राजेश शर्मा
क्या उत्तर प्रदेश में वापसी के लिए BJP की बसपा से साठगांठ तख्तापलट के दौरान ही हो गई थी? आगे की कहानी पढ़ने से पहले UP चुनाव और MP में हुए तख्तापलट का ये सियासी गणित भी जान लीजिए…सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी प्रमुख ओमप्रकाश राजभर उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2022 में BJP और BSP के बीच मिलीभगत होने का आरोप लगा चुके हैं। अपने बयान में उन्होंने कहा था- BJP और BSP का मेल हो गया, तो UP में बड़ा खेल हो गया। राजभर के आरोप काफी हद तक सही माने जा सकते हैं, क्योंकि मध्यप्रदेश में 2020 को हुए कमलनाथ सरकार के तख्तापलट में ही BSP की BJP की तरफ झुकाव की शुरुआत हो चुकी थी। कमलनाथ सरकार को BSP का समर्थन था, लेकिन सरकार गिरते ही MP में राज्यसभा चुनाव के दौरान BJP का साथ देने की मौन स्वीकृति मायावती ने दे दी। यह खुलासा खुद BSP के विधायक संजीव कुश्वाहा ने किया है। उन्होंने कहा- हमसे पार्टी सुप्रीमो ने कहा था कि वे किसी भी उम्मीदवार को वोट करने के लिए स्वतंत्र हैं। लिहाजा, BJP उम्मीदवार को वोट दिया था। वैसे भी BJP और BSP की जुगलबंदी (2002 में UP में दोनों ने मिलकर सरकार बनाई थी) पुरानी है।
20 मार्च 2020… मध्यप्रदेश की सियासत का वह दिन, जब 15 साल बाद सत्ता पर काबिज हुई कांग्रेस सरकार 15 महीने बाद ही गिर गई। कमलनाथ इस सरकार का नेतृत्व कर रहे थे। ज्योतिरादित्य सिंधिया और उनके साथ 22 कांग्रेस विधायकों के इस्तीफे के बाद बीएसपी व निर्दलियों की बैसाखी से चल रही सरकार अल्पमत में आ गई। कमलनाथ सरकार के तख्तापलट की क्या-क्या कड़ियां थीं? 2 साल पूरे होने पर हम आपको मध्यप्रदेश के उस सबसे बड़े सियासी ड्रामे की कहानी
2-3 मार्च 2020 की दरमियानी रात, भोपाल से गुरुग्राम तक BJP का ‘ऑपरेशन लोटस’
2-3 मार्च की दरमियानी रात। इस दिन कमलनाथ सरकार गिराने का ट्रेलर रिलीज हुआ। जगह थी गुरुग्राम से सटी मानेसर स्थित आईटीसी ग्रैंड भारत होटल। MP के नंबर प्लेट वाली कई गाड़ियां उस रात यहां एक के बाद एक पहुंचने लगती हैं। सपा विधायक राजेश शुक्ला (बबलू), बसपा के संजीव सिंह कुशवाह, कांग्रेस के ऐंदल सिंह कंसाना, रणवीर जाटव, कमलेश जाटव, रघुराज कंसाना, हरदीप सिंह, बिसाहूलाल सिंह और निर्दलीय सुरेंद्र सिंह शेरा। भाजपा के अरविंद भदौरिया, नरोत्तम मिश्रा और रामपाल सिंह पहले से होटल में मौजूद थे। इधर, बसपा से निष्कासित विधायक राम बाई को लेकर भूपेंद्र सिंह BJP नेता के चार्टर्ड प्लेन से भोपाल से दिल्ली पहुंचते हैं।
इसी बीच जानकारी लीक हो गई कि निर्दलीय और कांग्रेस के कुछ विधायकों का दिल्ली में मूवमेंट हुआ है। एक विधायक का करीबी फोन पर किसी को बता देता है कि हम दिल्ली आए हुए। यह जानकारी कांग्रेस तक भी पहुंच जाती है। इसके बाद तो दिग्विजय सिंह से लेकर कमलनाथ और जीतू पटवारी से लेकर जयवर्धन सिंह तक सुपर एक्टिव हो जाते हैं।
