प्रचार और आक्रामक मार्केटिंग का है। दुनिया भर में फैशन से ज्यादा बड़ी मार्केटिंग रणनीतियां हो गई हैं और मूल उत्पाद से ज्यादा यह महत्वपूर्ण हो गया है कि कौन-सा सितारा उसका प्रमोशन कर रहा है और कहां इन्हें लॉन्च किया जा रहा है। भारत के संदर्भ में देखें, तो कला, शिल्प, वस्त्र, फैशन-सबकुछ चुनाव के विभिन्न पक्षों से प्रभावित होता दिखता है। ऐसे में, फैशन शो की विशेषता और प्रदर्शनियों की पहचान बनाए रखने के लिए फैशन जगत को वैसे थीम और उत्पादों से बचना चाहिए, जो किसी एक राजनीतिक पार्टी की विचारधारा को संपोषित करते हों।
वर्तमान भारतीय संदर्भ में रंगों का प्रभाव भी केवल वस्तुओं एवं उत्पादों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह राजनीतिक संदेश एवं राजनीतिक संबद्धता का भी परिचायक हो गया है। चाहे बात केसरिया की हो, या नीले की, या पीले की, या किसी अन्य रंग की-सब किसी न किसी राजनीतिक विचारधारा से जुड़े नजर आते हैं। केसरिया निश्चित ही ज्यादा प्रभावी एवं हर जगह नजर आ रहा है। लोगों में इसकी मांग तेजी से बढ़ी है और फैशन जगत भी ‘मांग एवं आपूर्ति’ के सिद्धांत से अछूता नहीं है।
लेकिन हमें यह याद रखना चाहिए कि भारतीय समाज समावेशी एवं धर्मनिरपेक्ष समाज रहा है और हमारे फैशन डिजाइनरों ने अपने रंगों, विषयों एवं आयोजनों में सूक्ष्म रूप से इन मूल्यों को संजोया एवं परिलक्षित भी किया है। रंग, डिजाइन और थीम किसी भी पोशाक को विशेषता प्रदान करते हैं और डिजाइनर डिजाइन के लिए कहीं न कहीं से प्रेरणा लेते ही हैं। जब सोशल मीडिया, टेलीविजन एवं अन्य दृश्य व श्रव्य माध्यम में एक ही तरह की विचारधारा का प्रचार-प्रसार हो एवं एक ही विषय-वस्तु की अधिकता एवं प्रभाव हो, तो डिजाइनर भी उससे अछूते नहीं रहते। अवचेतन मन पर वातावरण का प्रभाव तो पड़ता ही है और रचनात्मकता व मौलिकता के प्रभावित होने का भी खतरा रहता है। ऐसी स्थिति में अपनी मौलिकता को बचाए रखना एवं लीक से हटकर उन संदर्भों और विचारों पर आधारित वस्त्र डिजाइन करना, जो भेड़-चाल से अलग हो, और भी आवश्यक हो जाता है।
यह सही है कि भारत में अब भी अनिवार्य रूप से फैशन का मतलब पारंपरिक परिधानों के अति अलंकृत प्रस्तुति से लिया जाता है। लेकिन यह याद रखने का समय है कि यह वही उद्योग है, जो समावेशिता और विविधता के लिए खड़ा है। यह सामाजिक संदेश देने के लिए समय-समय पर नए तरीके खोजता है।
भारत के डिजाइनर सीधे नहीं, बल्कि सुझाव के रूप में अपनी बात रखते हैं, रचनात्मक प्रतिभाओं के उभरते समूह में ऐसे दिमाग भी हैं, जो विषय, रूपांकन और प्रस्तुति में अंधानुकरण से बचते हैं। भारतीय डिजाइनरों ने देश की बहुलता, समरसता और धर्मनिरपेक्षता को समय-समय पर परिधानों एवं थीम के जरिये दर्शाया है। इसलिए फैशन जगत से अपेक्षा है कि वह इस चुनावी वर्ष में अपने मूल्यों को समेट कर मौलिकता के हिसाब से नए-नए परिधानों एवं उत्पादों को लाएगा और बाजार को राजनीतिक संदेश देने का माध्यम बनने से बचाने की कोशिश भी करेगा।
