चिंतक, विचारक और आम आदमी के स्वप्नदृष्टा डॉ राममनोहर लोहिया का आज जन्मदिन है. आज से 115 साल पहले मेरे पैतृक गॉंव अकबरपुर के शहजादपुर में उनका जन्म हुआ था. गांधी जी के बाद डॉक्टर राममनोहर लोहिया मुझे अपनी धरती-मिट्टी, उसकी सुगंध से जुड़े हुए सबसे प्रखर विचारक-चिंतक लगते हैं. उन्हें पढ़कर बार बार लगता है कि उनसे अपना पुराना परिचय है. अपनापा है. वे भीड़ के नेता नहीं थे. वे सिद्धान्तकार थे. ऐसे सिद्धान्तकार जो दो लाइन के नारे में अपनी बात बता और समझा देते थे. वे राजनीति, समाज और अर्थशास्त्र के पंडित थे. भारत की सर्व सुलभ भाषा के निर्माता थे. आत्मा से विद्रोही. नियम तोड़ना लोहिया ने गांधी से सीखा था. फ़र्क़ इतना था कि गांधी को नियम पसंद थे. लोहिया को नियमों से नफरत थी. पर सविनय अवज्ञा और सिविल नाफ़रमानी पर दोनों एक थे. पढ़ते समय हम लोगों पर टाई-शूट, अंग्रेजी और अभिजात्य का खौफ था. पर थोड़े बड़े होने पर विदेश पलट, जर्मन और अंग्रेजी पर समान दखल रखने वाले, चप्पल-धोती पहनने वाले लोहिया मुझे अपने ही आसपास के बेचैन बुजुर्ग-सयाने लगने लगे, जिनके पास हमारी राजनीतिक, सामाजिक, पौराणिक सभी जिज्ञासाओं का समाधान था. मुझे यह मलाल है मैं उन्हें देख नहीं पाया.
मूलतः लोहिया राजनीतिक विचारक, चिंतक और स्वप्नदृष्टा थे, लेकिन उनका चिन्तन राजनीति तक ही कभी सीमित नहीं रहा. मुद्दों पर व्यापक दृष्टिकोण, दूरदर्शिता उनकी चिन्तनधारा की विशेषता थी. राजनीति के साथ-साथ संस्कृति, दर्शन, साहित्य, इतिहास, भाषा आदि के बारे में भी उनके मौलिक विचार थे. लोहिया की चिन्तनधारा कभी देशकाल की सीमा की बन्दी नहीं रही. लोहिया एक नयी सभ्यता और संस्कृति के दृष्टा और निर्माता थे. हमारी राजनीतिक व्यवस्था उनके दर्शन की उपेक्षा तो नहीं कर सकी पर उन्हें पूरी तरह आत्मसात भी नहीं कर सकी. सूत्र में बात करना लोहिया-विचार की विशेषता है, वे सूत्रों के ज़रिए अपनी बात समझाते हैं.
डॉ लोहिया भारत में समाजवादी आन्दोलन के अलम्बरदार थे. विपक्ष क्या होता है?, उसकी ताक़त क्या होती है?भारतीय लोकतंत्र को पहली बार यह बताने वाले राम मनोहर लोहिया ही थे. लोहिया शासकों के लिए आतंक थे. ग़रीबों के लिए हौसला थे. गिरे हुए के लिए प्रेरणा थे. बेज़ुबान की आवाज़ थे. वे भीड़ के नेता नहीं थे. सिद्धान्तों के लिए साथियों को भी छोड़ आगे बढ़ते थे. वे आत्मा से विद्रोही थे. गड़बड़ बस इतनी थी कि उन्होंने अपने बाद की पीढ़ी नहीं गढ़ी. समाजवादी आन्दोलन बिखर गया. उनके समर्थकों में आन्दोलन को आगे ले जाने का सामर्थ्य नहीं रहा. समाजवादी अपने ही सिद्धांतों से टूट फूटकर अलग हो गए . इस देश में जितनी राजनीतिक विचारधाराएँ थीं, उसमें सबसे ज़्यादा क्षरण इसी जमात में हुआ. लेकिन क्षरण आंदोलन और उससे उपजी राजनीति का हुआ. लोहिया के विचार अभी भी ज़िंदा हैं.