रात करीब 12 बजे मंत्री जीतू पटवारी और जयवर्धन होटल पहुंच जाते हैं। करीब दो घंटे के हाई प्रोफाइल ड्रामे के बाद ये विधायक रामबाई और तीन कांग्रेस विधायक ऐंदल सिंह कंसाना, रणवीर जाटव, कमलेश जाटव को लेकर लौटने में कामयाब हो जाते हैं। रघुराज कंसाना, हरदीप सिंह, बिसाहूलाल सिंह, राजेश शुक्ला, संजीव सिंह कुशवाह और सुरेंद्र सिंह 4 मार्च को दोपहर बाद होटल से निकलते हैं, लेकिन भोपाल नहीं पहुंचते। भाजपाई इन्हें बेंगलुरु लेकर पहुंचे। यहां कर्नाटक में तत्कालीन मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा के बेटे विजयेंद्र को इन विधायकों को संभालने का जिम्मा सौंपा गया। इन्हें बेंगलुरु के प्रेस्टीज पालम मेडोज में रखा गया।
रामबाई का खुलासा– उस रात दिग्विजय सिंह नहीं आए थे होटल
अब तक यही कहा जा रहा था कि होटल में उस रात जयवर्धन सिंह और जीतू पटवारी के साथ दिग्विजय सिंह भी विधायकों को लेने पहुंचे थे, लेकिन दैनिक भास्कर से बातचीत में राम बाई खुलासा करते हुए कहती है- ‘दिग्विजय सिंह उस रात होटल नहीं आए थे। केवल जीतू और जयवर्धन ही थे। उस रात जमकर मारपीट हुई और मेरे बैग की छीना-झपटी भी। मैं इतना गुस्सा गई थी कि गनमैन की राइफल छीनकर कह दिया था कि किसी ने ज्यादा तीन-पांच किया तो फायर कर दूंगी…।’
‘ऑपरेशन लोटस’: विधायक रामबाई के गनमैन की गलती ने फेल किया
सब कुछ भाजपा के प्लान के मुताबिक चल रहा था। विधायक रामबाई के गनमैन की गलती से भाजपा का पूरा ऑपरेशन फेल हो गया। इस विधायक के गनमैन ने भोपाल में दिल्ली रवाना होते समय अपने नजदीकी को फोन किया और इसी फोन से दिल्ली में विधायकों के एकत्रित होने की खबर लीक हो गई। कांग्रेस को ऑपरेशन लोटस फेल करने का अच्छा वक्त मिल गया। कांग्रेस नेताओं ने ‘बचाव’ अभियान शुरू किया और रात करीब 2 बजे दोनों नेता विधायक रामबाई के साथ होटल से बाहर आते हुए दिखे।
इस जगह मीडिया भी पहुंच चुका था, इस तरह उस वक्त तक का BJP का पूरा खेल बिगड़ने लगा। तब दिग्विजय सिंह भी दिल्ली में थे। इस बीच होटल में पुलिस तैनात कर दी गई। दिग्विजय सिंह होटल नहीं गए और ना ही यह पता चल पा रहा था कि होटल के कमरों में और कौन विधायक हैं। उन्होंने चतुराई दिखाते हुए रामबाई की दिल्ली में पढ़ रही बेटी को होटल भेजा और अपडेट लिया। इस दौरान जो विधायक BJP के संपर्क में थे, वे भी इसी होटल में थे। उस रात तक बेंगलुरु कोई नहीं गया था।
भाजपा किसी भी सूरत में ऑपरेशन लोटस फेल होने नहीं देना चाहती थी
बीजेपी हाईकमान ने ऑपरेशन लोटस में शर्त रखी थी कि किसी भी सूरत में यह फेल नहीं होना चाहिए, लेकिन कांग्रेस के सक्रिय होने के बाद यह कमजोर हो गया। 5 मार्च को नरोत्तम समेत दूसरे नेता दिल्ली से भोपाल के लिए रवाना हो गए, लेकिन शिवराज सिंह चौहान को भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा ने दिल्ली बुला लिया। इधर, बेंगलुरु से निर्दलीय विधायक सुरेंद्र सिंह शेरा ने मुख्यमंत्री कमलनाथ से फोन पर बात की और उन्हें भरोसा दिलाया था कि हम सब आपके साथ हैं। इन विधायकों की 4-5 मार्च को बीजेपी के बड़े नेताओं से मीटिंग होनी थी।
6 मार्च को पहला इस्तीफा… विधायक हरदीप सिंह डंग का