रूस पर लगाए अमेरिकी प्रतिबंधों से अर्थव्यवस्था पर खतरे की आशंका, पाबंदियों पर रूस बोला-असर नहीं पड़ेगा

रूस द्वारा छेड़े गए यूक्रेन युद्ध की शनिवार को दूसरी वर्षगांठ पर अमेरिका ने अपने प्रतिद्वंद्वी के खिलाफ 200 पन्नों की सूची जारी करते हुए 500 प्रतिबंध लगाए हैं। इनकी वजह रूस का यूक्रेन पर हमला और विपक्षी नेता नवलनी की मौत हैं। प्रतिबंधों से विश्व अर्थव्यवस्था पर खतरे की आशंका जताई गई है, जबकि रूस ने कहा, उस पर इसका कोई असर नहीं पड़ेगा।वाशिंगटन में रूसी राजदूत अनातोली एंतोनोव ने कहा, ये अवैध प्रतिबंध रूसी संघ के आंतरिक मामलों में दखल का एक और बेशर्म व निंदनीय प्रयास है। प्रतिबंधों के जवाब में रूस ने यूरोपीय संघ (ईयू) के कई अन्य अधिकारियों के देश में घुसने पर रोक भी लगा दी है।
वाशिंगटन में रूसी राजदूत अनातोली एंतोनोव ने कहा, ये अवैध प्रतिबंध रूसी संघ के आंतरिक मामलों में दखल का एक और बेशर्म व निंदनीय प्रयास है। प्रतिबंधों के जवाब में रूस ने यूरोपीय संघ (ईयू) के कई अन्य अधिकारियों के देश में घुसने पर रोक भी लगा दी है। उधर, विशेषज्ञों ने कहा, नए प्रतिबंधों से रूस-अमेरिका के साथ ही वैश्विक अर्व्यवस्था को भी झटका लग सकता है। अटलांटिक काउंसिल के किम डोनोवन ने कहा, रूस के लिए हम जो कदम उठा रहे हैं, वह वैश्विक अर्थव्यवस्था पर बुरे प्रभाव डाल सकते हैं।
कीव पहुंचे पश्चिमी नेता, यूक्रेन को समर्थन देंगे
रूसी हमले की दूसरी वर्षगांठ पर एकजुटता दिखाने के लिए यूरोप, इटली, कनाडा और बेल्जियम के नेता कीव पहुंचे और यूक्रेन को समर्थन का संकल्प जताया। यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन ने कहा, यूरोप तब तक यूक्रेन का समर्थन करेगा जब तक वह अंततः स्वतंत्र नहीं हो जाता।
संघीय मूल्यों की खातिर टालने होंगे टकराव के हालात, जरूरी है असहमति को सुनना और असंतोष का शमन

वर्ष 2019 के बाद जब से नरेंद्र मोदी और उनकी पार्टी भारी बहुमत के साथ सत्ता में वापस लौटी है, केंद्र सरकार और गैर-भाजपा शासित राज्यों के बीच टकराव बढ़ गए हैं। विशेष रूप से तीन राज्य इस संघर्ष के केंद्र में रहे हैं-पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और केरल। सभी मामलों में केंद्र द्वारा नियुक्त राज्यपाल केंद्र में सत्तारूढ़ पार्टी की ओर से पक्षपातपूर्ण ढंग से काम करते प्रतीत होते हैं। इन राज्यों का दावा है कि केंद्र ने उन्हें उनके राज्य का पैसा देने से इनकार कर दिया है, उनके राज्य की सांस्कृतिक विरासत की उपेक्षा की है आदि।केंद्र सरकार और गैर-भाजपा शासित राज्यों के बीच अपने हितों को लेकर टकराव की स्थिति लगातार बढ़ती जा रही है। क्या राज्यों और संघ के बीच चल रहा मौजूदा विवाद वास्तव में हमारे देश के हित में है?