डॉ लोहिया का अपने सिद्धांतों के प्रति ज़बर्दस्त आग्रह था. कथनी करनी में फ़र्क़ न हो इसलिए वे इन सिद्धांतों पर कड़ाई से अमल करते रहते थे. मसलन साल 1967 के चुनाव में उन्होंने एक बड़ी बात कही. उन्होंने कहा कि ”मुस्लिम पर्सनल लॉ” और “हिन्दू कोड बिल“ की जगह एक “सिविल लॉ“ लाया जाए जो हिन्दू मुसलमान दोनों पर समान रूप से लागू हो. लोहिया ने नई बहस छेड़ दी. समर्थकों ने उन्हें चुनाव में नुक़सान का भय दिखाकर इस तरह के मामले को न छेड़ने की सलाह दी. पर लोहिया नहीं माने. उन्होंने हर सभा में इसका ज़िक्र किया. हुआ वही, वे तगड़े मुक़ाबले में फँस गए और सिर्फ़ चार सौ वोट से जीते. दुख होता है जब लोहिया के अनुयायी आज सिर्फ धर्म और जाति को राजनीति का आधार बनाते हैं. डॉ लोहिया के इसी उपचुनाव से जुड़ा एक और वाकया है. ये बात साल 1982 की होगी. अकबरपुर की नगरपालिका मेरे पिता जी का सम्मान कर रही थी. मेरे पिता का जन्म शहज़ादपुर में ही हुआ था. वे लोहिया के पड़ोसी थे. नगरपालिका चेयरमैन चौधरी सिब्ते मोहम्मद नकवी पुराने समाजवादी थे. वे हट्टे कट्टे पौने सात फुट के व्यक्ति थे. वे अकबरपुर में डॉ लोहिया के अभिन्न और भरोसेमन्द सहयोगी थे. उस समारोह में पिता जी के साथ मैं भी गया था. गेस्ट हाउस में पिता जी से मिलने नकवी साहब आए. वहीं डॉ साहब की चर्चा छिड़ गयी. चौधरी साहब ने बताया कि मई 1963 में फ़र्रुखाबाद के कांग्रेस सांसद मूलचंद के निधन से उपचुनाव घोषित हुआ था. आम चुनाव में लोहिया जी फूलपुर सीट पर नेहरू से हारकर लोकसभा पहुंचने से रह गए थे. डॉ लोहिया पर समर्थकों का दबाव था कि वे फिर फर्रुखाबाद से उपचुनाव के मैदान में उतरें. आखिरकार लोहिया ने फ़र्रूख़ाबाद से लड़ने का फ़ैसला लिया. वे अकबरपुर आए और चौधरी सिब्ते को प्रचार के लिए फर्रुखाबाद चलने को कहा. रास्ते में पार्टी के किसी साथी ने कह दिया कि सिब्ते भाई अच्छी तकरीर करते हैं. उनके चलते मुसलमानों के वोट हमें आसानी से मिल जाएंगे. इतना सुनना था कि डॉ. लोहिया ने मोटर रुकवाकर सिब्ते को गाड़ी से उतारा और अकबरपुर लौट जाने को कह दिया. साथियों से बोले, ‘जो भी वोट मिलने हैं, हमारी नीतियों व सिद्धांतों के आधार पर मिलें तो ठीक. किसी कार्यकर्ता के धर्म, संप्रदाय या जाति के नाते मिले तो क्या मिले! इस तरह वोट बढ़ाकर जीतने से बेहतर होगा कि मैं फूलपुर की तरह यह मुक़ाबला भी हार जाऊं’. चौधरी सिब्ते पिता जी को बता रहे थे. हमारे साथियों ने बहुत बार कहा कि इस बाबत वे एक बार फिर सोच लें, लेकिन लोहिया जी अडिग रहे और सिब्ते नकवी को अकबरपुर बस से लौट जाना पड़ा. ऐसी थी डॉ लोहिया की सिद्धान्तों के प्रति ज़िद. चौधरी साहब अब नहीं है. जबतक मैं लखनऊ में था तो कभी क़भार मुलाकात होती थी.
