
विवेकरंजन सिंह
साइकिल से चलने से हम न सिर्फ पर्यावरण को प्रदूषित होने से बचाते हैं बल्कि खुद के भी शरीर को स्वस्थ रख सकते हैं। विदेशों में इसकी कवायद शुरू भी हो चुकी है। समय रहते कुछ देश ग्लोबल वार्मिंग की समस्या को समझ चुके हैं और सार्थक दिशा में काम भी कर रहे हैं।
आज का दौर स्टेटस मेंटेन करने और सामाजिक प्रतिष्ठा से ऊपर दिखावे का दौर होता जा रहा है। अंधाधुंध गाड़ियों की खरीदारी हो रही है। सड़कों पर धुंआं उड़ाती गाड़ियों से पर्यावरण प्रदूषण किस कदर बढ़ा है, शायद हम इसका अंदाजा नहीं लगा पा रहे हैं। लोगों को जागरूक करने के सारे अभियान भी विफल होते नजर आ रहे हैं। ये परिवर्तन तब तक संभव नहीं है जब तक इंसान खुद से न सोचे।
तापमान कितना बढ़ चुका है, ये सब अच्छी तरह जानते हैं। हर साल सूरज की तपिश बढ़ती ही जा रही है। असर साफ साफ दिख रहा है मगर जनता अब भी सचेत नही हो रही है। हर व्यक्ति अपने अपने स्वार्थ में जीने का आदी होता जा रहा है। उसे अपने सुख सुविधा के सिवा कुछ भी नहीं सूझ रहा है।
साइकिल चलाने के अनगिनत फायदे हैं। इलाहाबाद विश्वविद्यालय के वनस्पति विज्ञान विभाग के रिटायर्ड प्रोफेसर नरसिंह बहादुर सिंह ने अपने युवा काल से साइकिल को आत्मसात किया और आज तक साइकिल से ही चलते हैं। उनका कहना है कि साइकिल चलाने से तन, मन और धन तीनों प्रभावित होता है। साइकिल चलाने से तन स्वस्थ होता है। तन स्वस्थ रहता है तो मन भी खुशहाल रहता है। इसके साथ ही पेट्रोल डीजल आदि में जाने वाला आपका व्यय भी नही होता है। उनका कहना है कि इतना ही नहीं साइकिल चलाने से योग प्राणायाम करने में लगने वाला समय भी बचता है। आप पार्किंग जैसी समस्याओं से भी बचते हैं। रोड टैक्स जैसे व्यय से भी बचा जा सकता है। प्रोफेसर सिंह साइकिल के नुकसान भी बताते हैं मगर ये नुकसान आपके लिए नहीं, दूसरों के लिए हैं। उनका कहना है कि आपको अलग अलग जगहों में लगने वाली जी एस टी भी नहीं देनी पड़ती। आप बीमार कम पड़ेंगे तो दवाइयों पर कम खर्च होगा। कुल मिलाकर देखा जाए तो स्वस्थ जीवन के लिए साइकिल चलाना हमारे लिए हर हालत में फायदेमंद ही है।
प्रोफेसर साहब की साइकिल जब तक इलाहाबाद विश्वविद्यालय के परिसर में रही तब तक लोगों को प्रेरित करती रही। कई सारे प्रोफेसर,जो छोटी मोटी बीमारियों से ग्रसित थे वो भी साइकिल चलाने लगे और कम ही समय में उन्हें इसका फायदा भी मिला। आज लोग जिम जाना पसंद करते है और वहां भी वो साइकिलिंग करते हैं मगर थोड़ी दूरी तय करने के लिए बाइक या कार से जाते हैं। पार्क में वाकिंग के लिए जाने वाले लोग अपने घरों से वातनुकूलित कार में बैठकर जाते हैं। जरूरी नहीं कि शहर में रहने वाला हर व्यक्ति अपने घर में बड़े बड़े पेड़ ही लगाए। वो साइकिल का प्रयोग करके भी वातावरण को स्वस्थ बनाने में योगदान कर सकता है। प्रोफेसर सिंह के बेटे शिवम नरसिंह भी अपने पिताजी के नक्शे कदम पर बढ़ रहे हैं और साइकिल चलाते हैं। प्रोफेसर सिंह के दामाद विदेश के विश्वविद्यालय में शिक्षक हैं। वो वहां तो साइकिल चलाते ही हैं मगर जब भी विदेश से भारत आते हैं तो शहर में बिना किसी झिझक अथवा संकोच के साइकिल की सवारी करते हुए दिखाई देते हैं। छोटे छोटे बच्चे अनुकृति सिंह और समर सिंह भी साइकिल सवारी कर अपने स्कूल तक जाते हैं।
