अभी तो यह भीड़ है,
जलूस इसे बनने दे
जड़ तो हिली है आज,
नींव इसकी हिलने दे।
कलमों को तोड़ दिया,
कैमरों को छीन लिया,
जंजीर हो या बेड़ियां,
पर होंठ मत सिलने दे।
गांधी ,नेहरू ,अंबेडकर,
भगत सब कह गए,
समता और भाईचारे के,
फूल यहां खिलने दे।
एक हो, बटवारा रोक,
दुश्मन की पहचान कर,
आवाज और रफ्तार बढ़ा,
सुर सबके मिलने दे।
तूफान हो या आंधियां,
तोप हों या गोलियां,
सिर जोड़ कदम मिला,
मुट्ठियों को भिंचने दे।
अभी तो यह भीड़ है,
जुलूस इसे बनने दे ,
जड़ तो हिली है आज,
नींव इसकी हिलने दे।
-मुनेश त्यागी, वरिष्ठ अधिवक्ता,मेरठ सिविल कोर्ट मेरठ,संपर्क-9837151641
संकलन-निर्मल कुमार शर्मा, ‘गौरैया एवम् पर्यावरण संरक्षण ‘,मोबाईल नम्बर 9910629632