लोहिया को समझने के लिए उनकी विचारधारा के अलग अलग पहलुओं को समझना बेहद आवश्यक है और उसके लिए कठिन शब्दों की ज़रूरत नहीं है. लोहिया का आर्थिक दृष्टिकोण भी आज की स्थितियों में बेहद प्रासंगिक है. लोहिया ने समाजवादी अर्थव्यवस्था की परिभाषा के सही मायने समझाए. उन्होंने बताया कि समाजवादी अर्थव्यवस्था का अर्थ है कि उत्पादन के साधन राष्ट्र की संपत्ति होंगे. वे उन साधनों को कुछ लोगों तक सीमित रखने के विरोधी थे. लोहिया इन साधनों का सामाजीकरण चाहते थे जिससे अधिक से अधिक लोगों का कल्याण हो सके. वह दाम बांधने के साथ ही खर्च की सीमा भी तय करना चाहते थे. उनका उस वक़्त दाम बांधने का फ़ार्मूला था- लागत से डेढ़ गुना बिक्री का दाम हो. उस वक्त उन्होंने प्रस्ताव किया था कि आमदनी की खर्च सीमा एक हज़ार से ज्यादा न हो. खर्च की सीमा पर लोकसभा में लंबी बहस हुई थी. लोहिया ये मानते थे कि खर्च की सीमा तय करने से विलासी उपभोक्ता संस्कृति समाप्त होगी.
भारत की आज की विदेश नीति के मूल वास्तुकार जवाहर लाल नेहरू थे. पर इसे डिजाइन किया था डॉ. राम मनोहर लोहिया ने. नेहरू ने जब तिब्बत के सवाल पर चीन के सामने घुटने टेके तो डॉ साहब ने सबसे पहले नेहरू के ख़िलाफ़ झंडा बुलन्द किया और हिमालय बचाओ आन्दोलन छेड़ा. उनका हिमालय बचाओ आन्दोलन केवल पर्यावरण के लिहाज़ से मौजू नहीं था बल्कि सामरिक लिहाज़ से भी था क्योंकि हिमालय चीन और पाकिस्तान के सामने हमारा प्रहरी था. महंगाई के ख़िलाफ़ लोहिया के दाम बांधो आन्दोलन से सरकार को पसीने छूट गए थे. जब हम पिछड़ों के आरक्षण के लिए सोच भी नहीं रहे थे तब उन्होंने आन्दोलन छेड़ा. “संसोपा ने बांधी गॉंठ, पिछड़ा पावें सौ में साठ”- यह एक लाइन समाजवादियों की आरक्षण नीति थी. लोहिया ने जो दो लाइन में जो कहा उसकी नीति बनाने में बाद की सरकारों को दसियों साल लगे.
डॉ साहब पीएचडी के लिए जर्मनी गए. वहां जर्मन भाषा में ही शोध प्रबन्ध लिखा जा सकता था. पहले वे ख़फ़ा हुए. पर मातृभाषा के प्रति जर्मन समर्पण देख डॉ साहब ने जर्मन सीखी और भारत लौटकर अंग्रेज़ी विरोधी आन्दोलन छेड़ा. उनका ये नारा बेहद मशहूर हुआ, “सोशलिस्टों की ये अभिलाषा, चले देश में देश की भाषा”. उनके द्वारा संसद में तीन आना बनाम तेरह आने की बहस गरीब आदमी के जीने का खर्च और प्रधानमंत्री की विलासिता पर होने वाली बहस का रोचक दस्तावेज है.
केरल में कांग्रेस की मदद से पहली बार समाजवादियों की सरकार बनी. समाजवादी पट्टन थानू पिल्लै मुख्यमंत्री बने. किसानों ने आन्दोलन किया. पुलिस ने गोली चलाई. किसान मारे गए. लोहिया नैनी जेल में थे. उन्होंने तार भेजकर अपने मुख्यमंत्री से इस्तीफ़ा माँग लिया. पार्टी में बवाल हुआ. लोहिया ने कहा कि ऐसे आरोपों पर मैं कांग्रेस सरकारों से इस्तीफ़ा माँगता हूँ. उन्होंने जेल से ही मुख्यमंत्री पिल्लै को तार भेजा जिसमें लिखा था- “हो सकता है उपद्रवकारियों की पूरी तरह गलती हो और घृणित स्थिति पैदा हुई हो. लेकिन पुलिस गोलीबारी, जिसमें लोगों की जानें गईं हों, विद्रोह एवं हत्या के हालत हुए हों, ऐसे में निलम्बन और साथ-साथ सरकार के इस्तीफे की सिफारिश करता हूँ.” बाद में इस विवाद ने लोहिया बनाम जेपी का रूप ले लिया. पार्टी में टूट हुई. इस देश में कहीं ऐसी मिसाल नहीं मिलती. डॉ साहब की कथनी और करनी में अंतर नहीं था.