हाल के महीनों में दो अन्य राज्य असहमतों के इस क्लब में शामिल हो गए हैं। ये हैं- पंजाब और कर्नाटक, जहां क्रमशः आम आदमी पार्टी और कांग्रेस की सरकार है। पंजाब के राज्यपाल वहां के मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान के साथ भिड़ गए। जहां तक कर्नाटक की बात है, पिछले मई में जब से कांग्रेस सत्ता में लौटी है, उसकी सरकार का केंद्र से कई बार टकराव हो चुका है। मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और उप-मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार ने मोदी सरकार पर राजस्व के संबंध में कर्नाटक के खिलाफ भेदभाव करने और सूखे से प्रभावित किसानों की दुर्दशा के प्रति उदासीन रहने का आरोप लगाया है। हाल ही में सिद्धारमैया और शिवकुमार ने नई दिल्ली में जंतर मंतर पर एक विरोध बैठक आयोजित कर अपना मामला राष्ट्रीय राजधानी में उठाया। कुछ दिनों बाद केरल के मुख्यमंत्री ने अपने राज्य कीओर से इसी तरह के विरोध प्रदर्शन का नेतृत्व किया।
केरल, तमिलनाडु, कर्नाटक, पश्चिम बंगाल और पंजाब में कुल मिलाकर 30 करोड़ से ज्यादा लोग रहते हैं। वे भारत की आबादी के पांचवें हिस्से से अधिक हैं। शिक्षा, स्वास्थ्य एवं लैंगिक समानता के मामले में केरल और तमिलनाडु देश के सबसे प्रगतिशील राज्यों में से हैं। तमिलनाडु एक औद्योगिक ऊर्जा केंद्र भी है। कर्नाटक लंबे समय से वैज्ञानिक शोध के मामले में अग्रणी रहा है और हाल के दशकों में सूचना प्रौद्योगिकी एवं जैव-प्रौद्योगिकी के क्षेत्रों में भी। जब हमारे ऊपर अंग्रेजों का शासन था, तब बंगाल के कुछ सबसे बहादुर लोगों ने स्वतंत्रता संग्राम में हिस्सा लिया। आजादी के बाद से इस राज्य ने हमें कुछ बेहतरीन संगीतकार, फिल्म निर्माता और विद्वान दिए हैं। पंजाब के सिखों ने हमारी खाद्य सुरक्षा और हमारे सशस्त्र बलों में आनुपातिक रूप से भारत के किसी भी अन्य समुदाय की तुलना में कहीं अधिक योगदान किया है।
पांच राज्य, जिनमें से प्रत्येक का हमारे देश के अतीत एवं वर्तमान में विविध और विशिष्ट योगदान है तथा प्रत्येक राज्य में भाजपा से भिन्न पार्टियों की सरकारें हैं, क्या राज्यों एवं संघ के बीच चल रहा मौजूदा विवाद वास्तव में हमारे देश के हित में है?
