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बहुत कुछ कह रहा है :ममता बनर्जी का गिरता ग्राफ

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सुसंस्कृति परिहार

खबर है कि  सुश्री ममता बनर्जी महोदया की पार्टी तृणमूल कांग्रेस अगामी उप राष्ट्रपति महोदय के चुनाव में अनुपस्थित रहेगी । कारण कि वह विपक्ष की प्रत्याशी श्रीमती मार्गरेट अलवा जी का समर्थन नहीं कर सकती और एनडीए के प्रत्याशी श्री जगदीप धनकड जी का समर्थन करने का मतलब अपने को खुले आम एक्सपोज़ करना है । खबर यह भी है कि धनकड़ जी के नाम की घोषणा होने से तीन दिन पहले ही सुश्री ममता बनर्जी महोदया की एक शिष्टाचार मुलाक़ात आदरणीय धनकड साहब व आसाम के मुख्यमंत्री श्री हेमंत बिस्वा शर्मा से दार्जिलिंग में हुई थी और उसी दिन संभवत उनके द्वारा यह निर्णय लिया गया है।

ममता बनर्जी महोदया की शिकायत यह है कि विपक्ष ने मार्गरेट अलवा जी के नाम की घोषणा करने से पूर्व उनसे सलाह नहीं ली थी जबकि इस मामले में विपक्षी दलों के नेताओं का कहना है कि श्री शरद पवार साहब द्वारा सूचना दिये जाने के बाद भी टीएमसी ने इस बारे में बुलाई गई बैठक में अपना प्रतिनिधि नहीं भेजा था । श्रीमती मार्गरेट अल्वा जी के नाम पर सहमति बनने की सूचना तृणमूल कांग्रेस के नेता श्री डेरेक ओ ब्रायन साहब को उसी दिन दे दी गई थी ।

अब सवाल यह नहीं है कि सुश्री ममता बनर्जी  की पार्टी उप राष्ट्रपति महोदय के चुनाव में किसका समर्थन करती हैं बल्कि सवाल यह है कि क्या कोई राजनीतिक पार्टी संविधान की एक अहम प्रक्रिया व ज़िम्मेदारी से अपने सांसदों को अनुपस्थित रहने का निर्देश कैसे दे सकती हैं । लोकतंत्र में चुनावों का होना व उसमें भाग लेना एक संवैधानिक दायित्व होने के साथ साथ एक कर्तव्य भी होता है जिसे क्या हमारे निर्वाचित जन प्रतिनिधि नहीं जानते? उप राष्ट्रपति महोदय जैसे दूसरे सबसे बड़े व महत्वपूर्ण संवैधानिक पद के चुनावों से अनुपस्थित रहने की घोषणा करने का मतलब यह है कि आपकी पार्टी न तो संविधान की परवाह करती हैं और न ही प्रजातांत्रिक मूल्यों का । 

दरअसल ममता बनर्जी महोदया का स्वभाव अहंकारी व तुनक मिज़ाजी का शुरू से रहा है जिसे हम विगत वर्षों से देखते आ रहे हैं ।यूपीए शासन काल में इनके दल के रेलवे मंत्री रहे श्री दिनेश त्रिवेदी को इन्होंने किस तरह ज़लील किया था वह सभी जानते हैं । अटल बिहारी बाजपेयी जी से लेकर मनमोहन सिंह जी की सरकार को अपने अहम व तुनक मिज़ाजी से यह माननीया कैसे उनकी नाक में दम किये रखती थी वह भी सब जानते हैं । सुश्री ममता बनर्जी महोदया सहयोग लेना तो जानती है पर सहयोग देना शायद इनकी फ़ितरत में नहीं है । गत  बंगाल चुनावों में ज़बरदस्त जीत ने इनके अहंकार व घमंड को और ऊँचाइयों पर पहुँचा दिया है और अब ये देश के प्रधानमंत्री बनने का सपना देख रही हैं तथा यह चाहती है कि देश की तमाम पार्टियाँ उनके पीछे लामबंद होकर उन्हे अपना नेता मानकर उनका यह सपना पूरा करने में लग जाये।

यह हम सब जानते है कि उप राष्ट्रपति महोदय के चुनाव में  विपक्षी दल का प्रत्याशी का होना सिर्फ़ एक सांकेतिक होता है क्योंकि इसमें दोनों सदनों में जिस दल का बहुमत होता है उसी दल का प्रत्याशी विजयी होता है और इस समय दोनों सदनों में एनडीए का बहुमत है तो श्री धनकड का विजयी होना सुनिश्चित है। सुश्री ममता बनर्जी महोदया के दल का इस चुनाव से अनुपस्थित रहने से पक्ष या विपक्ष किसी पर कोई फ़र्क़ नहीं पड़ेगा पर इससे ममता बनर्जी महोदया के बीजेपी विरोधी नेता होने का भ्रम ज़रूर टूटेगा ।

