सुसंस्कृति परिहा र
व्यंग्यकार प्रेम जनमेजय अपने एक लेख के प्रारंभ में लिखते हैं -“लोग दीपावली पर लक्ष्मी पूजन करते हैं, मेरा सारे वर्ष चलता है। फिर भी लक्ष्मी मुझ पर कृपा नहीं करती। मैं लक्ष्मी-वंदना करता हूँ, हे भ्रष्टाचार प्रेरणी, हे कालाधनवासिनी, हे वैमनस्यउत्पादिनी, हे विश्वबैंकमयी! मुझ पर कृपा कर! बचपन में मुझे इकन्नी मिलती थी पर इच्छा चवन्नी की होती थी, परंतु तेरी चवन्नी भर कृपा कभी न हुई। यहाँ तक मुझमें चोरी, भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी आदि की सदेच्छा भी पैदा न हुई वरना होनहार बिरवान के होत चिकने पात को सही सिद्ध करता हुआ मैं अपनी शैशवकालीन अच्छी आदतों के बल पर किसी प्रदेश का मंत्री/किसी थाने का थानेदार/किसी क्षेत्र का आयकर अधिकारी/आदि-आदि बन देश-सेवा का पुण्य कमाता और लक्ष्मी नाम की लूट ही लूटता।”

वास्तव में यह तकलीफ़ आजकल हर उस आम आदमी की है जोअब तक ईमानदार है और मेहनत की रोटी खाता है या यूं कहें जो अपने कर्म पर यकीन रखता है और यह मान के चलता है कि एक ना एक दिन लक्ष्मी उस पर मेहरबान होंगी।उसके भी दिन फिरेंगे।इसी आस और विश्वास में उसका तमाम जीवन यूं ही ख़त्म हो जाता है वह बहुत शिद्दत से लक्ष्मी पूजन करता है घर के द्वार खुले रखता है पर चंचला लक्ष्मी तो वहीं रुख़ करती हैं जहां धन होता है उसे और धन देकर वह भी दुनिया का नंबर वन बनाने में लगी है।यह लक्ष्मी की फितरत है तो ग़म काहे का।

हमारे यहां तो जो थोड़ा बहुत सहारा हमारी सरकार का रहता था वह भी अमीरों की संगति में जाता रहा है।सात साल से भारत सरकार भी लक्ष्मीपुत्रों को बहुत ऊंचाई पर देखना चाहती है।उसकी तमाम कोशिशें जारी हैं। देशवासियों के ऐसे दुर्दिन आ गये हैं देश की सम्पत्ति बेची जा रही है। लालकिले से लेकर बड़े-बड़े संस्थान,रेल, सड़कें, हवाई अड्डे, सरकारी ज़मीनें,बैंक,बीमा, बीएसएनएल सब निजी हाथों में होगा। निजीकरण का मतलब लक्ष्मीपुत्रों के हाथ में सब कुछ सौपना।जिस पर जनता का कोई दबाव नहीं होगा। सरकार को तो जनता पटकनी देने की क्षमता रखती है लेकिन जब सब निजी व्यक्तियों का हो जाएगा तो वह किसके आगे रोएगा या गिड़गिड़ायेगा। अब राजा भी नहीं है कि दरबार में पहुंच जाए।वे तो एंटीलिया में सुरक्षित बैठेंगे और हम लुटते रहेगे।जब देश ही उनका होगा तो कैसी सरकार ?

