शशिकांत गुप्ते
संत कबीर साहब के दोहों में मानव में मानवीयता जागृत करने के लिए उपदेश होते हैं।
संत कबीर साहब ने मानव को धैर्य रखना का उपदेश देते हुए निम्न दोहा कहा है।
धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय,
माली सींचे सौ घड़ा, ॠतु आए फल होय।
जो भी सच्चे संत होते हैं,
वे प्रकृति के साथ घुल मिल जातें हैं।
इसलिए कबीर साहब ने उक्त दोहे में ऋतु आने पर ही फल अंकुरित होंगे ऐसा कहा है।
कबीर साहब के समय हाइब्रिड पद्धति ईजाद नहीं हुई थी।
हाइब्रिड पद्धति से किसी भी ऋतु में कोई भी फल पैदा किया जा सकता है।
हाइब्रिड पद्धति से भलेहि फलों और सब्जियों का आकार बड़ा और रंग आकर्षक हो जाता है,लेकिन ये फल और सब्जियां मनुष्य के स्वास्थ्य के लिए लाभकारी कतई नही हो सकती हैं?
यह हाइब्रिड पद्धति मानसिक रूप से “सत्ता केंद्रित राजनैतिक”
सामाजिक,धार्मिक, शिक्षा और
सांस्कृतिक क्षेत्र में अदृश्य रूप से विकसित हो रही है।
इन सभी क्षेत्रों के बाह्य स्वरूप को दिव्यता,भव्यता प्रदान की जा रही है। इस दिव्यता,भव्यता में पूंजीवाद ,भौतिकवाद और व्यक्तिवाद का प्रदर्शन मात्र होता है। पूंजीवाद,भौतिकवाद और व्यक्तिवाद अप्रत्यक्ष रूप से भ्रष्ट आचरण के ही पोषक होते हैं।
उक्त मानसिकता के माध्यम से किए जा रहे प्रदर्शन,खंडहर पर बेशकीमती रंग रोगन की सजावट ही साबित होते हैं। खंडहर पर कितना भी कीमती मुल्लमा चढ़ाया जाए,एक-न-एक दिन
मुल्लमा परत-दर-परत खिरता ही है,और खंडहर की वास्तविकता प्रकट होती ही है।
नतीजा कबीर साहब के निम्न दोहे में स्पष्ट प्रकट होता है।
बड़ा हुआ तो क्या हुआ जैसे पेड़ खजूर
पंथी को छाया नहीं फल लागे अति दूर
शशिकांत गुप्ते इंदौर





