शशिकांत गुप्ते इंदौर
आज सीतारामजी,व्यंग्य से ज्यादा हास्य की मानसिकता में दिखाई दिए। वैसे भी व्यंग्य के साथ हास्य का पुट होना जरूरी होता है।
मैने सीतारामजी से पूछा आज आप हास्य के मूड में क्यों और कैसे हैं?
सीतारामजी ने कहा आज मैं चुनाव पूर्व चुनावी नतीजों पर सर्वेक्षण की रिपोर्ट पढ़ रहा था,और सर्वेक्षण के समाचार देख भी रहा था।
“अ” नामक सर्वेक्षण एजेंसी का सर्वेक्षण किसी को पूर्ण बहुमत दिलवाता है। “ब” नामक एजेंसी का सर्वेक्षण त्रिशंकु स्थित निर्मित होने की संभावना प्रकट करता है।
“स” नामक एजेंसी का सर्वेक्षण सत्तापक्ष की चिंता को बढ़ा देता है। “स” नामक एजेंसी का सर्वेक्षण तो विपक्ष की सरकार ही बना देता है।
मैने पूछा मतदान के पूर्व इन सर्वेक्षण एजेंसियों के पास मतदाताओं के रुझान को जानने का क्या कोई ठोस आधार होता है?
सीतारामजी ने कहा ये एजेंसियां सर्वेक्षण के लिए लोगों के बीच जाकर कुछ लोगों से उनकी राय जानती है। लोगों की राय जानने को ये एजेंसियां sample एकत्रित करना कहती है।
मैने कहा sample को हिंदी में नमूना कहते हैं। क्या ये एजेंसियां नमूनों को एकत्रित कर पूछती है,या अलग अलग?
सीतारामजी कहा ये एजेंसियां sample एकत्रित कर सैंपल का औसत निकलती है।
मैने कहा मुझ से तो आज तक किसी भी एजेंसी ने कोई राय नहीं ली।
सीतारामजी ने कहा आप नमूने नही हो,आप तो व्यंग्यकार हो।
मैने कहा ये सर्वेक्षण एजेंसियां चुनाव पूर्व जो भी राय प्रकट करें। मुख्य सवाल तो यह है कि, चुनाव बाद सरकार कौन बनाएगा ?
इस तरह के सर्वेक्षण करने में तकरीबन सभी सर्वेक्षण एजेंसियां असफल हो जाएंगी।
कारण चुनाव बाद नतीजे किसी के भी पक्ष आए,,सर्वेक्षण के सारे Calculation (गणित) धरे रह जातें हैं,जब Manipulation मतलब चालाकी से सारा खेल हो जाता है।
Manipulation करते समय सैद्धांतिक राजनीति गायब हो जाती है सीधा खरीद फरोख्त का खेल होता है। ऊपरी लेन देन की भाषा में यह खरीद फरोख्त पेटियों (लाखों) को छोड़ खोकों (करोड़ो) में होता है, ऐसा आरोप है?
इसका सबूत मिलना मुश्किल ही नहीं,नामुमकिन है।
सीतारामजी ने मेरे सामन्यज्ञान में इज़ाफा किया, यह कह कर की पेटी और खोको की भाषा का प्रचलन अंडरवर्ल्ड की दुनिया होता है?
जब उक्त तरीके से सौदे बाजी हो सकती है, तब किसी भी तरह के सर्वेक्षण का कोई औचित्य ही नहीं है?
उक्त मुद्दे पर मुझे शायर हनीफ़ अख़गर मलीहाबादी का यह शेर याद आया।
इज़हार पे भारी है ख़मोशी का तकल्लुम
हर्फ़ों की ज़बाँ और है आँखों की ज़बाँ और
( तकल्लूम= बातचीत)
यह शेर सुनने के बाद सीतारामजी ने भी शायर मजरूह जालंधरी का यह शेर सुनाया।
जो भी चाहो निकाल लो मतलब
खामोशी गुफ्तगू पर भारी है।
तात्पर्य जो Manipulatiin होता है,वह इसी तरह खामोशी के साथ गुफ्तगू कर किया जाता है।