इससे पहले कि मैं उस प्रश्न का उत्तर दूं, हाल ही में आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री जगन मोहन रेड्डी की कुछ टिप्पणियों पर ध्यान दें, जिनमें उन्होंने इच्छा व्यक्त की कि अगले लोकसभा चुनाव में भाजपा को संसद में लगातार तीसरी बार बहुमत न मिले। फरवरी की शुरुआत में अपने राज्य के अंतरिम बजट के दौरान रेड्डी ने कहा कि अगर केंद्र में सत्तारूढ़ पार्टी अपने अस्तित्व के लिए दूसरों दलों पर निर्भर रहती है तो आंध्र प्रदेश को विशेष दर्जा दिए जाने की लंबे समय से लंबित मांग को पूरा करने की बेहतर संभावना होगी। ममता बनर्जी, एमके स्टालिन या पिनरई विजयन के विपरीत आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री ने कभी भी नरेंद्र मोदी, भाजपा या केंद्र सरकार के प्रति टकराव का रुख नहीं अपनाया। लेकिन अब वह भी गैर-भाजपा शासित राज्य सरकारों के प्रति मोदी सरकार के अहंकारी, दबंग और वास्तव में सत्तावादी रवैये को लेकर चिंतित दिख रहे हैं।
हालांकि यह कहना मुश्किल है कि क्या जगन रेड्डी की धीरे-धीरे आलोचनात्मक मुद्रा और अधिक उग्र विरोध में तब्दील हो जाएगी या क्या तेलंगाना के नए कांग्रेसी मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी, कर्नाटक में अपने पार्टी सहयोगियों के साथ मिलकर केंद्र से अधिक कर राजस्व और निष्पक्ष व्यवहार की मांग करेंगे। भले ही ये दोनों मुख्यमंत्री अलग रहें, लेकिन भाजपा के प्रभुत्व वाली केंद्र सरकार और गैर-भाजपा शासित राज्यों- पश्चिम बंगाल, केरल, तमिलनाडु, कर्नाटक और पंजाब के बीच चल रहा टकराव बेहद चिंताजनक है, जो मुझे पहले पूछे गए प्रश्न पर वापस लाता है।
इन टकरावों के कहां तक जाने की संभावना है? प्रधानमंत्री और केंद्रीय गृह मंत्री के कथनी और करनी को देखते हुए ऐसा प्रतीत होता है कि भाजपा किसी भी आधार पर इन राज्यों की मांगों को स्वीकार नहीं करना चाहती। इनके तीन तरीके हैं, जिनसे यह अन्य दलों द्वारा शासित राज्यों के हितों और इच्छाओं के खिलाफ खुद को और भी मजबूती से स्थापित करना चाहती है।
पहला है, अपनी एड़ी-चोटी का जोर लगाना, और विपक्ष द्वारा नियंत्रित राज्यों को संसाधनों से वंचित करने और उनके स्वायत्त कामकाज पर और अधिक अंकुश लगाने के लिए उन शक्तियों का उपयोग करना, जिन्हें केंद्र ने कोविड महामारी के बाद से हड़प लिया था। दूसरा, नागरिकों से अगले विधानसभा चुनाव में अन्य पार्टियों के बजाय भाजपा को वोट देने के लिए कहना, इन राज्यों के निवासियों से वादा करना कि यदि वे ‘डबल इंजन सरकार’ चुनते हैं तो उनके साथ अधिक अनुकूल व्यवहार किया जाएगा। तीसरा है, सीबीआई और ईडी का दुरुपयोग करके अन्य दलों के विधायकों को भाजपा में शामिल होने के लिए प्रेरित करना।