डॉ साहब की सांस्कृतिक दृष्टि में इस देश की आत्मा बसती थी. वो भी परम सेकुलर थे. पर आज के सेकुलरों को उनसे सीखना चाहिए. उन्होंने कहा “ऐ भारत माता! हमें शिव का मस्तिष्क दो, कृष्ण का हृदय दो तथा राम का कर्म एवं वचन दो. हमें असीम मस्तिष्क और उन्मुक्त हृदय के साथ-साथ जीवन की मर्यादा दो.’ यह धर्म के बाबत उनका मानवतावादी दृष्टिकोण था. वह धर्म के साम्प्रदायिक भावावेशों को धर्म नहीं मानते थे.
उस जमाने में उनकी प्रगतिशीलता देखने लायक़ थी. नारी स्वातंत्र्य और समानता की वकालत सबसे पहले उन्होंने की. महिलाओं के प्रति वे भेदभाव के विरोधी थे. उनका मानना था कि औरत से आसक्ति के बीच उसकी सुंदरता नहीं आती. वायदा खिलाफी और बलात्कार के अलावा वे स्त्री से हर सम्बन्ध जायज़ मानते थे. अलमेलु अम्माल और सरस्वती अम्माल केरल की दो बहनें डॉ साहब की पटु शिष्य थीं. इसमें एक तो नारायणदत्त तिवारी मंत्रीमंडल में मंत्री भी बनीं. वे लोहिया जी के अंतरंग किस्से सुनाती थीं. लोहिया जी और सरस्वती अम्माल से जुड़े एक किस्से के तार अपने बाराबंकी वाले पंडित राजनाथ शर्मा तक भी जाते हैं. लोहिया जी फर्रुखाबाद चुनाव से लौटे थे. उनके पांव में अपरस हो गया था. राजनाथ जी पांव में तेल लगा रहे थे. तभी वहां सरस्वती अम्माल आ गईं. मगर राजनाथ जी वहीं बने रहे. उन्होंने तेल लगाना न छोड़ा. लोहिया जी थोड़ी देर तक देखते रहे फिर राजनाथ शर्मा पर बिगड़ गए. लोहिया जी गुस्से में राजनाथ शर्मा से बोले, ‘राजनाथ, तुम्हें सलीका नहीं मालूम है. सरस्वती अम्माल जी यहां आ चुकी हैं और तुम अभी भी तेल लगाए जा रहे हो.’ राजनाथ जी ने लोहिया जी का इशारा समझते हुए तुरंत ही तेल की शीशी सरस्वती अम्माल को पकड़ा दी.
सत्याग्रह, सिविल नाफरमानी, घेरा डालो, दाम बांधो, सप्तक्रांति, नर-नारी समता, रंगभेद, चमड़ी सौंदर्य, जाति प्रथा के खिलाफ, मानसिक गुलामी, सांस्कृतिक गुलामी, दामों की लूट, शासक वर्ग की विलासिता, खर्च पर सीमा, 10 हजार बनाम 3 आने, संगठन सरकार के बीच का रिश्ता, ऐसे असंख्य सवाल, मुद्दे और कार्यक्रम उन्होंने उठाए और लड़े. पहली बार केंद्र सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पेश किया. धारा के खिलाफ चलने की राजनीति की परंपरा डाली और अपने निकट के लोगों को सही मुद्दे उठाकर चुनाव हारने के लिए खड़ा किया. उन्हें शानदार हार पर बधाई दी.