मंत्री नहीं बनाए जाने से नाराज विधायक हरदीप सिंह डंग ने 6 मार्च को अचानक इस्तीफा दे दिया। वे भी गायब हुए कांग्रेस विधायकों में शामिल थे, वे न तो सिंधिया समर्थक थे, ना ही कमलनाथ-दिग्विजय गुट के थे। ऐसे में न काम होते थे, न सुनवाई। यही वजह है कि BJP ने उनसे अलग से संपर्क किया और सिंधिया लॉबी के विधायकों की ‘सेफ लैंडिंग’ हाेने तक स्ट्रेटेजी के तहत हरदीप सिंह से सबसे पहले इस्तीफा दिलवाया।
डंग के इस्तीफे के बाद कमलनाथ एक्टिव हुए। कांग्रेस के सभी विधायकों को भोपाल बुलाया गया और सभी को राजधानी नहीं छोड़ने के निर्देश दिए गए। इस बीच कांग्रेस ने देर रात जद्दोजहद करके 6 विधायकों की वापसी करा दी, लेकिन 5 विधायक गायब रहे। इन विधायकों में हरदीप सिंह डंग, रघुराज सिंह कंसाना, बिसाहूलाल सिंह और निर्दलीय विधायक सुरेंद्र सिंह शेरा शामिल थे।
ऑपरेशन लोटस सिंधिया पर कैसे शिफ्ट हुआ
भाजपा को कमलनाथ सरकार गिराने के लिए केवल सात विधायक चाहिए थे। इसके लिए भाजपा ने मध्यप्रदेश ने कुछ अलग-थलग पड़े कांग्रेस और निर्दलीय विधायकों पर डोरे डाले। यह किसी से नहीं छुपा था कि कमलनाथ विधायकों के दबाव में कतई नहीं आते थे। चाहे काम अटके या विधायक बयानबाजी करते रहे। उपेक्षित-असंतुष्ट ये विधायक 2 मार्च की रात गुरुग्राम ले जाए गए थे, लेकिन यहां भांडा फूट गया।
किरकिरी होते देख BJP के केंद्रीय विंग ने मिशन अपने हाथ में लिया और प्लान B पर काम शुरू किया। इसके मुख्य बने किरदार ज्योतिरादित्य सिंधिया। उनकी उनके मित्र और BJP के वरिष्ठ नेता जफर इस्लाम ने हाईकमान से मीटिंग कराई। इसके बाद कमलनाथ सरकार को गिराने का ड्रामा एक बार फिर शुरू हुआ।
कमलनाथ खुद नहीं चाहते थे सरकार बचे, सिंधिया को उनकी कौन सी बात चुभी?
‘ऑपरेशन लोटस’ को शुरुआत में फेल करने के बाद दिग्विजय सिंह, विवेक तन्खा और कमलनाथ ने दिल्ली में सोनिया गांधी से मुलाकात की। 7 मार्च को हाईकमान का फरमान हुआ कि ज्योतिरादित्य सिंधिया को प्रदेशाध्यक्ष बना दिया जाए। कमलनाथ ने हाईकमान को कॉन्फिडेंस में ले रखा था। वह मुख्यमंत्री होते हुए भी पार्टी अध्यक्ष का पद अपने पास रखे रहे। नए नाम की घोषणा नहीं की। इधर, सिंधिया खेमे के लोग ‘महाराज’ को प्रदेशाध्यक्ष बनते हुए देखना चाहते थे। वे चाहते थे कि कांग्रेस में सिंधिया को सम्मानजनक पद देना चाहिए, क्योंकि MP में कांग्रेस की वापसी में उनकी भी मेहनत है। पर, ऐसा नहीं हुआ और सिंधिया समर्थकों ने खुलकर बागी तेवर दिखा दिए।
इससे पहले हरदीप सिंह डंग का इस्तीफा हो ही चुका था। उनके इस्तीफे पर मंत्री महेंद्र सिंह सिसोदिया ने बयान देकर मध्यप्रदेश की सियासत में आए भूचाल को और हवा दे दी। सिसोदिया ने कहा था- अगर कमलनाथ सरकार ने सिंधिया की उपेक्षा की, तो इस सरकार पर संकट आ जाएगा। इस उथल-पुथल के बीच कमलनाथ और दिग्विजय सिंह जितने एक्टिव थे, सिंधिया उतने ही खामोश थे। यह एक ऐसी खामोशी थी, जो मध्यप्रदेश की सियासत में बड़ा तूफान लाने जा रही थी।
बिसाहूलाल मंत्री बनाने पर अड़ गए
