लोहिया ने रीवा (मध्यप्रदेश) के एक गांव की एक औरत को गोबर से भोजन के लिए अन्न छानते देखा था और इतने मर्माहत हुए कि वही गोबरी का मुट्ठी भर अन्न लिये सीधे लोकसभा पहुंच गए थे। लोहिया ने सदन में कहा कि देश की जनता तीन आने रोजाना में जी रही है और उसके प्रधानमंत्री पर रोजाना पचीस हजार रुपए खर्च हो रहे हैं। देश की जनता की स्थिति तो प्रधानमंत्री निवास में रह रहे कुत्ते से भी गई-गुजरी है क्योंकि उस पर तो तीन आने से भी ज्यादा खर्च होता है।

नेहरू इतने विचलित हो गए कि इसके जवाब में तथ्य देने के बजाय कहा- लोहिया का दिमाग फिर गया है, देश की जनता की रोजाना आमदनी पंद्रह आने है। लोहिया ने चुनौती दी कि यदि मेरी बात गलत निकल जाए तो मैं लोकसभा हमेशा के लिए छोड़ दूंगा। नेहरू ने योजना आयोग के उपाध्यक्ष समेत अपनी पूरी आर्थिक सलाहकार परिषद को तथ्य और प्रमाण जुटाने में लगा दिया, लेकिन सब मिलकर भी लोहिया की बात को झुठला नहीं सके।
भारत के राजनीतिक इतिहास में यही प्रसंग तीन आने बनाम पंद्रह आने की बहस के तौर पर जाना जाता है।
देश में आर्थिक विषमता को लेकर हुई उस जोरदार बहस के पचास साल बाद भी स्थिति न सिर्फ जस की तस है, बल्कि और ज्यादा भयावह हुई है।
अनेक क्षेत्रों में देश का विकास हुआ है, अर्थव्यवस्था का आकार भी बढ़ा है, फोर्ब्स सूची में भारतीय अमीरों की संख्या भी बढ़ी है, पर सब कुछ एकतरफा। आर्थिक विषमता की खाई उत्तरोत्तर और चौड़ी होती गई है। अमीर ज्यादा अमीर होते गए, गरीब ज्यादा गरीब। देश में खतरनाक किस्म का आर्थिक ध्रुवीकरण हुआ ।
प्रस्तुति नीरजकुमार