लोहिया गांधी के सत्याग्रह और अहिंसा के समर्थक थे, लेकिन गांधीवाद को वे अधूरा दर्शन मानते थे. वे समाजवादी थे, लेकिन मार्क्स को एकांगी मानते थे. वे राष्ट्रवादी थे, लेकिन विश्व-सरकार का सपना देखते थे. वे आधुनिकतम विद्रोही तथा क्रान्तिकारी थे, लेकिन शांति व अहिंसा के अनूठे उपासक थे. लोहिया मानते थे कि पूँजीवाद और साम्यवाद दोनों एक-दूसरे के विरोधी होकर भी एकांगी और हेय हैं. इन दोनों से समाजवाद ही छुटकारा दे सकता है. फिर वे समाजवाद को भी प्रजातंत्र के बिना अधूरा मानते थे. उनकी दृष्टि में प्रजातंत्र और समाजवाद एक ही सिक्के के दो पहलू हैं. एक-दूसरे के बिना दोनों अधूरे और बेमतलब हैं.
लोहिया ने मार्क्सवाद और गांधीवाद को मूल रूप में समझा और दोनों को अधूरा पाया, क्योंकि इतिहास की गति ने दोनों को छोड़ दिया था. दोनों का महत्त्व मात्र युगीन था. लोहिया की दृष्टि में मार्क्स पश्चिम के तथा गांधी पूर्व के प्रतीक हैं और लोहिया पश्चिम-पूर्व की खाई पाटना चाहते थे. मानवता के दृष्टिकोण से वे पूर्व-पश्चिम, काले-गोरे, अमीर-गरीब, छोटे-बड़े राष्ट्र, नर-नारी के बीच की दूरी मिटाना चाहते थे.
लोहिया की सप्त क्रान्ति उनके विचारों का समुच्चय है. उन्होंने सभी अन्यायों के विरुद्ध एक साथ जेहाद बोलने के लिए सप्तक्रांतियों का आह्वान किया. वे सात क्रांतियां थीं-
•नर-नारी की समानता.
•चमड़ी के रंग पर रची राजकीय, आर्थिक और दिमागी असमानता का विरोध.
•संस्कारगत, जन्मजात जातिप्रथा के खिलाफ और पिछड़ों को विशेष अवसर.
• परदेसी गुलामी के खिलाफ और स्वतन्त्रता तथा विश्व लोक-राज के लिए.
• निजी पूँजी की विषमताओं के खिलाफ और आर्थिक समानता के लिए तथा योजना द्वारा पैदावार बढ़ाना,
• निजी जीवन में अन्यायी हस्तक्षेप के खिलाफ और लोकतांत्रिक पद्धति.
• अस्त्र-शस्त्र के खिलाफ और सत्याग्रह.
इन सात क्रांतियों के सम्बन्ध में लोहिया ने कहा- मोटे तौर से ये हैं सात क्रांतियाँ. सातों क्रांतियाँ संसार में एक साथ चल रही हैं. अपने देश में भी उनको एक साथ चलाने की कोशिश करनी चाहिए. जितने लोगों को भी क्रांति पकड़ में आयी हो उसके पीछे पड़ जाना चाहिए और बढ़ाना चाहिए.
दूसरे महान चिंतकों की तरह लोहिया ने सुव्यवस्थित ढंग से अपने विचारों और सिद्धान्तों पर कोई किताब नहीं लिखी. छोटे छोटे नारों के ज़रिए अपने सभी सिद्धान्तों को जनता तक पहुँचाया. लेखन-भाषण, सभा-गोष्ठियों में दिए विचार, ‘जन’ ‘मैनकाइंड’ में लिखी चीजें, पार्टी अधिवेशनों में हुई बहसें, लोकसभा की बहसें ही वे आधारभूत चीजें हैं, जिनसे लोहिया जी की वैचारिक मान्यताओं के बीच एक अटूट रिश्ता, श्रृंखला या तारतम्य की तलाश की जा सकती है.
लोहिया के बताये रास्ते पर चलने वाला आज कोई दल, संगठन या फोरम नहीं है. दल के संबंध में उनकी कल्पना अद्भुत थी. ‘फ्रैगमेंट्स ऑफ वर्ल्ड माइंड’ में उन्होंने कहा है कि ‘सोशलिस्ट पार्टी की सबसे बड़ी कमजोरी उसका नकारात्मक दृष्टिकोण है. हमारी पार्टी में शिकायत करने की ताकत तो बची हुई हैं, पर सोचने और कर्म करने की ताकत गायब हो गयी है. यह नकारात्मकता सोशलिस्टों का स्वभाव बन गयी है. उन्होंने कहा भी कि विचार की सफलता के लिए कर्म और संघर्षशीलता दोनों का मिश्रण जरूरी है.