नाराज चल रहे विधायक बिसाहूलाल सिंह को मनाने की जिम्मेदारी कांग्रेस ने मंत्री सुरेंद्र सिंह को दी। वह 3 मार्च की रात सीधे बेंगलुरु निकल चुके थे। सुरेंद्र और बिसाहूलाल के बेटे तेजवान सिंह दोस्त हैं, लेकिन बिसाहूलाल ने अपने बेटे से ही बात की। वह बेंगलुरु से इंदौर आए। यहां से बाला बच्चन के साथ 8 मार्च को भोपाल लौटे। उनसे कमलनाथ ने बात की। लेकिन, वह सीधे इस्तीफा देकर BJP में शामिल हो गए। बिसाहूलाल 6वीं बार कांग्रेस से विधायक बने थे। उन्हें कमलनाथ सरकार में मंत्री नहीं बनाया गया था। इससे वह नाराज हो गए। उन्होंने अपने बयान में भी कहा था- कमलनाथ सरकार से उनकी नाराजगी तब तक दूर नहीं होगी, जब तक वे मंत्री नहीं बन जाते।
9 मार्च को सिंधिया खुलकर मुखर हो गए
असल सियासी ड्रामा 9 मार्च से शुरू हुआ। सिंधिया समर्थक करीब 22 विधायकों के अचानक गायब होने से कांग्रेस में हड़कंप मच गया। इन विधायकों में 6 मंत्री गोविंद सिंह राजपूत, प्रद्युम्न सिंह तोमर, इमरती देवी, तुलसी सिलावट, प्रभुराम चौधरी, महेंद्र सिंह सिसोदिया भी शामिल थे। खबर मिली कि ये सभी बेंगलुरु के एक होटल में हैं। इसके अलावा विधायक हरदीप सिंह डंग, जसपाल सिंह जज्जी, राजवर्धन सिंह, ओपीएस भदौरिया, मुन्नालाल गोयल, रघुराज सिंह कंसाना, कमलेश जाटव, बृजेंद्र सिंह यादव, सुरेश धाकड़, गिर्राज दंडोतिया, रक्षा संतराम सिरौनिया, रणवीर जाटव, जसवंत जाटव, मनोज चौधरी, बिसाहूलाल सिंह, एंदल सिंह कंसाना शामिल थे।
9 मार्च की रात शाह से मिलने पहुंचे सिंधिया
नाराज सिंधिया को मनाने के लिए कांग्रेस ने उनके दोस्तों का सहारा लिया। मिलिंद देवड़ा और सचिन पायलट को इसकी जिम्मेदारी दी। लेकिन, सिंधिया किसी से नहीं मिले। सिंधिया की नाराजगी पर BJP पूरी तरह एक्टिव थी। दिल्ली में केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के घर शिवराज सिंह चौहान बैठक कर चुके थे। दिल्ली से ही बेंगलुरु में बैठे अरविंद भदौरिया से भी बात की। 9 मार्च को ही देर रात खबर आई कि ज्योतिरादित्य सिंधिया गृहमंत्री अमित शाह से मुलाकात करने पहुंचे हैं। इस खबर के बाद यह साफ हो गया कि कमलनाथ सरकार खतरे में है।
10 मार्च को कांग्रेस से इस्तीफा दिया, PM मोदी से मिले
अगले दिन 10 मार्च की सुबह सिंधिया अपने दिल्ली स्थित आवास से सीधे एक बार फिर गृहमंत्री अमित शाह से मिलने पहुंचे। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से भी मुलाकात की। इस दौरान उन्होंने मीडिया से कोई बात नहीं की। मोदी और शाह से मुलाकात के कुछ ही देर बात ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया। इस्तीफा कांग्रेस की राष्ट्रीय अध्यक्ष सोनिया गांधी को भेजा। सिंधिया का इस्तीफा होते ही बेंगलुरु में मौजूद 22 विधायकों ने भी एक साथ अपने इस्तीफे दे दिए। कमलनाथ सरकार अल्पमत में आ गई।
अहं की लड़ाई बनी कांग्रेस में घमासान की वजह
सिंधिया और कमलनाथ के बीच सियासी वर्चस्व की लड़ाई को कांग्रेस की सरकार गिरने की बड़ी वजह माना गया। प्रदेश में कांग्रेस की सरकार बनने के बाद से ही दोनों नेताओं के बीच कई मुद्दों पर सहमति नहीं बन रही थी। टीकमगढ़ की एक सभा में ज्योतिरादित्य के एक ऐलान ने इस असहमति को विवाद में बदल दिया था और फिर यही विवाद कमलनाथ सरकार गिरने की प्रमुख वजह माना गया। टीकमगढ़ में अतिथि शिक्षकों ने सिंधिया से उनकी मांगें पूरी नहीं होने पर सवाल किया था। इस पर सिंधिया ने कहा था- अगर अतिथि शिक्षकों की मांगें पूरी नहीं हुईं तो वह उनके साथ सड़कों पर उतरेंगे। यह पहला मौका था जब सिंधिया ने अपनी ही सरकार के खिलाफ कोई बयान दिया था। इस बयान पर सियासी रस्साकशी उस समय और तेज हो गई, जब कमलनाथ ने कह दिया था- उतर जाएं सड़क पर। माना जा रहा है कि कमलनाथ की यही बात सिंधिया को चुभ गई थी।
