पवन कुमार ज्योतिषाचार्य
‘भृगुर्वैं वारुणिः। वरुणं पितरमुपससार अधीहि भगवो ब्रह्मेति।
~तैत्तिरीयोपनिषद् (भृगुवाली प्रथम अनुवाक).
जल, रसतन्मात्र से है। पुरुष का रस, शुक्र (वीर्य) है।
इस विषय में उपनिषद प्रमाण है :
एषां वै भूतानां पृथिवी रसः पृथिव्या आपोऽपामोषधयः ओषधीनां पुष्पाणि, पुष्पाणां फलानि फलाना पुरुषः, पुरुषस्य रेतः।
~बृहदारण्यक उपनिषद (६ । ४ । १)
[ भूतों का रस पृथ्वी है। पृथिवी का रस जल है। जल का रस औषधियाँ हैं। औषधियों का रस पुष्प है। पष्प का रस फल है। फल (अन्न) का रस पुरुष है। पुरुष का रस रेत (वीर्य) है। रस = सार।]
शुक्र के दो रूप हैं :
१. रेत ।
२. रज।
रेत पुरुष में होता है।
रज स्त्री में होता है।
रेत में तेज होता है।
रज में ज्योति होती है।
रेत के कारण पुरुष तेजस्वी होता है। रज के कारण स्त्री ज्योतिर्मयी होती है। रेत नाम वीर्य का रज नाम अण्ड का रेत और रज के मिलने से प्रजा की उत्पत्ति होती है। अन्न से भूख मिटती है। इससे पुरुष वीर्यवान होता है।
‘पुरुषो वा अग्नि अग्नी देवा अन्नं जुहुति तस्या आत सम्भवति।
~बृहदारण्यक (६ । २ । १२ )
स्त्री अग्नि है। उपस्थ ही उसकी समिध् है। लोभ धूम हैं। योनि ज्वाला है अन्दर जो किया जाता है (मैथुन व्यापार) अंगार है। आनन्दलेश स्फुलिंग हैं। उस अग्नि में देवगण वीर्य होमते हैं। उस आहुति से पुरुष उत्पन्न होता है।
योषा वा अग्निः।
तस्या उपस्थ एवं समिध्।
लोमानि धूमो, योनिरचिर्यदन्तः करोति ते ऽङ्गारा, अभिनन्दा विस्फुलिंगास्तस्मिन्।
एतस्मिन् अग्नौ देवा रेतो जुह्वति।
तस्या आहुत्यै पुरुषः सम्भवति।
स जीवति। यावज्जीवत्यथ यदा म्रियते.
~बृहदारण्यक (६ । २ । १३ | )
[पुरुष = शरीर ।]
रज (लोहित) तथा रेत (वीर्य) जलस्थानीय हैं.
‘अप्सु लोहितं च रेवश्च निधीयते।’
~बृहदारण्यक (३।२।१३)
शिश्नस्थ वीर्य जल रूप ही होता है।
आपो रेतो भूत्वा शिश्नं प्राविशन्।’
~ऐतरेयोपनिषद् (१।२।४)
शुक्र वीर्य वीर्य है.
सामर्थ्य वा बल.
आत्मना विन्दते वीर्यं, विद्यया विन्दतेऽमृतम्।
~केनोपनिषद् (खड २, मंत्र ४)
अपने स्वयं के प्रयत्न से (यम नियमादि तथा आरोग्यवर्धक औषधियों से) सामर्थ्य की प्राप्ति होती है। सामर्थ्यहीन व्यक्ति को कुछ भी लब्धि नहीं होती.