लोहिया जी का पूर्वानुमान गजब का था.लोहिया के न रहने के बाद 1967 से 1972 तक जयप्रकाश जी सर्वोदय सम्मेलनों के ज़रिए अपनी बात कहते रहे. तब उन्हें कोई सुनता नहीं था. डेढ़-दो सौ की संख्या वाली सभाएं ही उनकी हो पाती थीं. बाद में सर्वोदय आन्दोलन का सरकारीकरण होता रहा. बाक़ी विनोबा ने 1974 में ही सर्वोदय को सरकार को सौंप दिया. लोहिया की यही ताक़त थी. वे विनोबा को अपने ही वक़्त में पहचान चुके थे. वह विनोबा को मठीगांधी कह उनकी निष्क्रियता और सत्तापरस्ती का पर्दाफ़ाश कर चुके थे. जेपी का स्वप्न-भंग 1972-73 में हुआ. लोहिया का आज़ादी के चार पांच साल बाद ही हो गया था.
लोहिया विलक्षण ऊर्जा और ताकत के साथ लोकसभा के अंदर और बाहर, आम आदमी के लिए लड़े. हालांकि जिन साथियों के साथ 42 में पुलिस से लड़ते हुए उन्होंने गोलियों का सामना किया था, बाद में वे भी अलग हो गये थे. जेपी, अच्युत पटवर्द्धन, अशोक मेहता, अरूणा आसफ अली सब एक एक कर अलग होते गए. संवेदनशील, चिंतक, विचारक और भारतीय संस्कृति के व्याख्याता के रूप में उनके व्यक्तित्व को आंका नहीं गया. भारत के तीर्थ, भारत की नदियां, इतिहास चक्र, हिमालय, भारत की संस्कृति, भाषा, भारत का इतिहास लेखन और विश्व एकता के सपने पर उन्होंने मौलिक-विचार दिए थे. वशिष्ठ, वाल्मीकि, रामायण, कृष्ण, राम, शिव, रामायण मेला जैसे विषयों की जो मौलिक अवधारणाएं, व्याख्याएं उन्होंने दीं, वैसा किसी संत, साधक या महान बुद्धिजीवी ने भी नहीं सोचा. डॉ लोहिया की राजनीति इन्हीं मौलिक विचारों, बिंदुओं की बुनियाद पर खड़ी थी.
उनके समग्र मूल्यांकन में कुछ कमियां भी नज़र आती हैं. संगठन नहीं चला पाने की उनमें जबरदस्त कमी रही. लोहियावादियों के बारे में वह जुमला ही चल पड़ा कि वे दलतोड़क होते हैं. खंड-खंड में बंटने को अभिशप्त. आप आज देख लें. खुद को लोहियावादी माननेवाले चेहरे आज कांग्रेस, भाजपा, जनता दल, सजपा, तेलुगु देशम से आइपीएफ तक फैले हैं. अर्थशास्त्रियों के संदर्भ में पुरानी प्रचलित कहावत है, पांच अर्थशास्त्री होंगे, तो छह विचार होंगे. यही हालत लोहिया के अनुयायियों की रही. समाजवादियों का अतीत चाहे जितना भी समृद्ध रहा हो, पर आज उनकी विरासत पर सवाल तो उठते ही हैं.
‘महारानी के खिलाफ मेहतरानी’ को खड़ा करने के सामाजिक समता के संकल्प से बद्ध वे खुद को नास्तिक मानते थे. भारतीय इतिहास के यक्ष प्रश्न उन्हें मथते रहे. वह जानना चाहते थे कि जब बुद्ध और आम्रपाली की भेंट हुई होगी, तो क्या हुआ होगा? आम्रपाली ने क्यों बुद्ध पर सर्वस्व न्योछावर किया और बुद्ध ने आम्रपाली को कैसे स्वीकार किया? कन्याकुमारी की शिला पर ध्यानमग्न विवेकानंद किस दिशा की ओर मुंह किये बैठे होंगे?