कमलनाथ खुद नहीं चाहते थे सरकार बचे
पथरिया विधायक रामबाई ने बताया- उस रात होटल में जयवर्धन के हाथ में जो बैग था, उसमें कपड़े थे। रामबाई का कहना है कि बैग में उनके, देवरानी और दिल्ली में रहने वाली बेटी के कपड़े थे। उन्होंने यह भी बताया कि कमलनाथ खुद नहीं चाहते थे कि उनकी सरकार बचे। कमलनाथ ने खुद सोच लिया था कि उन्हें ऐसे लोगों को नहीं झेलना है, न वह ऐसे लोगों को झेल सकते हैं, न ऐसे लोगों के मन की कर सकते हैं।
जल्दबाजी में सरकार गंवा बैठे कमलनाथ… बसपा MLA ने कांग्रेस के दो विधायकों को बताया उतावला
क्या विधायकों के गायब होने की खबर सुनकर कांग्रेसी नेताओं ने बयानबाजी में उतावलापन दिखा दिया? या भाजपा के बुने सियासी चक्रव्यूह में कांग्रेस फंसती गई? क्या दिग्विजय सिंह की अगुआई में सरकार बचाने की कोशिश में विधायक जीतू पटवारी व जयवर्धन सिंह की कोशिश जल्दबाजी साबित हुई और खरीद फरोख्त के आरोपों ने उपेक्षित विधायकों को पार्टी छोड़ने पर मजबूर कर दिया? BSP विधायक संजीव कुशवाहा ने ऐसे कई राज खोले।
कुशवाहा ने बताया कि BJP ने कमलनाथ सरकार को नहीं गिराया, बल्कि कांग्रेस नेताओं की जल्दबाजी के चलते शिवराज को सरकार बनाने का मौका दिया। कांग्रेस नेताओं ने बिना किसी प्रमाण के विधायकों की खरीद-फरोख्त के आरोप लगा दिए। छपास के चक्कर में कांग्रेस नेता जीतू पटवारी और जयवर्धन सिंह ने गुरुग्राम के होटल में बेवजह हंगामा किया था। इस होटल में वे विधायक थे, जिनके समर्थन से ही 15 साल का वनवास काटने के बाद कांग्रेस सत्ता में आई थी।
कुशवाहा ने दावा किया कि जब विधायक दिल्ली में जमा हुए थे, तब और उसके बाद कमलनाथ ने हमसे (बसपा, सपा व निर्दलीय विधायक) संपर्क तक नहीं किया था। कांग्रेस के किसी वरिष्ठ नेता ने हमने बातचीत तक नहीं की थी। वे इतने उतावले थे कि उन्होंने छपने के लिए मीडिया के सामने आरोप लगा दिए। उन्होंने ही BJP को सत्ता में आने का मौका दिया था।
BJP में शामिल होने के चंद घंटों बाद राज्यसभा उम्मीदवार बने सिंधिया
ज्योतिरादित्य सिंधिया ने 11 मार्च 2020 को BJP जॉइन कर ली। 17 साल तक कांग्रेस से राजनीति करने वाले सिंधिया को BJP के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा ने पार्टी की सदस्यता दिलाई। इसके चंद घंटों बाद ही BJP ने सिंधिया को मध्यप्रदेश से राज्यसभा उम्मीदवार घोषित कर दिया। इधर, शिवराज सिंह दिल्ली में BJP के दिग्गजों से आगे के सियासी समीकरणों पर चर्चा कर रहे थे। जबकि सिंधिया समर्थक 22 विधायक बेंगलुरु में जमे थे।
सिंधिया के BJP में शामिल होने के बाद इसी दिन शाम होते-होते भोपाल में CM हाउस में कांग्रेस विधायक दल की बैठक हुई। इसमें सिर्फ 93 विधायक पहुंचे। इससे साफ हो गया कि कमलनाथ सरकार खतरे में है। इसके बाद सरकार गिराने और बचाने की लड़ाई विधानसभा अध्यक्ष बनाम राज्यपाल के बीच पहुंच गई।