ये तीनों तरीके अक्सर एक साथ काम करते हैं। भाजपा दो या दो से अधिक विपक्षी गठबंधन वाली राज्य सरकार को तोड़ने में सक्षम रही है, जैसा 2019 में कर्नाटक में, 2022 में महाराष्ट्र में, हाल ही में उसने बिहार में किया है। लेकिन जहां गैर-भाजपा पार्टी बहुमत में है, जैसे कि पश्चिम बंगाल, केरल या तमिलनाडु, वह सरकारगिराने में विफल रही है। इसके अलावा पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और केरल की वैध रूप से निर्वाचित सरकारों के खिलाफ केंद्र की स्पष्ट शत्रुता के परिणामस्वरूप कई बंगालियों, तमिलों और मलयाली लोगों में गहरी (और मेरे विचार से काफी हद तक उचित) नाराजगी है। गोदी मीडिया में भारत की संघीय व्यवस्था पर तनाव की कभी चर्चा नहीं होती। फिर भी विचारशील भारतीयों को पार्टी संबद्धता की परवाह किए बिना ऐसे मामलों पर अधिक ध्यान देना चाहिए, जो हमारे गणतंत्र के भविष्य के लिए कोई शुभ संकेत नहीं है।
आज गुजरात को 52250 करोड़ की सौगात देंगे पीएम; एम्स राजकोट और सुदर्शन सेतु का करेंगे उद्घाटन

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी रविवार को दो दिवसीय गुजरात दौरे पर राज्य को 52,250 करोड़ रुपये की परियोजनाओं की सौगात देंगे। 25 फरवरी को सुबह करीब 7:45 बजे प्रधानमंत्री बेट द्वारका मंदिर में पूजा और दर्शन करेंगे। इसके बाद सुबह करीब 8:25 बजे सुदर्शन सेतु का दौरा करेंगे।इससे पहले, अपने गृह राज्य गुजरात के दौरे पर पहुंचे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जामनगर में रोड शो आयोजित किया। पीएम मोदी और भाजपा समर्थकों के बीच प्रधानमंत्री के आगमन को लेकर खासा उत्साह दिखा। सड़कों पर बड़ी संख्या में उमड़े प्रशंसकों ने पीएम मोदी का गर्मजोशी से स्वागत किया था।
प्रधानमंत्री कार्यालय के अनुसार, वह सुबह करीब 9.30 बजे द्वारकाधीश मंदिर जाएंगे। दोपहर करीब एक बजे द्वारका में 4,150 करोड़ रुपये से अधिक की कई विकास परियोजनाओं का लोकार्पण और शिलान्यास करेंगे। इसके बाद करीब साढ़े तीन बजे एम्स राजकोट जाएंगे। रेसकोर्स ग्राउंड, राजकोट में लगभग 4:30 बजे 48,100 करोड़ रुपये से अधिक की कई विकास परियोजनाओं का उद्घाटन, राष्ट्र को समर्पित और आधारशिला रखेंगे।
द्वारका में एक सार्वजनिक समारोह में पीएम मोदी लगभग 980 करोड़ रुपये की लागत से निर्मित ओखा मुख्य भूमि और बेयट द्वारका द्वीप को जोड़ने वाले सुदर्शन सेतु को राष्ट्र को समर्पित करेंगे। यह लगभग 2.32 किमी का देश का सबसे लंबा केबल सपोर्ट वाला पुल है। प्रधानमंत्री वाडिनार में पाइपलाइन, राजकोट-ओखा, राजकोट-जेतलसर-सोमनाथ और जेतलसर-वांसजालिया रेल विद्युतीकरण परियोजनाएं राष्ट्र को समर्पित करेंगे।
पीएम रविवार को वर्चुअल माध्यम से कल्याणी एम्स की सौगात देंगे। कल्याणी के बसंतपुर में 179.82 एकड़ में फैले इस एम्स को बनाने में कुल 1,754 करोड़ की लागत आई है। साथ ही प्रधानमंत्री मोदी 26 फरवरी को 550 अमृत भारत स्टेशनों की आधारशिला भी रखेंगे। इनमें से प. बंगाल के बंदेल में 307 करोड़ रुपये की अनुमानित लागत से विश्वस्तरीय स्टेशन का निर्माण किया जाएगा। पूर्वी रेलवे क्षेत्राधिकार में आने वाले प. बंगाल, झारखंड और बिहार में टेलीकान्फ्रेंसिंग के माध्यम से 28 स्टेशनों के पुनर्विकास की आधारशिला रखेंगे।
