सिद्धांत जयकुमार
लोग कमी तलाश रहे हैं विपक्ष और विपक्षी नेताओं में लेकिन यह कोई नहीं कहता कि बीजेपी में चालाकी बहुत है।
वहाँ हर फैसला केवल दो लोगों के मध्य केंद्रित है। उन दो लोगों ने जो फैसला ले लिया वह ब्रह्म रेख है यहाँ अच्छे से अच्छे फैसले पर सबकी अपनी आपत्ति है। वहाँ आपत्ति नाम की कोई चीज़ है ही नहीं।
खैर-
ज़ब अग्निपथ जैसी योजना पर पढ़े-लिखें लोग उनके तरफदार हैं। किसान आंदोलन में जीप से कुचलने वाले नेताओं को ही किसान वोट देंगे। बलत्कार किए व्यक्ति को लोग चुनाव जिता देंगे, सबकुछ बेचने वाले को लोग भगवान मानेंगे, पेंशन खत्म करने वालों को वही लोग वोट देंगे जिनकी पेंशन बंद है, समाज में नफ़रत फैलाने वालों को लोग सर आँखों पर रखेंगे, कोरोना जैसी महामारी में पैदल और स्वास्थ्य अनियमितता की भयंकर त्रासदी पर भी उनकी जयजयकार होगी तो ऐसे में विपक्ष की क्या भूमिका हो सकती है? विपक्ष कैसी क्रांति ला सकता है? एक बार अनपढ़ को समझया जा सकता है लेकिन ज़ब सारे पढ़े-लिखे लोग ही गलत के तरफदार हैं तो विपक्ष अपने आप मर जायेगा। ज़ब चालक ही बेवकूफ बना फिर रहा तो समाज सड़ेगा ही।
जिस मीडिया को निष्पक्ष होना चाहिए वह मीडिया उसकी तरफ है।
जिस प्रशासन को एकसमान व्यवहार करना चाहिए वह प्रशासन उसकी वाली करता है।
सारे भ्रष्ट और बिकाऊ नेता उनके डर से उसकी तरफ है।
सारे पढ़े-लिखें और बुद्धिजीवी उनके डर से उनके साथ हैं।
पूँजीपति और पैसे वाले लोग उसकी तरफ हैं।
तो विपक्ष की हालत उस बंदर की तरह होगी जो पेड़ पर एक नहीं हजार बार चढ़कर भी कुछ हासिल नहीं कर सकता है, केवल दिखा सकता है कि मेहनत में कोई कमी नहीं है, ऊपर से अपने को थका लेगा।
ज़ब तक विपक्ष के लोग अपनी पार्टी के प्रति उनसे बढ़कर भक्त, उनके नेताओं से बड़े बेईमान, उनकी राजनीति से ज्यादा काईयापन अपने में नहीं लाएंगे तब तक उनसे लड़ना मुश्किल है।
व्यक्तिगत और पैसे वाले समाज में क्रांति, संघर्ष एवं जागरूक करना वाहियात है, बेकार है क्योंकि क्रांति को चिंगारी दिखाने वाले लोग उनके बुलडोजर और क़ानून के डर से उनके पनाह में हैं। आज हर आदमी केवल गपचुप खाकर बंद कोठरी में जीने को ही समाज मानता है, यही आज का सच है यही असली कारण है।
सिद्धांत जयकुमार





