नहीं, नेता आदमी नहीं होते..!
नेता तब तक ही आदमी होते हैं,
जब तक वह संसद पहुंच,
अपनी पुरानी पहचान को उतारकर
खूंटी पर नहीं टांग देते हैं..!
अपने इस यात्रा में वो,
आदमियों को समझाते हुए चलते हैं,
हम फलां आदमी से अच्छे हैं..!
फलां आदमी तुम्हारा खून पीता था..!
तुम्हारे सपनों को खाता था..!
तुम्हारे जरुरतों को पहनता था..!
और तुम्हारे अपनों को
बिछा कर सो जाता था..!
तुम्हारे मासूम बच्चों को
अंधेरे का रास्ता दिखाता था..!
तुम्हारी जरूरतों को
तुम्हारी मक्कारी बताता था..!
तुम्हारे इतिहास को
तुम्हारे भूगोल में मृतक बताता था..!
तुम्हारे पितरों को
तुमसे पृथक करता था..!
फलां आदमी तुम्हें,
तुम्हारे आदमी होने के
अधिकारों से पृथक रखता था..!
मगर हम… फलां आदमी से अच्छे हैं..!
आदम जात में सबसे सच्चे हैं..!
हम आदमी होने का पूरा कर्तव्य निभाएंगे..!
तुम्हारे सपनों का देश बनाएंगे..!
आदमियों को आपदा-विपदा में बचाएंगे..!
स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार के अंबार लगाएंगे..!
श्मशान कब्रिस्तान को
नगर से दूर ! कहीं दूर बसाएंगे..!
हम तुम्हें विश्वगुरु बनाएंगे..!
मगर संसद तक पहुंचते-पहुंचते,
वो आदमी पिशाच हो जाता हैै..!
आदमी अपने घरों में बैठकर,
आदमियों को ही मारने का उपाय नहीं ढूंढते..!
वो नेता ढूंढते हैं और
आदमी अपने घरों के अहातों में,
श्मशान और कब्रिस्तान नहीं चाहते..!
नहीं, कभी नहीं चाहते..!
ऐसा नेता चाहते हैं..!
नेता चाहते हैं… हर घर में हो,
एक श्मशान या कब्रिस्तान..!
नेता आम आदमियों की
बेजान झांइयों वाली,
शक्लों को देखकर कूढ़ते हैं..!
मनपसंद सवाल ना हो तो,
लावा की तरह फूटते हैं..!
पसंद का हो तो,
वो लाशों को भी लूटते हैं..!
आदमी अपने भोजन में,
आदमियों को शामिल नहीं करते..!
आदमी, आदमी को नहीं खाते..!
आदमी,आदमियों की
लाशों की गिनती नहीं दबाते..!
आदमी लाशों को देखकर,
चीखते हैं, चिल्लाते हैं..!
अपनी बेचारगी पर मातम मनाते हैं..!
मगर नेता ठंडी लाशों से,
राजनीतिक ताप पाते हैं..!
नहीं..! नेता कत्तई आदमी नहीं होते..!
–सिद्धार्थ,संपर्क-अनुपलब्ध
संकलन-निर्मल कुमार शर्मा,गाजियाबाद, उप्र.,संपर्क-9910629632




