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*प्रेम है परमात्मा : मंज़िल मांगती है बस तीन कदम*

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       डॉ. विकास मानव

प्रेम ही परमात्मा है. यह निराकार ईश्वर से हो या साकार इंसान में बसते भगवान से : इसका स्वीकार है परमसुख.

*श्रवण है पहला चरण :*

     जरा अपने मन का खयाल करें कि क्या पूरे वक्त भीतर हां और ना कहते रहते हैं?  कौन कह रहा है यह हां और ना ? 

     चैतन्य नहीं कह रहे हैं, यह मन है, जिसे इकट्ठा किया है। तो मन अपने अनुकूल को चुनता है और प्रतिकूल को छोड़ देता है। तब बड़ी कठिनाई है! इसी मन को मिटाना है; और यह अनुकूल को चुनता है और प्रतिकूल को सुनता ही नहीं, यह मिटेगा कैसे?

यही मन है दुश्मन और यही है नियंता; इसी को मिटाने चले हैं और इसी के सहारे मिटाने चले हैं; तो कभी न मिटा पाएंगे।

    तो जरा सी एक बात खटक जाए, कि यह बात नहीं जंचती मान्यताओं में, बस मन द्वार बंद कर लेता है कि सुनो ही मत अब, अनसुना कर दो या विरोध करते जाओ भीतर। सुरक्षा में लगे हैं अपनी, जैसे कोई संघर्ष चल रहा है। श्रवण नहीं हो पाएगा फिर। फिर एक कलह चल रही है।

      श्रवण का अर्थ कोई अंधा स्वीकार नहीं है। श्रवण का स्वीकार से कोई संबंध ही नहीं है। श्रवण का संबंध सिर्फ इस बात को ठीक से सुन लेने से है कि क्या कहा गया है। 

*दूसरा चरण है, मनन :*

      जो कहा गया है उसे सुन कर मनन करना है, जो कहा गया है उसकी प्रामाणिकता में सुन कर मनन करना है। यह मनन की पहली शर्त है। अपने मतलब का चुन लिया, उस पर मनन किया, वह मनन नहीं है, वह धोखा है।

      तो मनन की पहली शर्त. सुन लिया, बिना हां—न किए। निंदा, प्रशंसा, स्वीकार—अस्वीकार—कुछ भी नहीं, कोई मूल्यांकन नहीं, कोई निर्णय नहीं—पक्ष न विपक्ष; मौन, तटस्थ सुन लिया, क्या कहा है।

    उसे उतर जाने दिया हृदय के आखिरी कोने तक, ताकि उससे परिचय हो जाए। जिससे परिचय है, उसी का तो मनन हो सकता है।

*तीसरा चरण है चिंतन :*

     चिंतन हम उसका करते हैं, जिसका कोई ठीक से परिचय ही नहीं है। चिंतन है अपरिचित के साथ बुद्धि की प्रक्रिया, व्यायाम। मनन है परिचित के साथ—जिसे आत्मसात किया, डुबा लिया अपने में भीतर, उस पर विचार।

दोनों में बड़ा फर्क है।

    चिंतन में कलह है, मनन में सहानुभूति है। चिंतन में द्वंद्व है, मनन में विमर्श है। ये बड़े फर्क हैं।

चिंतन मूलतः नुकसान से होने वाली तैयारी मालूम पड़ती है, भय के फलस्वरूप होने वाले नुकसान की गणना , उसे लाभ में बदलने की चेष्टा या न्यूनतम करने का प्रयास ,अब सवाल ये है कि नुकसान किसका?