पेट्रोल,डीजल,गैस का क्या हाल कर दिया है इन लोगों ने सब इन्हीं के हाथों में है जैसा बेचेंगे लेना ही होगा।जियो ने तो पहले साल जाल फैलाया फ्री का कि लोग जियो के दीवाने हो गए।नि: शुल्क मोबाइल बंटवाए अब चार्ज कराइए रोना आता है।ओन लाइन शिक्षा के वशीभूत हो स्मार्ट फ़ोन ख़ूब बिके।घर तक गिरवी रखे गए अब बेलैंस ना डलवाने के कारण कुछ भी हासिल नहीं कर पाए। गैसचूल्हे भी बांटे गए एक बार मुफ्त सिलेंडर दिया बाद में क्या हुआ सब सामने है? डीज़ल पेट्रोल के बढ़े रेट से परिवहन मंहगा हुआ तो सब चीजों के दाम बढ़ गए।कहने का आशय यह कि ज़रुरत की तमाम उपभोक्ता सामग्री मंहगी हो गई।
अब अनाज के बड़े-बड़े गोदाम अडानी ने बनाकर रखें है रेलवे के नज़दीक जो उत्दपादन केन्द्रों के करीब हैं मतलब साफ़ है कि अब अन्नदाता से अनाज खरीदने छोटे कारोबारी नहीं बल्कि लक्ष्मीपुत्र के लोग के आयेंगे मनमाने दामों में खरीदेंगे और फिर बीस का माल पचास और सौ में बेचेंगे।। उनसे सरकार भी जब अनाज लेगी तो यही रेट लिया जाएगा यानि राशन में मुफ्त बांटने वाले अनाज की संभावना शून्य हो जाएगी। आइए इस बात को कश्मीर की प्रमुख फसल सेब फल के साथ क्या हुआ समझते हैं। वहां धारा 370हटते ही अडानी के बिचौलियों ने पहले साल सेब जो 20-25 रुपए किलो के हिसाब से बिकता था उसे कश्मीर सेब उत्पादकों से 35 रुपए में ख़रीदा ।उनके बाज़ार को ख़त्म किया और अब 15-16रुपये किलो मेंखरीद रहे हैं वहीं हमें बाज़ार में 100 से लेकर 150-200 तक मिल रहा है इसी तरह खाद्यान्न पर डाका डालने तीन कृषि कानूनों बनवाए गए हैं जिनके विरोध में किसान अडिग हैं और जान की परवाह ना करते हुए आंदोलनरत हैं।ये तय है यदि किसानों की मांगें नहीं पूरी की गई तो पक्का है देश बर्बाद हो जाएगा।
ऐसे हालात में राहुल गांधी ठीक कहते हैं हम दो मोदी-शाह और हमारे दो अडानी-अंबानी के सिवा देश में कौन तरक्की कर सकता है। बेरोजगारों को रोजगार नहीं उल्टे निजीकरण के चलते लोगों की छंटनी हो रही है। सरकारी संस्थानों में शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी निजी संस्थानों को आमंत्रित किया जा रहा है।देश को एकता के सूत्र में सस्ते में जोड़ने वाली रेल मंहगी और कम कर दी गई है ।प्राय:सभी छूटों पर विराम लगा दिया गया है।भारत सरकार की रेल चंद माह में अडानी रेल हो जायेंगी। सरकारी कर्मचारी परेशान हैं वहां एक से चार के बराबर काम लिया जा रहा है वेतन एक का है ।बैंक लुटेरों का बोलबाला है रिटायर कर्मचारी अपने मेहनत की कमाई को लुटते देख रहा ।ब्याज दर कम होती जा रही है तिस पर ये कहा जा रहा है कि बैंक यदि डूबते हैं तो उसे पांच लाख तक की राशि लौटाई जाएगी।जमा बीस तीस लाख होंगे और वापसी पांच लाख।यह दंश वे झेल रहे हैं।सवाल ये है डूब क्यों रहे हैं?देश की सम्पत्ति बेचने के बाद लोगों की निजी सम्पत्ति और आभूषणों का भी नंबर शीध्र आ सकता है।सबै भूमि गोपाल की।सब कुछ उसी का दिया हुआ है ।मलाल कैसा ?