कांग्रेस और BJP विधायकों की बाड़ाबंदी
12 मार्च 2020 को कांग्रेस ने अपने सभी विधायकों को बसों से जयपुर रवाना कर दिया। कांग्रेस का दावा था कि उनकी सरकार सुरक्षित है। इसी दौरान भोपाल में BJP के बड़े नेताओं की भी बैठक हुई। बैठक के बाद BJP ने भी अपने सभी विधायकों को हरियाणा के मानेसर होटल में शिफ्ट कर दिया। इधर, 12 मार्च को ही बेंगलुरु पहुंचे जीतू पटवारी को पुलिस ने कांग्रेस विधायकों से मिलने से रोका। इस दौरान खूब सियासी ड्रामा हुआ। पटवारी को पुलिस ने हिरासत में लिया।
12 मार्च को भोपाल पहुंचे सिंधिया
BJP में शामिल होने के बाद सिंधिया पहली बार भोपाल पहुंचे, जहां उनका भाजपा नेताओं व कार्यकर्ताओं ने जोरदार स्वागत किया। सिंधिया इस दौरान भाजपा प्रदेश कार्यालय पहुंचे, जहां शिवराज सिंह चौहान, नरेंद्र सिंह तोमर, नरोत्तम मिश्रा और गोपाल भार्गव सहित BJP के तमाम दिग्गजों ने उनका स्वागत किया। इसके बाद उन्होंने राज्यसभा के लिए नामांकन भी भरा।
सिंधिया समर्थक सभी विधायक हुए बर्खास्त, सियासी जंग राजभवन पहुंची
13 मार्च को कमलनाथ ने अपने मंत्रिमंडल से सिंधिया समर्थक सभी विधायकों को बर्खास्त कर दिया, जबकि मध्यप्रदेश के इस सियासी ड्रामे में अब तक किसी भी विधायक का इस्तीफा उस वक्त के विधानसभा अध्यक्ष डाॅ. एनपी प्रजापति ने स्वीकार नहीं किया था। 14 मार्च को पहली बार डाॅ. प्रजापति ने मंत्री गोविंद सिंह राजपूत, प्रद्युम्न सिंह तोमर, इमरती देवी, तुलसी सिलावट, प्रभुराम चौधरी और महेंद्र सिंह सिसौदिया का इस्तीफा स्वीकार कर लिया। इस्तीफा स्वीकार होने के बाद मध्यप्रदेश के तत्कालीन राज्यपाल लालजी टंडन ने मुख्यमंत्री कमलनाथ को फ्लोर टेस्ट कराने के निर्देश देते हुए विधानसभा में बहुमत साबित करने को कहा, लेकिन कांग्रेस ने इसे मानने से इंकार कर दिया। उनका कहना था कि सदन में क्या होगा यह विधानसभा अध्यक्ष तय करेंगे न कि राज्यपाल।
सुप्रीम कोर्ट पहुंचा मध्यप्रदेश का सियासी ड्रामा
सत्ता बचाने की आखिरी कोशिश भी फेल होने के बाद कमलनाथ इस्तीफा देने से पहले ताबड़तोड़ नियुक्तियां कर चुके थे। आधी रात को मुख्य सचिव तक को बदल दिया था। इधर, राज्यपाल भी फ्लोर टेस्ट का निर्देश दे चुके थे। राजभवन से CM कमलनाथ को जारी किए गए लेटर में लिखा गया- मध्यप्रदेश की हाल की घटनाओं से प्रतीत होता है कि उनकी सरकार ने सदन का विश्वास खो दिया है और ये सरकार अब अल्पमत में है। यह स्थिति अत्यंत गंभीर है। कमलनाथ 16 मार्च को सदन में बहुमत साबित करें।
सिंधिया समर्थक खुलकर बोले- हम साथ नहीं
राज्यपाल की ओर से कमलनाथ को लेटर जारी होते ही सिंधिया समर्थकों ने पहली बार खुलकर कहा कि वे कमलनाथ सरकार के साथ नहीं हैं। यह 15 मार्च 2020 का दिन था। कमलनाथ सरकार बचाने के लिए हर जोड़-तोड़ की कोशिश में लगे रहे। कांग्रेस के विधायक जयपुर से भोपाल लौट आए, लेकिन BJP विधायक हरियाणा के मानेसर में डेरा डाले हुए थे, लेकिन उन्हें फ्लोर टेस्ट होने की स्थिति में भोपाल लाने की पूरी तैयारी शिवराज दिल्ली में कर रहे थे। उन्होंने केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान और नरेंद्र सिंह तोमर के साथ बैठक की।