[नायमात्मा बलहीनेन लभ्यः।
~मुण्डकोपनिषद् (३ । २ । ४]
वीर्यवान् विद्या का अधिकारी होता है। विद्या से अमृत (निरवच्छिन्न आनन्द) की प्राप्ति होती है। बली होने के लिये शुक्र का क्षयन रोकना है। ऊर्ध्वरेता बनना है।
शुक्र लोकश्रुत वीर्य है। वीर्य जलावयवी है। जल सदृश इसकी स्वाभाविक गति नीचे की ओर है। द्रवावस्था में वीर्य स्खलित होकर नीचे गिरता है। जब वीर्य का क्षरण नहीं होता, उसकी मात्रा अधिक होती है तो यह गाढ़ा होकर जमने लगता है।
इस अवस्था में यह स्खलित होता ही नहीं। तप के प्रभाव से जब द्रवरूप वीर्य का वाष्पन होता है तो यह वायु रूप होकर ऊपर उठता है। ऊर्ध्वगामी वीर्य सूक्ष्म वात रूप से ब्रह्माण्ड (कपाल) में छा जाता है।
ऐसा जन्म जन्मान्तर के तप से ही होता है। शुक्र की इस अवस्था को प्राप्त हुआ पुरुष शुक्ल होता है। व्यास पुत्र शुक ऐसे ही थे। शुक संहिता की ख्याति भागवत नाम से वैष्णव समाज में है।
शुक्र का ऊर्ध्व गमन ब्रह्मचर्य है। ऊपर कपाल वा शिर है। शिर मेष राशि है। कपाल अर्थात् मस्तिष्क विचार का उत्स है। इसलिये यह ब्राह्मण है। शरीर के समस्त अंगों में सिर सबसे भारी होता है।
पानी में बहते हुए शव को देखें तो सिर डूबा रहता तथा अन्य अंग ऊपर तैरते हुए दिखायी देते हैं। भारी होने से सिर गुरु वा ब्रह्म है। वातरूप हो कर शुक्र का इसमें प्रवेश करना ब्रह्मचर्य है। ब्रह्मे (कपाले) चरति इति ब्रह्मचर्य। जिसका शुक्र ऊर्ध्व गमन करता है वह ब्रह्मचारी है। ब्रह्म में ब्रह्म का ही चारण होता है। अतएव शुक्र ब्रह्मरूप है।
ऊर्ध्वमूलोऽवाक्शाखा एषोऽश्वत्थः सनातनः।
तदेवशुक्रं तद् ब्रह्म तदेवामृतमुच्यते।
तस्मिल्लोकाः श्रिताः सर्वे तदु नात्येति कश्चन। एतद्वै तत्।’
~कठोपनिषद् (२।३।१)
शुक्र का मूल ऊपर है। ऊपर कपाल है। कपाल में मस्तिष्क है। मस्तिष्क में विचार है। विचार में स्मर (काम) है। काम से शरीर का मंथन होता है। इससे वीर्य उत्पन्न होता है। यह द्रव बनकर नीचे आता है। शुक्र की शाखा नीचे है। नीचे शिश्न है।
शाखा का पोषण मूल से होता है। शिश्न विचार से नियंत्रित होता है। इसलिये शिश्न का मूल शिर में (तक) है। यह नीचे की ओर लटकता रहता है। अतः अवाक्शाखा है। यह तथ्य अश्वत्थ (व्यापक) है तथा सनातन है। जैसा शिर वैसा शिश्न। दोनों आमने-सामने वा एक दूसरे से सप्तम स्थान पर हैं।
मेष राशि सिर है। मेष मंगल की राशि है। मंगल पाप ग्रह है। तुला राशि शिश्न (उपस्थ) है। शिश्न स्त्री-पुरुष दोनों में होता है। स्त्रियों में बाह्यतः दृश्य नहीं होता। तुला शुक्र की राशि है।
मंगल और शुक्र की राशियाँ परस्पर अभिमुख हैं। मंगल से शुक्र दूषित होता है। मेष चर राशि होने से मस्तिष्क में सतत विचार उठते रहते हैं। तुला भी चर राशि है इसलिये उपस्थेन्द्रिय में चंचलता का गुण पाया जाता है। एक तो तिलौकी, दूसरे नीम चढ़ी इस कहावत से मंगल का उत्तेजक प्रभाव मेष के माध्यम से तुला पर पड़ता है।