      जो शाश्वत है उसका तो नुकसान सम्भव ही नहीं तो फिर जो मिथ्या है उसके बचने से क्या लाभ, अहंकार की रक्षा, विजय का दंभ चाहिए तो चिंतन तो करना ही होगा अतः लड़ना आवश्यक है तो लड़ रहे हैं किसी नुकसान के विचार से,अगर न जीत पाए, तो मान लेंगे। लेकिन मानने में पीड़ा रहेगी।

      इसलिए जब किसी से विवाद करते हैं, और उससे तर्क नहीं कर पाते, और मानना पड़ता है, तो पता है, भीतर कैसी पीड़ा होती है! मान लेते हैं, क्योंकि अब तर्क नहीं कर सकते हैं; लेकिन भीतर? भीतर तैयारी रहती है कि आज नहीं कल, उखाड़ कर फेंक देंगे यह सब, आज नहीं कल, अस्वीकार कर देंगे।

      इस दुनिया में किसी भी व्यक्ति को तर्क से रूपांतरित नहीं किया जा सकता; क्योंकि तर्क का मतलब है, पराजय। अगर उसको तर्क से कुछ सिद्ध भी कर दिया, तो वह हारा हुआ अनुभव करेगा, बदला हुआ नहीं। हारा हुआ अनुभव करेगा कि ठीक है, मैं जवाब नहीं दे पा रहा हूं,  तर्क नहीं खोज पा रहा हूं; जिस दिन तर्क खोज लूंगा, देखूंगा। हारा हुआ ये अनुभव करेगा।

     ध्यान रहे, हारा हुआ आदमी कभी भी बदला हुआ आदमी नहीं होता। तो किसी को चुप करा सकते हैं तर्क से, रूपांतरित नहीं कर सकते। और बात भी ठीक है, तर्क से रूपांतरित किसी को होना भी नहीं चाहिए, क्योंकि जब दो व्यक्ति विवाद करते हैं, तो जो हार जाता है, जरूरी नहीं है कि वह गलत रहा हो, जो जीत जाता है, जरूरी नहीं है कि सही रहा हो। इतना ही जरूरी है कि जो जीत गया है, वह ज्यादा तर्क कर सकता था; जो हार गया है, वह कम तर्क कर सकता था। इससे ज्यादा कुछ भी पक्का नहीं है।

       तो स्वाभाविक है कि तर्क से कोई कभी बदलता नहीं; क्रांति कोई घटित नहीं होती। तर्क से आघात लगता है अहंकार को, और अहंकार बदला लेना चाहता है। तर्क एक संघर्ष है।

चिंतन में एक संघर्ष है भीतर। जो भी चिंतन करते हैं, उससे जूझते हैं, लड़ते हैं; एक भीतरी लड़ाई चलती है। अपनी सारी अतीत की स्मृति और सारे अतीत के विचारों को उसके खिलाफ खड़ा कर देते हैं।

       फिर भी अगर हार जाते हैं, तो मान लेते हैं; लेकिन मानने में एक पीड़ा, एक दंश, एक कांटा चुभता रहता है। वह मानना मजबूरी का है। उस मानने में कोई प्रफुल्लता घटित नहीं होती। उस मानने से आपका फूल खिलता नहीं है, मुर्झाता है और आज का मनुष्य पहले दो चरणों मे जाना ही नहीं चाहता, समयाभाव है या वो कभी इनको जानने का प्रयास ही नहीं कर पाता यही मनुष्यता की समस्या हो चुकी है.

    कोई श्रवण ही नहीं तो मनन कैसे संभव होगा, बहुत से लोगों को तो सजा मालूम होती है श्रवण में, 

अतः चिंतन ही इस युग के तथाकथित बुद्धिजीवीयों का काम है, जो सर्वाधिक सुविधाजनक है वही स्वीकार्य है और भौतिक जगत का यही विस्तार है जो निरन्तर जारी है, आसमान के पार, दूसरे ग्रहों तक.

     अगर कहीं आध्यात्मिकता के फूल खिलें तो श्रवण उसका पहला चरण है, स्वीकार दूसरा और समर्पण तीसरा। बिना समर्पण प्रेम असंभव है और बिना प्रेम उस परम की झलक.

Ramswaroop Mantri

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