ऐसा लगता है सरकार अपनी तमाम समस्याओं से मुक्ति के लिए निजीकरण पर ज़ोर दे रही है ना रहेगा बांस और ना बजेगी बांसुरी। हमारे गूंगे बहरे माननीय सांसदों और मंत्रियों की चुप्पी ने एक गंभीर चुनौती देश के सामने उत्पन्न कर दी है। यानि भारत देश के मालिक हमारे दो अडानी-अंबानी ही होंगे।हम सब उनके गुलाम। न्यूजीलैंड के लेखक ब्रायड ने भारत की दर्दशा देखते हुए पिछले दिनों लिखा था कि भारत में धर्म लेन-देन वाले व्यवसाय जैसा है। भारतीय लोग भगवान को भी पैसा देते हैं, इस उम्मीद में कि भगवान बदले में दूसरे की तुलना में इन्हें वरीयता देकर फल देंगे। ये तर्क इस बात को दिमाग मे बिठाते हैं कि अयोग्य लोग को इच्छित चीज पाने के लिये कुछ देना पड़ता है। मंदिर की चहारदीवारी के बाहर हम इसी लेनदेन को भ्रष्टाचार कहते हैं। धनी भारतीय कैश के बजाय स्वर्ण और अन्य आभूषण आदि देता है। वो अपने गिफ्ट गरीब को नहीं देता, भगवान को देता है। वो सोचता है कि किसी जरूरतमंद को देने से धन बरबाद होता है।
वे लिखते हैं ,जून 2009 में द हिंदू ने कर्नाटक के मंत्री जनार्दन रेड्डी द्वारा स्वर्ण और हीरों के 45 करोड़ मूल्य के आभूषण तिरुपति को चढ़ाने की खबर छापी थी। भारत के मंदिर इतना ज्यादा धन प्राप्त कर लेते हैं कि वो ये भी नहीं जानते कि इसका करें क्या। अरबों की सम्पत्ति मंदिरों में व्यर्थ पड़ी है।जब यूरोपियन इंडिया आए तो उन्होंने यहाँ स्कूल बनवाये। जब भारतीय यूरोप और अमेरिका जाते हैं तो वो वहाँ मंदिर बनाते हैं।भारतीयों को लगता है कि अगर भगवान कुछ देने के लिये धन चाहते हैं तो फिर वही काम करने मे कुछ गलत नहीं है। इसीलिये भारतीय इतनी आसानी से भ्रष्ट बन जाते हैं।
उनके लेखन के ये अंश हो सकता है लोगों को अपनी संस्कृति के ख़िलाफ़ लगें किंतु यह सच्चाई है इस बात से इंकार करना बेमानी होगा। यकीनन हमारा देश चढ़ोत्रियों के भरोसे टिका है।लक्ष्मी पूजन भी ऐसा ही अवसर होता है ग़रीबी में जी रहा व्यक्ति भी अपनी आस्था और श्रद्धा के वशीभूत होकर लक्ष्मी मां की दिल से सेवा में लगा रहता है उसे हासिल कुछ नहीं होता। इसीलिए प्रेम जनमेजय यह कहने मज़बूर हैं–” मैं लक्ष्मी-वंदना करता हूँ, हे भ्रष्टाचार प्रेरणी, हे कालाधनवासिनी, हे वैमनस्यउत्पादिनी, हे विश्वबैंकमयी! मुझ पर कृपा कर! “काश यही चढ़ोत्रियां देश को सजाने संवारने के काम आतीं ।
कविवर रहीम ने कहा है-लक्ष्मी थिर ना रहीम कहीं,यह जानत सब कोय।पुरुष पुरातन की वधू, क्यों ना चंचला होय।। आज यह ग़लत साबित हो रहा है।लक्ष्मी जी एक दो घरों में ही थम गई है।यही नहीं हम सबों के पास जो थोड़ी बहुत बचतें धन के रुप में थीं वे निजीकरण और मंहगाई की मार से सीधे अंबानी अडानी के यहां ही वेग से चली जा रहीं हैं ऐसा ज़ुल्म और ज़्यादती ठीक नहीं।यह अमरीका नहीं है। यह भारत है , एकमात्र ऐसा देश है जहां तुम्हारी पूजा होती है लोग तुम्हारी बांट जोहते हैं। कहीं ये सिलसिला थम ना जाए। चंचला हो इस बार गरीबों के लिपे पुते घरों का रुख करो और देशवासियों पर रहम करो।सभी दरवाज़े जब बंद हों तो जनता की आवाज़ उनके मन में रमीं, रमा ना सुनेगी तो कौन सुनेगा? लक्ष्मी मां इस लुटते देश पर कृपा दृष्टि रखो धनिकों के पास जाना- रहना बंद करो ।अपना चंचला नाम याद रखो और भ्रमण जारी करो। तथास्तु।