फलतः शिश्न लोलुपता बढ़ती है। वास्तव में शिश्न तो शाखा है, शिर उसका मूल है। इन्द्रिय लौल्य का हेतु विचार (मस्तिष्क) है। शान्त मस्तिष्क शान्त शिश्न- यही सूत्र है।
वेद उपनिषद् में शुक्र सम्बन्धी जितने विचार थे, उसी की प्रस्तुति सार रूप में यहाँ पर की गई। शुक्र सुख का जनक है। शुक्र का वर्णन करने से मुझे सुख मिला। जो इसे पढ़ेगा, उसे भी सुख मिलेगा। इस सुख को श्री पंडित जी को समर्पित करता हूँ। शुक्र जलदायी यह है।
तत उपरिष्टात् उशना द्विलक्षयोजनत उपलभ्यते।
पुरुतः पश्चात् सहैव वार्कस्य शैध्यमान्यसाम्याभिः
गतिभिः अर्कवच्चरति।
लोकानां नित्यदानुकूल एव प्रायेण वर्षयंश्चारेणानुमीयते स वृष्टिविष्टम्भग्रहोपशमनः।
~श्रीमद्भागवत महापुराण (५। २२ । १२)
[मेरु से दो लाख योजन ऊपर शुक्र दिखायी देता है। यह सूर्य की, शीघ्र मन्द और सम गतियों के अनुसार उन्हीं के समान कभी आगे, कभी पीछे और कभी साथ-साथ रह कर चलता है।
यह वर्षा करने वाला यह है। यह लोकों के प्रायः सदा अनुकूल ही रहता है। इस की गति से ऐसा अनुमान होता है कि यह यह वर्षा रोकने वाले ग्रहों को शान्त कर देता है।
जि + ड = ज।
जुष् + ड =ज ।
जन् + ड = ज ।
जो जयनशील है, जो जुष्टशील है, जो जननशील है उसे जल कहते हैं। जल सब का भेदन करता हुआ अगे बढ़ता है। यह इस की जयनशीलता है। जल को देख कर मन आनन्दित होता है। यह इसकी जुष्टशीलता है। जल से जीवन अस्तित्व में आता है।
यह इसकी जननशीलता है जो जल है, यही वीर्य है, धातु है रेत है, बीज है, सुख है। शुक्र यह इसी का दाता है, स्वामी है, पालक है, पोषक है, कारक है। अब मैं इसके गुण धर्मों का विवेचन करता हूँ।
गुण धर्म :
शुभ ।कामसुख। स्त्री ।ब्राह्मण जाति दीर्घ आकार। विनम्र। जलीय जगह। पक्षकाल। आग्न्येय दिशा। गुप्तमंत्री किशोर वय। श्वेतश्याम वर्ण। संगीत नृत्य। अभिनय कला ।पत्नी जल तत्व। रजोगुण। अम्लरस। दृढ कौशेय वस्त्र अपराह्न बली। द्विपद। ग्राम चर बीर्य ओज धातु बीज सत सार। कफ। गुप्तरोग। वसन्त भृतु। तिर्यग दृष्टि मोती चाँदी हीरा सौन्दर्य प्रसाधन गृह सज्जा। कमलवत् नेत्र। घुंघराले नीले केश। अति कामी मध्यमावस्था। भाग्योदय वर्ष २५ । भोग शय्या मैथुन आलसी। शीर्षोदय। इन्द्राणी देवता। चर स्वभाव। बायीं ओर चिन्ह करता है। वल्ली कोमल लताएँ, अधिक दूधवाली फूल वाली। गुप्त स्थान- शिश्न वृष्ण में पीड़ा करता है। मुख स्वादेन्द्रिय वात कफ रोग। तृषा से मृत्यु । राहु, बुध, शनि मंगल के दोष को हरता है। बुध का बल बढ़ाता है।
एक पाद दृष्टि ३।१०।
द्विपाद दृष्टि -५।९।
त्रिपाद दृष्टि- ४।८।
सम्पूर्ण दृष्टि ७।
मित्र ग्रह-बुध, शनि, राहु।
सम ग्रह- मंगल, बृहस्पति।