भारत के तीर्थस्थल सारनाथ, अजंता, एलोरा, कोणार्क, खजुराहो, महाबलीपुरम, रामेश्वरम, उर्वशीयम जैसी जगहों उन्हें बार-बार खींचती थीं. चित्रकूट के किस रास्ते राम दक्षिण की ओर निकले होंगे? उनकी अभिलाषा रही कि ‘एक बार चित्तौड़ से द्वारिका पैदल जाऊं जिस रास्ते मीरा गयी थी. वे चित्तौड़ में जौहर इतिहास को महिमामंडित करने के सवाल से बेचैन इंसान थे. वे राजगृह में जरासंध का अतीत ढूंढने वाले यात्री थे. बिना पासपोर्ट के ध्रुव से ध्रुव तक देशों में यात्रा करने के आकांक्षी थे. द्रौपदी को आदर्श बतानेवाले डॉ लोहिया ‘ईश्वर’ और ‘औरत’ को जीवन में सबसे महत्वपूर्ण मानते थे. उन्होंने गांधी के रामराज्य के स्थान पर ‘सीताराम राज’ की कल्पना की. वे राधा के चरित्र के नये व्याख्याकार थे. मीरा की सात्विक सौंदर्य-भक्ति से प्रभावित थे. हिंदी के नये शब्दों-मुहावरों के प्रणेता थे. उस दौर की पूरी की पूरी सृजनशील पीढ़ी को झकझोरने वाले थे.
उनका व्यक्तित्व एक बंधे-बंधाए सांचे में निरूपित नहीं किया जा सकता. अब तक की पूरी चर्चा उनके व्यक्तित्व की एक झलक जैसी थी. इसे उनकी अपूर्ण राजनीति की झलक भी कह सकते हैं. वे राजनीति को अल्पकालीन धर्म और धर्म को दीर्घकालीन राजनीति कहते थे. उनका उद्देश्य बुराई से लड़ना था. राजशक्ति की राक्षसी ताकत के खिलाफ साबूत खड़ा होना था. यूगोस्लाविया में मित्र मिलोवन जिलास की कैद, कांगों में लुमुंबा की हत्या, पाकिस्तान में खान अब्दुल गफ्फार खां की जेल और तत्कालीन विश्व स्थिति से निराश लोहिया एशिया-अफ्रीका में नयी राजनीति और नये विकल्प की तलाश में बेचैन थे.
वे जिस नई सभ्यता के अन्वेषक थे, उसी नयी सभ्यता की आवश्यकता के संदर्भ में उनकी प्रासंगिकता सर्वाधिक है. तीसरे विकल्प की तलाश में बेचैन उनकी पूरी राजनीति और विचार-यात्रा, इसी विकल्प की तलाश में केंद्रित रही. उनकी पूरी लड़ाई नये मनुष्य, नयी व्यवस्था और नये सपने के ईद-गिर्द रही. इस साम्यवाद और पूंजीवाद के विफल होने के बाद की इस बेचैन दुनिया को आज एक नये विकल्प, नयी सभ्यता और संस्कृति की तलाश है. उसे अपने अस्तित्व की लड़ाई भी लड़नी पड़ रही है. इसी कारण से आज लोहिया बेहद प्रासंगिक हो उठे हैं.
आलोचना के शब्द लोहिया को एक असफल पीढ़ी देने वाला विचारक कह सकते हैं. लेकिन लोहिया के विचार और जीवन को कटघरे में खड़ा नहीं किया जा सकता. आगे की पीढ़ी का पतन लोहिया की जिम्मेदारी नहीं है. यह उन लोगों की जिम्मेदारी है जो रास्ते से भटके, लोहिया को भूल गए और स्वार्थ की गति चढ़े. लोहिया से पहले कितने ही नबियों, विचारकों, समाज सुधारकों के साथ ऐसा हुआ है. लोहिया से भटकने के लिए ज़िम्मेदार पीढ़ियों से हिसाब इतिहास मांगेगा. वही इतिहास लोहिया का मुल्यांकन भी करेगा और वहीं से निकलने वाली प्रेरणाएं भविष्य की राजनीति को, विचारों को, समाज को दिशा भी देंगी.
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