आज हमें अपने बच्चों को अन्य शिक्षा के साथ साथ प्रकृति और पर्यावरण की शिक्षा भी देनी जरूरी है। साइकिल के महत्व और उसके चहुमुखी फायदों को गिनाने की आवश्यकता है।
साइकिल दिवस को मनाने की शुरुआत साल 2018 में हुई। अप्रैल 2018 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने विश्व साइकिल दिवस मनाने का फैसला लिया। इसके लिए 3 जून का दिन तय किया गया। तब से अब तक भारत समेत कई देश विश्व साइकिल दिवस हर साल 3 जून को मनाते हैं। साइकिल एक सहज, सरल और कम खर्चीला साधन है जो पिछले दो दशकों में बहुतायत में उपयोग किया जाता है। गांवों में आज भी पुराने बूढ़े बुजुर्ग लोग साइकिल से ही चलना पसंद करते हैं। बाजार जाना हो या किसी सगे संबंधी के घर वो साइकिल से ही यात्रा करते दिखते हैं। मगर आज की पीढ़ी में यह कम देखने को मिलता है। वाहनों का प्रयोग युवा पीढ़ी की प्राथमिकता में शामिल होता जा रहा है। साइकिल का जलवायु पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। यह एक टिकाऊ और सस्ता परिवहन भी है जो सबके लिए आसानी से उपलब्ध भी हो जाता है। इसके लिए न तो ड्राइविंग लाइसेंस की जरूरत है और न ही किसी पॉल्यूशन सर्टिफिकेट की।
भारत का परिवेश हमेशा से ही पर्यावरण के प्रति सजग रहा है। वो प्रकृति के साथ तालमेल बिठाकर चलने वाला समाज रहा है। इसके अतीत में देखें तो पहले का समाज प्रकृति से उतना ही लेता था जितने में उसकी जरूरत पूरी होती थी। अब यहां का भी समाज बदलता जा रहा है। पर्यावरण प्रेम सिर्फ अभियान या फिर पाठ्यक्रम में सिमटता जा रहा है। व्यवहारिक जीवन में उतारने के बजाय हम सिर्फ चिंता व्यक्त करने में लगे हैं और बाते करने में लगे हैं। औसत आयु घटती जा रही है। साठ साल की उम्र पाना भी अब इंसानों के लिए दूभर होता जा रहा है। पुरानी पीढ़ियों की उम्र सौ वर्ष तक की भी होती थी और आज भी इस उम्र के लोग हमारे बीच हैं। हमें यह सोचना पड़ेगा कि खाने पीने और भोग विलास के तमाम साधन उपलब्ध हो जाने के बावजूद हम आख़िर तमाम बीमारियों और परेशानियों से क्यों घिरते जा रहे हैं। हम गर्मी से बचने का उपाय ढूंढते हैं बजाय इसके कि गर्मी कैसे कम की जाए। हम आग बुझाने के यंत्र की खोज कर लेंगे बजाय इसके कि आग लगे ही न, ऐसा कुछ किया जाए। हम प्रोटेक्टिव थियरी को ज्यादा बढ़ावा दे रहे हैं बजाय इसके कि समस्या जड़ से हो उखाड़ कर फेंक दी जाए। साइकिल दिवस मनाने के पीछे का उद्देश्य यही है कि इस सुलभ और टिकाऊ साधन की कीमत को हम समझें और अपने जीवन में आत्मसात कर प्रकृति और जलवायु का साथी बनें, उसका सहचर बनें तथा पर्यावरण को दूषित होने से बचाएं। अपने बच्चों को साइकिल का प्रेमी बनाएं। खुद साइकिल चलाएं और दूसरों को साइकिल पर बिठाए… करके देखिए आनंद आएगा। तन और मन तो स्वस्थ रहेगा ही साथ ही धन भी बचेगा जैसे प्रोफेसर हरियाली गुरु के नाम से मशहूर प्रोफेसर नरसिंह बहादुर सिंह ने अपने जीवन में साइकिल को एक अहम हिस्सा बना लिया और वो पैंसठ साल की उम्र में भी बिना किसी बीमारी के स्वस्थ और प्रसन्न हैं।
विवेक रंजन सिंह
छात्र, पत्रकारिता विभाग, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा महाराष्ट्र