शत्रु ग्रह- आदित्य, चन्द्रमा।
बलवत्तम भाव- ४।
कारक भाव -७।
हर्ष स्थान ५।
उच्च राशि एवं परमोच्चांश मीन २७°।
नीच राशि एवं परम नीचांश कन्या २७°।
मूल त्रिकोण राशि एवं अंश तुला १०° तक।
स्वगृह राशि वृष एवं तुला।
अस्त राशि मेष, वृश्चिक।
राशि चक्र परिभ्रमण काल- २२४ दिन।
मध्यम राशि भ्रमण काल २८ दिन।
नक्षत्र चार दिन- १२
नक्षत्र पाद चार दिन- ३
मध्यम दैनिक गति ८९’ ८”
शीघ्र गति ७३’ ४३”
परम शीघ्रगति-७५’ ४३
दीप्तांश-७ कालांश -७
गोचर से निन्द्य-४, ८, १२
गोचर से पूज्य-५,६,७,१०
गोचर से शुद्ध- १,२,३,९,११
राशि के मध्य में फलीभूत होता है। दूसरी राशि में जाने के ९ दिन पूर्व प्रभावशील होता है। अद रात्रि में अति बली होता है।
सुन्दर वस्त्राभूषण एवं शय्या, सुन्दर स्त्री घर वाहन वाटिका, सुस्वादु भोजन, दूध घी पनीर नवनीत तक्र की प्राप्ति शुक्र कराता है। विमल, सुन्दर होने से इसका नाम आच्छ पड़ा है। यह सौन्दर्यदाता ग्रह है। अदूषित बलिष्ठ शुक्र पुरुष को रूपवान्- आजानु बाहु विशाल वक्ष, भव्य ललाट एवं दीर्घ नेत्र देता है।
स्त्री को यह रूपवती बनाता है। दीर्घ, कृष्ण, घन, स्निग्ध कोमल केश, आयताकार प्रफुल्ल नयन, तुंग नासिका, प्रवाल ओष्ठ, चारु कपोल, मधुर कण्ठ, पीन उन्नत सघन वर्तुल श्रीफलवत् दुग्ध कलश (कुच) देता है।
इसी से नारी को दृढ़ लोच्य कृश मुष्टिकायत कटि मिलती है। यही उसे बृहद् पृथुल ऊर्ध्वोद्धत पुष्ट गुरुतर मेरु (श्रोणि) प्रदान करता है। यही उसे रक्ताभ कमलवत् कोमल पाद देकर कमनीय बनाता है।
नारी के सौन्दर्य पर पुरुष शलभ मँडराता है, श्रेय से स्खलित होता है। सुन्दरी सब को श्रेय है। कोई-कोई इससे बच पाता है।
तुलसीदास कहते है :
दीप सिखा सम जुवतितन, मन जसि होहु पतंग |
भजहु राम तजि काम मद, करहु सदा सतसंग॥ –
~रा.च.मा. अरण्य काण्ड।
शुक्र कन्दर्प है, काम है। इसके वशीभूत भी है। यह सबको अपनी ओर खींचता है। यह स्त्री ह है। इसलिये स्त्री प्रिय लगती है। संत तुलसीदास कहते हैं।…
कामिहि नारि पियारि जिमि लोभिहि प्रिय जिमिदाम।
तिमि रघुनाथ निरन्तर प्रिय लागहुँ मोहि ‘राम”II
~रा.चमा उत्तर काण्ड।
गुरु की तरह शुक्र भी सुखदाता ग्रह है। परन्तु, दोनों के सुखों में अन्तर है। गुरु से पारलौकिक एवं आध्यात्मिक सुखों का विचार होता है, जब कि शुक्र से सांसारिक एवं व्यावहारिक सुखों का चिन्तन होता है गुरु सम्पूर्ण आत्मोन्नति का बोधक है, जब कि शुक्र इहलौकिक उन्नति को दिशा देता है। गुरु परमार्थ द्योतक है, शुक्र से व्यक्ति स्वार्थी होता है।
कर्क या वृश्चिक राशि का शुक्र व्यक्ति को अतिकामी बनाता है। उसकी व्यभिचार की ओर स्वाभाविक प्रवृत्ति होती है। वह अनेकों ये यौन संबंध रखता है। सिंह या धनु राशि में शुक्र हो तो वह बलवान् और तेजस्वी हो, नेत्र काले वर्ण गोरा हो।