इससे पहले, अपने गृह राज्य गुजरात के दौरे पर पहुंचे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जामनगर में रोड शो आयोजित किया। पीएम मोदी और भाजपा समर्थकों के बीच प्रधानमंत्री के आगमन को लेकर खासा उत्साह दिखा। सड़कों पर बड़ी संख्या में उमड़े प्रशंसकों ने पीएम मोदी का गर्मजोशी से स्वागत किया था।
प्रधानमंत्री के पिटारे से निकल रहीं हजारों करोड़ रुपये की विकास परियोजनाएं
विकास परियोजनाओं की सौगात देने के बाद पीएम मोदी स्थानीय जनता को संबोधित भी करेंगे। लोकसभा चुनाव 2024 से ठीक पहले पीएम मोदी का दौरा कई मायनों में अहम है। इससे पहले प्रधानमंत्री मोदी उत्तर प्रदेश के वाराणसी दौरे पर गए थे। अपने संसदीय क्षेत्र में भी पीएम मोदी ने हजारों करोड़ रुपये की विकास परियोजनाओं की सौगात दी।
फरवरी के अंतिम दिन 100 सीटों पर उम्मीदवारों की घोषणा कर सकती है भाजपा, पदाधिकारियों की बैठक में सहमति

लोकसभा चुनाव में 370 सीटें जीतने का लक्ष्य तय करने वाली भाजपा ने इसके लिए मजबूत रणनीति बनानी शुरू कर दी है। शनिवार को पार्टी मुख्यालय में पार्टी अध्यक्ष जेपी नड्डा, गृह मंत्री अमित शाह की अगुवाई में पार्टी पदाधिकारियों और राज्यों के प्रभारियों की बैठक में हारी हुई सीटों को जीत में बदलने को लेकर खाका तैयार किया गया।पार्टी सूत्रों के मुताबिक इस बार नेतृत्व अयोध्या में उम्मीदवारी के मामले में सबको चौंका सकता है। इस सीट से पार्टी के दिग्गज नेता को उतारे जाने की चर्चा है। तिरुवनंतपुरम सीट पर कांग्रेस के दिग्गज नेता शशि थरूर को चुनौती देने के लिए केंद्रीय मंत्री राजीव चंद्रशेखर, अभिनेत्री शोभना और अभिनेता सुरेश कुमार के नाम की चर्चा है।
उम्मीद जताई जा रही है कि पार्टी की केंद्रीय चुनाव समिति की बैठक 29 फरवरी को होगी और इसी दिन पार्टी कम से कम सौ उम्मीदवारों की घोषणा करेगी। पार्टी सूत्रों का कहना है कि पहली सूची में ज्यादातर बीते चुनाव में हारी हुई सीटों को शामिल किया जाएगा। इसके अलावा इसी दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, अमित शाह सहित पार्टी के कुछ दिग्गजों की उम्मीदवारी भी घोषित कर दी जाएगी। दरअसल पार्टी लोकसभा की अधिसूचना जारी होने से पहले उम्मीदवारों की पहली सूची जारी कर विपक्ष पर मनोवैज्ञानिक बढ़त हासिल करना चाहती है।
कई दौर में बैठक
पार्टी अध्यक्ष नड्डा और शाह की पहले दौर में कोषाध्यक्षों और सह कोषाध्यक्षों के साथ चर्चा हुई। दूसरे दौर में राज्य के प्रभारियों के साथ बैठक हुई। इस बैठक में राज्यों की ताजा राजनीतिक स्थिति और पार्टी की चुनाव तैयारियों का जायजा लिया गया। बैठक में पीएम मोदी के आगामी सौ दिनों में सभी बूथों तक पहुंचने का आहृवान के मद्देनजर तय किए गए कार्यक्रमों की भी समीक्षा हुई। प्रभारियों को बची हुई सीटों पर उम्मीदवारों का पैनल एक सप्ताह के अंदर तैयार करने के निर्देश दिए गए।
अयोध्या में चौंका सकती है भाजपा