दिग्विजय सिंह का धरना, गिरफ्तार हुए
दिग्विजय सिंह बागी विधायकों से मिलने बेंगलुरु पहुंचे, लेकिन पुलिस ने उन्हें मिलने से रोक दिया। नाराज दिग्विजय वहीं धरने पर बैठ गए। पुलिस ने उन्हें 1 घंटे हिरासत में रखा। इसके बाद वह भूख हड़ताल पर बैठ गए। विधायकों से मुलाकात के लिए उन्होंने कर्नाटक हाईकोर्ट में याचिका तक लगाई, जिसे खारिज कर दिया गया। इसके बाद देर रात 1 बजे BJP के विधायक भी गुरुग्राम से वापस आ गए।
देर रात तक होती रही बयानबाजी
15 मार्च को देर रात तक गहमागहमी होती रही। राज्यपाल से मिलने के बाद कमलनाथ ने कहा कि फ्लोर टेस्ट का फैसला विधानसभा अध्यक्ष लेंगे। शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि सरकार फ्लोर टेस्ट से भागे नहीं और फ्लोर टेस्ट करवाए। 16 मार्च को राज्यपाल ने विधानसभा में अभिभाषण शुरू किया, लेकिन 15 मिनट बाद ही अध्यक्ष एनपी प्रजापति ने कोविड-19 का हवाला देते हुए 26 मार्च तक सदन स्थगित कर दिया। इसके बाद BJP ने राजभवन में अपने विधायकों की परेड कराई। शाम को राज्यपाल लालजी टंडन ने कमलनाथ को लेटर लिखा। उन्होंने 24 घंटे का समय देते हुए 17 मार्च को फ्लोर टेस्ट कराने को कहा। इधर, शिवराज सिंह चौहान ने सुप्रीम कोर्ट का रुख कर लिया।
भाजपा ने खटखटाया सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा
स्पीकर के इस फैसले के खिलाफ भाजपा ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। सुनवाई के दौरान यहां भाजपा को बड़ी जीत मिली, जब सुप्रीम कोर्ट ने स्पीकर को फ्लोर टेस्ट का आदेश दिया। सुप्रीम कोर्ट ने 20 मार्च को शाम 5 बजे का समय तय किया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर कांग्रेस के 16 बागी विधायक विधानसभा की कार्यवाही में हिस्सा लेना चाहें तो इसके लिए कर्नाटक और मध्यप्रदेश के पुलिस महानिदेशकों को उन्हें सुरक्षा मुहैया करानी चाहिए। कोर्ट ने वोटिंग की प्रक्रिया को लेकर भी दिशा-निर्देश दिए कि हाथ उठाकर वोट डाले जाएंगे और सदन की पूरी कार्यवाही की वीडियो रिकॉर्डिंग कराई जाएगी।
19 मार्च को आखिरी कोशिश भी फेल
19 मार्च को कांग्रेस ने सरकार बचाने की आखिरी कोशिश की, लेकिन यह कोशिश काम नहीं आई। बागियों को मनाने दिग्विजय सिंह बेंगलुरु में डेरा डाले हुए थे। दूसरी तरफ कमलनाथ भोपाल में अपने निवास पर लगातार बैठक करते रहे। इस दौरान उन्हें यह अंदेशा हो गया था कि अब सरकार बचा पाना मुश्किल है। शाम होते-होते उन्होंने कैबिनेट की बैठक बुलाई। इसमें कई फैसले कर दिए। कर्मचारियों का DA बढ़ाए जाने से लेकर मैहर, चाचौड़ा और नागदा को नया जिला बनाने जैसे अहम फैसले कर दिए। इतना ही नहीं, उन्होंने आनन-फानन संवैधानिक पदों पर नई नियुक्तियां तक कर दीं।
कांग्रेस नेता शोभा ओझा को राज्य राज्य महिला आयोग का अध्यक्ष बनाया गया तो अभय तिवारी को मध्यप्रदेश युवा आयोग का अध्यक्ष बनाया गया। जेपी धनोपिया को राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग का अध्यक्ष नियुक्त किया, तो गजेंद्र सिंह राजूखेड़ी को अनुसूचित जाति-जनजाति आयोग का अध्यक्ष नियुक्त कर दिया।