मंगल शुक्र का योग हो तो व्यक्ति विषय लम्पट होता है, बहुयौनगामी होता है। सप्तमस्थ बहुदूषित शुक्र अप्राकृतिक यौन प्रवृत्ति को प्रेरणा देता है। शुक्र काम है, चन्द्रमा मन है, मंगल दुष्ट है। इन तीनों का योगदूषित काम तृप्ति का द्योतक है।
शनि-शुक्र योग नीच मनोवृत्ति दर्शाता है। शुक्र का बुध वा गुरु से योग बुद्धिमत्ता विद्वता एवं पाण्डित्य का प्रतीक है। शुक्र का सूर्य से योग राजकीय अधिकार दिलाता है। परन्तु इस योग में शुक्र को सूर्य से आगे होना चाहिये।
शुभ चन्द्र से शुक्र का योग सुन्दर एवं मनस्वी बनाता है। चन्द्र के साथ होने पर अथवा वक्री होने पर इसे चेष्टा बल मिलता है।
कश्ययोक्त शुक्रफलम्.:
प्रथम में शुक्र मे :
१. उच्च राशि में, सुन्दर मुख, जानुवाला।
२. उच्च नवांश में सुन्दर हाथ, पैरवाला।
३. शुभ वर्ग में सुघड़ अंगों वाला।
४. नीच राशि में, अल्पकेशी।
५. नीच नवांश में, खल्वाट।
६. पाप वर्ग मे रोगयुक्त।
७. मिराशि में कान्तिमान् सौभाग्ययुक्त। ८. मित्रनवांश में, सुन्दर मुखवाला ।
९. वर्गोत्तम में, सुन्दररूप वाला।
१०. शत्रुराशि में कुबड़ा।
११. शत्रु नवांश में, यशहीन, निन्द्य।
१२. स्वराशि में, नयनाभिराम (बहुत सुन्दर)
द्वितीय में शुक्र :
१. उच्च राशि में, अक्षीण वित्त बहुल।
२. उच्च नवाश में, कुलपरम्परा से धनी।
३. शुभ वर्ग में, भूमिसम्बन्धी धन।
४. नीच राशि में कार्पण्यज धन।
५. नीच नवांश में, द्यूतलब्ध धन।
६. पाप वर्ग में, प्रवास से धन।
७. मित्रराशि में, नृपज धन (राज्य से धन ८. मित्रनवांश में, नृपपुत्रोत्य धन (राजकीय वृत्ति से धन।
९. वर्गोत्तम में, राज कृपा से धन।
१०. शत्रुराशि में, वर (याचना) कर्म से धन।
११. शत्रु नवांश में, दीनताजन्य धन।
१२. स्वराशि में, पुत्रजनित धन।
तृतीय में शुक्र :
१. उच्च राशि में, पतित, कृषिजीवी।
२. उच्च नवांश में, कलह प्रिय।
३. शुभ वर्ग में, वञ्चकः।
४. नीच राशि में नीचकुलोद्भव।
५. नीच नवांश में, नृशंस )।
६. पाप वर्ग में, भण्ड (विदूषक)।
७. मित्रराशि में, हीनाचार।
८. मित्रनवांश में, बलवान्।
९. वर्गोत्तम में, कृतघ्न।
१०. शत्रुराशि में, खिलाड़ी।
११. शत्रु नवांश में, शिल्पकार।
१२. स्वराशि में, स्वजनों से अलग-थलग, मित्र।
चतुर्थ में शुक्र :
१. उच्च राशि में, मित्रजात सुख।
२. उच्च नवांश में, गधा और ऊंट से सुख।
३. शुभ वर्ग में अश्व और गज से सुख।
४. नीच राशि में, परदारा से सुख।
५. नीच नवांश में, विनाशकारी कर्मों से सुख।
६. पाप वर्ग में गुरुपत्नी से सुख।
७. मित्रराशि में गोधन से सुख।
८. मित्रनवांश में, भेड़ बकरी से सुख।
९. वर्गोत्तम में, महिषी (स्त्री) से सुख। १०. शत्रुराशि में, कुसेवा से सुख।
११. शत्रु नवांश में, परदेश से सुख।
१२. स्वराशि में, देवद्विज संग से सुख।
पञ्चम में शुक्र:
१. उच्च राशि में, रूप सौभाग्य युक्त कन्या।
२. उच्च नवांश में, अधिक पुत्रों से युक्त।
३. शुभ वर्ग में, सुन्दर स्वभाव वाली कन्या।
४. नीच राशि में, नष्ट भाग्य कुरूपा कन्या।
५. नीच नवांश में, परासक्त कन्या।
६. पाप वर्ग में, सीमित बुद्धिवाली कन्या।
७. मित्रराशि में पतिव्रता कन्या।
८. मित्रनवांश में, सत्य परायण कन्या।
९. वर्गोत्तम में, ज्योतिर्मयी कन्या।
१०. शत्रुराशि में, पानतत्परा कंन्या।
११. शत्रु नवांश में, कृतघ्ना कन्या विषादयुक्ता।
१२. स्वराशि में, नष्टशत्रु वाली कंन्या।
पठ भाव में शुक्र :
१. उच्च राशि में, शत्रुओं को जीतने वाला।
२. उच्च नवांश में, शत्रुञ्जयी ।
३. शुभ वर्ग में शत्रुओं को अपना बन्धु करने वाला।
४. नीच राशि में, विनम्रों का अहित करने वाला।
५. नीच नवांश में, अधिक केन्या संतति वाला।
६. पाप वर्ग में, गजपति।
७. मित्रराशि में, पापवान्।
८. मित्रनवांश में, नृपबान्धव।
९. वर्गोत्तम में, शुभस्त्री वर्ग से युक्त १०. शत्रुराशि में, नृशंस क्रूर।
११. शत्रु नवांश में, रोगहीन।
१२. स्वराशि में, धनहीन।
सप्तम में शुक्र :
१. उच्च राशि में, बहुमिशन्विता पत्नी। २. उच्च नवांश में देवद्विज भक्ता पत्नी।
३. शुभ वर्ग में, पतिव्रता भार्या।
४. नीच राशि में, अप्रसन्ना जाया।
५. नीच नवांश में, कुनेत्रा कलत्र।
६. पाप वर्ग में निर्घुणा (चमक रहित/दुशीला) जाया।
७. मित्रराशि में, सुभगा वामा।
८. मित्रनवांश में, शुद्धचित्ता भामिनी।
९. वर्गोत्तम में, सबको प्रिय पत्नी।
१०. शत्रुराशि में, सुतरागविवर्जिता संगिनी।
११. शत्रु नवांश में, दुष्टस्वभावा कामिनी।
१२. स्वराशि में, विनम्र अर्द्धांगिनी।
अष्टम में शुक्र :
१. उच्च राशि में, तृष्णा से मृत्यु।
२. उच्च नवांश में, मुख के रोग से मृत्यु।
३. शुभ वर्ग में, दाँतों के रोग से मृत्यु।
४. नीच राशि में, त्रिदोषज रोग से मृत्यु।
५. नीच नवांश में, अतिसार रोग से मृत्यु।
६. पाप वर्ग में, काष्ठाग्नि से मृत्यु।
७. मित्रराशि में, सर्प काटने से मृत्यु।
८. मित्रनवांश में, विष भक्षण से मृत्यु।
९. वर्गोत्तम में, घाव से मृत्यु।
१०. शत्रुराशि में, अप्रिय सामीप्य से मृत्यु।
११. शत्रु नवांश में, सुरत जन्य कोप से मृत्यु।
१२. स्वराशि में, अधिक विषाद से मृत्यु।
नवम में शुक्र :
१. उच्च राशि परदान से धर्म करने वाला।
२. उच्च नवांश में, वस्त्रान्नदान से धर्मकर्ता।
३. शुभ वर्ग में पितृतर्पण से धर्म सम्पादन।
४. नीच राशि में, स्वल्पफलद धर्मानुष्ठान।
५. नीच नवांश में, बुद्धिभ्रम से धर्म में प्रवृत्ति।
६. पाप वर्ग में परवञ्चना को धर्म मानने वाला।
७. मित्रराशि में, अन्य देवोपासना में प्रवृत्ति।
८. मित्रनवांश में, देखा देखी धर्म में प्रवृत्ति।
९. वर्गोत्तम में, सुखी रहते हुए धर्माचरण।