इससे पहले राष्ट्रपति चुनाव में भी ममता का चेहरा उजागर हो चुका है। जिन्होंने राष्ट्रपति पद के लिए यशवंत सिन्हा का नाम प्रस्तावित किया वे बाद में पीछे हट गई और यहां तक कह गई कि यदि भाजपा ने उनसे आग्रह किया होता तो वे द्रौपदी मुर्मु जी का समर्थन करतीं।

इन दोनों प्रसंगों को देखने के बाद वे ममता जो प्रधानमंत्री पद पाने का अभियान चला रहीं थीं उन्हें कौन समर्थन देगा ?यह भी देखा जा रहा है कि फिलवक्त ये अभियान ठंडा गया है। दिल्ली के मुख्यमंत्री केजरीवाल, झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और बिहार के तेजस्वी यादव के वक्तत्वों में अब उस तरह की गरज चमक भाजपा सरकार के खिलाफ दिखाई नहीं देती। बंगाल तो वैसे भी ई डी द्वारा एक मंत्री पार्थ चटर्जी के यहां मिलने वाले अकूत धन से अपनी साख खो चुका है। केजरीवाल के दबंग साथी संजय सिंह पर भी तलवार लटक रही है। तेजस्वी यादव को नीतीश की तुलना में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। सूत्र बताते हैं कि शिबू सोरेन का धनखड़ को समर्थन देना भी इस बात की पुष्टि करते हैं।

यही वजह कि भाजपा अध्यक्ष जे पी नड्डा अपने मुखारबिंद से यह कहने लगे हैं कि आगे चलकर देश में सिर्फ एक पार्टी भाजपा ही बचेगी।विपक्ष को बुरी तरह तोड़कर एक मात्र जुझारु पार्टी कांग्रेस को नेस्तनाबूद करने का भाजपा का यह प्रदान लोकतंत्र के दम घोंटने जैसा है।वे हर हाल में 2024फतह कर देश को हिंदू राष्ट्र बनाने संकल्पित हैं कांग्रेस को छोड़कर लगभग सभी विपक्ष जब ई डी से भयातुर हो तो क्या कहा जाए ? सूत ना कपास जुलाहों में लठ्ठम लठ्ठा जैसी हालत विपक्ष में प्रधानमंत्री पद के लिए देखी गई और सबसे शर्मनाक ममता बनर्जी जैसी बंगाल टाईग्रेस का समर्पण है।

कुल मिलाकर ममता का गिरता ग्राफ और केजरीवाल ,सोरेन तथा तेजस्वी के लचीलेपन से ये लगता है ।  भाजपा बंगाल, झारखंड,बिहार जैसे महत्वपूर्ण राज्यों को अपने चंगुल में फांस लेगी। केजरीवाल और ममता को तो पहले से ही भाजपा की बी टीम के रुप में पहचाना जा चुका है।उनकी नज़र राजस्थान और छत्तीसगढ़ पर भी बनी हुई है। राजस्थान में एक हिंदू दर्जी की गर्दन काटने वाला एक शख्स भाजपा का निकला।दो लोग  राजस्थान पुलिस ने पकड़ भी लिए किंतु अनुषंगी संगठनों ने दंगा करने की जो कोशिश की गई वह असफल रहीं। छत्तीसगढ़ में भी कुछ-कुछ चल रहा है। अब ई डी की बारी है।

अब तो यही लगता है कि विपक्षी दलों की एकता होना सिर्फ़ एक काल्पनिक विषय है। तमाम छोटे व क्षेत्रीय दल तभी विपक्षी एकता का सुर अलापते है जब उनके अस्तित्व पर ख़तरा होता है वरना सब की राहें अलग-अलग है ।ऐसी संगीन स्थिति में बची पार्टियों में सिर्फ कांग्रेस ही ऐसी बचती है जिसका वजूद पूरे देश में अल्प मात्रा में ही सही ,है तो। उसे ही देश के अवाम के साथ यह कठिन जिम्मेदारी लेकर संघर्ष अब सदन में ही नहीं सड़कों पर करना होगा वामदलों और समाजवादी पार्टी साथ हमेशा की तरह मिलने की संभावना है।

Ramswaroop Mantri

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