पार्टी सूत्रों के मुताबिक इस बार नेतृत्व अयोध्या में उम्मीदवारी के मामले में सबको चौंका सकता है। इस सीट से पार्टी के दिग्गज नेता को उतारे जाने की चर्चा है। तिरुवनंतपुरम सीट पर कांग्रेस के दिग्गज नेता शशि थरूर को चुनौती देने के लिए केंद्रीय मंत्री राजीव चंद्रशेखर, अभिनेत्री शोभना और अभिनेता सुरेश कुमार के नाम की चर्चा है।
केरल में पीएम पदयात्रा में हो सकते हैं शामिल
केरल में प्रदेश अध्यक्ष के सुरेंद्रन अरसे से पदयात्रा कर रहे हैं। इस यात्रा समापन 27 फरवरी को होना है। इस दिन पीएम मोदी खुद पदयात्रा में शामिल हो सकते हैं। पार्टी ने इस बार जिन सीटों पर मजबूती से लड़ने का मन बनाया है, उनमें राज्य की तिरुवनंतपुरम, अटिंगल, कोल्लम, पथानामथिट्टा, पलक्कड़, एर्नाकुलम, त्रिशूर, मलप्पुरम, कोट्टायम और चालक्कुडी सीट शामिल है।
मुंबई: फिल्म सिटी गेट नंबर 2 के पास दीवार गिरने से दो लोगों की मौत हो गई
मुंबई के गोरेगांव इलाके में प्राइम फॉक्स प्रोडक्शन के पीछे फिल्म सिटी गेट नंबर 2 के पास 60 फीट लंबी और 20 फीट ऊंची दीवार गिरने से दो लोगों की मौत हो गई और एक गंभीर रूप से घायल हो गया।
दिल्ली में सिंघु, टिकरी बॉर्डर खोला गया, पुलिस ने एक तरफ से शुरू कराई आवाजाही
दिल्ली में किसान आंदोलन को देखते हुए सीमा पर चौकसी के बाद अब लोगों को राहत दी गई है। पुलिस ने सिंघु और टीकरी बॉर्डर को अस्थायी रूप से खोल दिया है। पुलिस ने सड़क पर एक तरफ से आवाजाही शुरू कर दी है।
दिल्ली में आप-कांग्रेस के गठबंधन से बीजेपी पर कोई असर नहीं पड़ेगा- रामवीर सिंह बिधूड़ी
दिल्ली में कांग्रेस-आप गठबंधन पर बीजेपी विधायक रामवीर सिंह बिधूड़ी ने कहा कि इससे बीजेपी पर कोई असर नहीं पड़ने वाला है। 2019 में बीजेपी को कांग्रेस और आप से ज्यादा वोट मिले थे।इस बार पीएम मोदी के पक्ष में तूफान है लोगों ने 400 से ज्यादा सीटों के साथ नरेंद्र मोदी को तीसरी बार पीएम बनाने का फैसला कर लिया है। इस बार दिल्ली में बीजेपी को 70 फीसदी से ज्यादा वोट मिलेंगे।
यूपी पुलिस भर्ती परीक्षा रद्द, छह महीने के भीतर होगा दोबारा एग्जाम
लखनऊ: सीएम योगी आदित्यनाथ ने हाल ही में हुई यूपी पुलिस भर्ती परीक्षा को रद्द कर दिया है। साथ ही छह महीने के भीतर दोबारा एग्जाम करवाने का भी फैसला किया है।
मिशन 370 को लेकर भाजपा की बैठक शुरू
लोकसभा चुनाव में अकेले 370 सीटें और एनडीए गठबंधन के सहयोगियों के साथ मिलकर 400 से ज्यादा सीटें जीतने की रणनीति और तैयारियों पर विचार मंथन के लिए भाजपा मुख्यालय में पार्टी की महत्वपूर्ण बैठक शुरू हो गई है। पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा की अध्यक्षता में चल रही बैठक में पार्टी के राष्ट्रीय संगठन महासचिव बीएल संतोष के साथ-साथ सभी राज्यों के चुनाव प्रभारी और सह चुनाव प्रभारी भी शामिल हो रहे हैं। बैठक में लोकसभा चुनाव की तैयारियों के साथ-साथ चुनाव के मद्देनजर पार्टी द्वारा चलाए जा रहे अभियानों की प्रगति की भी समीक्षा की जाएगी। इस मौके पर चुनाव के मद्देनजर पार्टी द्वारा आगामी अभियानों की रूपरेखा और तैयारियों पर भी चर्चा होने की संभावना है।