१०. शत्रुराशि में, पर संग से धर्म।
११. शत्रु नवांश में, शत्रु सेवा से धर्म।
१२. स्वराशि में, स्वाभाविक धर्मात्मा।
दशम में शुक्र :
१. उच्च राशि में, जनेष्ट कर्मा।
२. उच्च नवांश में श्रेष्ठ कर्मा।
३. शुभ वर्ग में, महाकर्मा।
४. नीच राशि में, स्त्रीजनाश्रित कर्म करने वाला।
५. नीच नवांश में, दूसरों के सुख हेतु कर्म करने वाला।
६. पाप वर्ग में, कष्टमय कर्म में प्रवृत्ति।
७. मित्रराशि में, अनेक सौम्य कर्म करने वाला।
८. मित्रनवांश में, स्वबान्धवों के हेतु कर्म करने वाला।
९. वर्गोत्तम में, गोधन अश्वान्वित कर्मा।
१०. शत्रुराशि में क्रूर कर्मा।
११. शत्रु नवांश में, चिन्तालु कर्म में प्रवृत्ति।
१२. स्वराशि में, यजुर्वेदी भिषग् कर्मा।
एकादश में शुक्र :
१. उच्च राशि में, सुत और बान्धवों से लाभ।
२. उच्च नवांश में, राजकन्या से लाभ।
३. शुभ वर्ग में, उक्त दोनों से लाभ।
४. नीच राशि में, पापियों से लाभ।
५. नीच नवांश में, तुच्छबुद्धिवालों से लाभ।
६. पाप वर्ग में, निन्दित कार्यों से लाभ।
७. मित्रराशि में, वाहन से लाभ।
८. मित्रनवांश में, स्त्रियों से लाभ।
९. वर्गोत्तम में, प्रियजनों से लाभ।
१०. शत्रुराशि में, नष्टबान्धवों से लाभ।
११. शत्रु नवांश में, शत्रुओं से लाभ।
१२. स्वराशि में, सुखी मनुष्यों से लाभ।
द्वादश में शुक्र :
१. उच्च राशि में, व्रात्य व्यय।
२. उच्च नवांश में, शास्त्र जनित व्यय.
३. शुभ वर्ग में, प्रियजनों से व्यय।
४. नीच राशि में, नृपाश्रय से व्यय।
५. नीच नवांश में, व्यापार यात्रा से व्यय।
६. पाप वर्ग में, अशुभता जन्य व्यय।
७. मित्रराशि में, अधिक खाने पीने से व्यय।
८. मित्रनवांश में, मदिरापान से व्यय।
९. वर्गोत्तम में, भूसम्पत्ति क्रय से व्यय।
१०. शत्रुराशि में, व्याकुलता से व्यय।
११. शत्रु नवांश में, हिंसा एवं उपद्रव पर व्यय।
१२. स्वराशि में, मिथ्या व्यवहार (शान शौकत) से व्यय।
शुक्र कामचेष्टा कारक ग्रह है. विलासिता, सौन्दर्य प्रियता, लम्पटता, ठाटबाट प्रियता विषयमग्नता, कला कुशलता, काव्य कारिता, उच्चाभिलाषिता, ऐन्द्रियता शुक्र जन्य है। रागात्मकता शुक्र का प्रधान गुण है यह रजोगुणी है। रजोगुण से व्यक्तिता है।
कृष्ण कहते है :
‘रजो रागात्मकं विद्धि तृष्णासंगसमुद्भवम्।
तन्निबध्नाति कौन्तेय, कर्म संगेन देहिनम्।’
~गीता (१४।७ )
कुण्डलों में शुक्र की दुस्थिति वा निर्बलता से देह कांति रहित होता है, वेश्या समागम से शोष, भोग में पीडा, शीघ्र पतन, यौन रोग, मूत्र कृच्छ्र होता है। इसकी मारक दशा में स्त्री से भय, योगिनी यक्षिणी एवं मातृकाओं से भय होता है।
असुर भय, मैत्री भंग वायु कफ व्याधि, शोक-मोह इसके नेष्ट फल हैं। वीर्य जनित रोग जो स्त्री संबंध से हो, के द्वारा तीर्थ स्थान में यह मृत्यु देता है. (चेतना विकास मिशन).