कमलनाथ ने देर शाम मुख्य सचिव एसआर मोहंती की जगह एम गोपाल रेड्डी को मध्यप्रदेश का नया मुख्य सचिव बनाया। उन्होंने 19-20 मार्च की दरमियानी रात करीब 1 बजे ही कार्यभार संभाल लिया। मध्यप्रदेश के मुख्य सचिव रहे सुधि रंजन मोहंती को प्रशासन अकादमी का डीजी नियुक्त किया।
कमलनाथ के फैसलों के खिलाफ शिवराज पहुंचे राजभवन
कमलनाथ द्वारा लिए गए फैसलों के खिलाफ शिवराज सिंह चौहान राजभवन पहुंच गए। उन्होंने कहा कि रातोंरात चीफ सेक्रेटरी बदले जा रहे हैं, जैसे इनके घर की खेती है। ये सभी नियुक्तियां असंवैधानिक हैं। आरोप लगाया है कि सेक्रेटरी के पद पर दागी अफसर की नियुक्ति की गई। बिजली नियामक आयोग अध्यक्ष के पद पर भी ऐसे ही अधिकारी की नियुक्ति की कोशिश की जा रही है। ये तो ऐसे हो रहा है जैसे कोई फौज हारती है, तो जाते-जाते जितना लूट सको लूट लो।
20 मार्च को गिर गई कमलनाथ सरकार
20 मार्च को कमलनाथ सरकार को फ्लोर टेस्ट से गुजरना था, लेकिन उससे पहले ही कमलनाथ ने मुख्यमंत्री आवास पर दोपहर 12 बजे एक प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाई और अपने इस्तीफे की घोषणा कर दी। इस दौरान कमलनाथ ने सरकार की उपलब्धियां बताईं। अपने राजनीतिक जीवन के बारे में बताया और फिर इस्तीफे का ऐलान कर दिया। कमलनाथ ने कहा- पहले दिन से ही सरकार गिराने की कोशिश चल रही थी। मैं वो नहीं करूंगा, जो BJP कर रही है। मैं इस तरह से सरकार नहीं बचाऊंगा। मैं इस्तीफा दे रहा हूं।
उन्होंने राजभवन पहुंचकर राज्यपाल लालजी टंडन को अपना इस्तीफा सौंप दिया। राज्यपाल ने उनका इस्तीफा मंजूर कर उन्हें नए मुख्यमंत्री के कार्यभार संभालने तक कार्यवाहक मुख्यमंत्री बना दिया। इस तरह 15 महीने तक चली कमलनाथ सरकार गिर गई। इसके बाद मध्यप्रदेश में 17 दिन से चल रहा यह सियासी संग्राम थम गया। मध्यप्रदेश की सियासत में 17 दिन तक घटी यह घटनाएं सूबे के सियासी इतिहास में दर्ज हो गईं।
सिंधिया और नरेंद्र सिंह तोमर की बैठक
कमलनाथ के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने के बाद दिल्ली में बीजेपी नेता नरेंद्र सिंह तोमर और ज्योतिरादित्य सिंधिया ने बैठक की। इधर, बीजेपी ने फिर से सत्ता मिलने का जश्न मनाया। कमलनाथ के इस्तीफे के बाद बीजेपी नेता शिवराज सिंह चौहान और गोपाल भार्गव सहित सभी नेताओं ने एक-दूसरे को मिठाई खिला कर खुशी मनाई।
देर शाम शिवराज ने रद्द किया डिनर
कमलनाथ के इस्तीफे के बाद शिवराज सिंह चौहान सीधे BJP दफ्तर पहुंचे और तब तक जश्न शुरू हो चुका था। मीटिंग हुई लड्डू भी बांटे गए, लेकिन शिवराज सिंह चौहान के बंगले पर होने वाला डिनर रद्द हो गया। विधायकों के लिए ये डिनर शाम को साढ़े सात बजे रखा गया था। शिवराज सिंह चौहान ने खुद ट्वीट कर इसकी औपचारिक जानकारी भी दी। हालांकि, शिवराज देर शाम को कमलनाथ से मिलने CM हाउस पहुंचे थे। विधायक दल की बैठक में नेता चुने जाने के बाद 23 मार्च को शिवराज सिंह चौहान ने चौथी बार CM पद की शपथ ली।




