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महाजनी पूंजी आलेख प्रेमचंद की वसीयत मानी गई

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प्रेमचंद जयंती पर प्रलेसं का आयोजन* 

 *इंदौर।* प्रगतिशील लेखक संघ के गठन में प्रेमचंद ने सज्जाद जहिर के साथ मिलकर महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। प्रेमचंद साहित्य में धर्मनिरपेक्षता शब्द का उल्लेख नहीं है। वे विदेशी पराधीनता से ही नहीं आंतरिक पराधीनता से भी कलम के माध्यम से लड़ रहे थे। महाजनी पूंजी आलेख प्रेमचंद की वसीयत माना गया है।

            ये विचार प्रगतिशील लेखक संघ इंदौर इकाई द्वारा विख्यात लेखक प्रेमचंद की जयंती पर आयोजित गोष्ठी में कलम कारों द्वारा यह व्यक्त किए गए।

         कई कृतियों के लेखक राम आसरे पांडे ने अपने संबोधन में कहा कि अंग्रेज सरकार द्वारा प्रेमचंद के उपन्यास सोजे वतन पर प्रतिबंध लगाने के पूर्व उनकी एक कहानी “सच्चा मोती” पर भी प्रतिबंध लगाया गया था। अपने प्रारंभिक जीवन में वे गांधीवाद से प्रभावित थे। प्रेमचंद साहित्य के नायक और पात्र धार्मिक अथवा पौराणिक नहीं अपितु पीड़ित और वंचित थे। उनके साहित्य में धर्मनिरपेक्षता शब्द का उल्लेख नहीं है, जबकि प्रेमचंद साहित्य धर्मनिरपेक्ष मूल्यों का पोषक रहा है। ये मूल्य आज भी प्रासंगिक बने हुए हैं, इसीलिए प्रेमचंद सर्वकालिक और सार्वभौमिक लेखक माने गए हैं। पाठक सहज ही प्रेमचंद के पात्रों से जुड़ जाता है। रामाआसरे पांडे ने स्वरचित कविताओं का वाचन भी किया।

                वरिष्ठ पत्रकार जावेद आलम ने प्रलेसं के गठन के संबंध में प्रेमचंद द्वारा सज्जाद जहिर के साथ किए गए पत्र व्यवहार का उल्लेख करते हुए कहा कि लखनऊ सम्मेलन की सदारत के लिए उन्होंने स्वयं को अंतिम स्थान पर रखा था। पत्र में प्रेमचंद ने देश के बिगड़ते हालात का जिम्मेदार सियासतदानों को बताया था। वे चाहते थे कि इसे सुधारने में साहित्यकार अपनी भूमिका निभाएं।

 भारतीय जन नाट्य संघ इप्टा के विवेक मेहता ने भी इसी पत्र व्यवहार का वाचन करते हुए बताया कि प्रेमचंद लेखक संघ की पत्रिका निकालना चाहते थे। प्रलेसं गठन के लखनऊ अधिवेशन पर उन्होंने कहा था कि “फाका मस्तों की जमात जुटेगी” प्रेमचंद कालीन सरोकार आज भी प्रासंगिक हैं। प्रेमचंद साहित्य  सामाजिक- राजनीतिक बदलाव का साधन बना है। इसलिए शासक डरे हुए हैं और पाठ्यक्रमों से प्रेमचंद साहित्य को हटाया जा रहा है।

              लेखक और पत्रकार अभय नेमा ने 1930 के दौर का स्मरण करते हुए कहा कि उस काल में गांधी जी का असहयोग आंदोलन चल रहा था, प्रेमचंद उससे प्रभावित थे। उन्होंने उसी काल में हंस पत्रिका का प्रकाशन प्रारंभ किया था। प्रेमचंद ने विदेशी पराधीनता के विरुद्ध ही नहीं आंतरिक पराधीनता जमीदारी के खिलाफ भी कलम चलाई थी। देश से सामंतवाद तो समाप्त हो गया लेकिन उसके मूल्य बने हुए हैं। अभय नेमा ने स्वरचित कहानी “हेलमेट” का वाचन किया।

               कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए इकाई अध्यक्ष चुन्नीलाल वाधवानी ने कहा कि कट्टरता वादी भाषा के नाम पर लोगों को लड़ाने का काम कर रहे हैं। हिंदी- उर्दू विवाद को विख्यात लेखक गोपीचंद नारंग ने बकवास बताया था। शासक आपसी भाईचारा तोड़ना चाहते हैं प्रेमचंद का साहित्य लोगों को जोड़ता है।

             कार्यक्रम का संचालन करते हुए हरनाम सिंह ने अपने आलेख का वाचन करते हुए कहा कि प्रेमचंद के अनुसार वर्षों तक समाज का नेतृत्व मजहब के हाथों में रहा है, इसे अब साहित्य के हाथों में होना चाहिए। जीवन के अंतिम वर्षों में लिखा उनका आलेख “महाजनी सभ्यता” प्रेमचंद साहित्य का निचोड़ माना गया है। उसे प्रेमचंद की वसीयत भी बताया जाता है। इस आलेख में उन्होंने देश में उदित हो रहा रहे पूंजीवाद की पहचान की है। प्रेमचंद की महाजनी पूंजी अब अंतरराष्ट्रीय वित्तीय पूंजी में बदल कर विकासशील देशों का शोषण कर रही है।

 सामाजिक कार्यकर्ता योगेंद्र महावर ने सरकार द्वारा पाठ्यक्रम से प्रेमचंद साहित्य के हटाए जाने पर ध्यान आकृष्ट करते हुए इस प्रवृत्ति का विरोध करने का आग्रह किया।

                इप्टा के विजय दलाल ने कहा कि प्रेमचंद काल के पूर्व सामाजिक बुराइयों के बारे में नहीं लिखा जाता था। उन्होंने मोहम्मद रफी की पुण्यतिथि पर उनके द्वारा गाया गीत ” तू हिंदू बनेगा न मुसलमान बनेगा गाया।

               युवा कवि विनम्र मिश्रा ने कहा कि गरीबों और किसानों की पीड़ा को आंकड़ों से नहीं समझा जा सकता। वह पीड़ा संवेदना के साथ प्रेमचंद साहित्य में व्यक्त की गई है। अपनी कविता में विनम्र मिश्रा ने कहा कि 

*जमाने के पीछे चल या चाल जमाने की बदल*

 *साथियों को देख चल या साथियों के साथ चल* गोष्ठी में असद सिद्धकी, साजिद और रेहान ने भी अपने विचार रखे।

 *पाठ्यक्रम में शामिल हो प्रेमचंद साहित्य*

 गोष्ठी में सर्वानुमति से एक प्रस्ताव पारित किया गया जिसमें सरकार द्वारा स्कूली पाठ्यक्रम से प्रेमचंद साहित्य को निकालने का विरोध किया गया। प्रस्ताव में सरकार से मांग की गई है कि जिन जिन राज्यों में प्रेमचंद की कहानियां स्कूली किताबों से निकाली गई है उन्हें वापस सम्मिलित किया जाए।

हरनाम सिंह

Ramswaroop Mantri

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