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दाम्पत्य और यौनस्वास्थ्य : लंबे संसर्ग से तृप्तिदायिनी विद्युतऊर्जा का संचार

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डॉ. प्रिया मानवी

   _शिवसूत्र सरीखे ग्रंथों मे उल्लेख है और हमने प्रयोगिक अनुभव से भी पाया है कि लंबे संभोग में स्त्री और पुरुष के बीच एक प्रकाश— वलय निर्मित होता है। यह क्या है कैसे निर्मित होता है? इसका क्या उपयोग है? मनुष्य के प्रथम चार शरीरों की विद्युतीय विभिन्नता के आधार पर अकेले ध्यान में उपरोक्त घटना का क्या रूप होगा? इस सबका निःशुल्क अनुभव चाहिए तो व्हाट्सप्प 9997741245 पर संपर्क करके प्रयोग में उतरिये. यहां मैं विषय-विश्लेषण कर आपका ज्ञानवर्धन कर रही हूँ._
     स्त्री आधी है, पुरुष आधा है; दोनों ऊर्जाएं हैं, दोनों विद्युत हैं; स्त्री निगेटिव पोल है, पुरुष पाजिटिव पोल है। जहां कहीं भी विद्युत की ऋणात्मक और धनात्मक ऊर्जाएं एक वर्तुल बनाती हैं, वहां प्रकाश—पुंज पैदा हो जाता है।
    _प्रकाश—पुंज ऐसा हो सकता है जो दिखाई न पड़े; ऐसा हो सकता है जो कभी दिखाई पड़ जाए; ऐसा हो सकता है जो किसी को दिखाई पड़े, किसी को दिखाई न पड़े। लेकिन वर्तुल निर्मित होता है। पर वर्तुल...... .पुरुष और स्त्री का मिलन इतना क्षणिक है कि वर्तुल निर्मित हो ही नहीं पाता और टूट जाता है।_
     इसलिए संभोग को लंबाने की क्रियाएं हैं, और संभोग को लंबाने की पद्धतियां हैं। अगर आधे घंटे के पार संभोग चला जाए तो वलय, वह विद्युत का वर्तुल, प्रकाश—पुंज, स्त्री और पुरुष को घेरे हुए दिखाई पड़ सकता है।
_उसके चित्र भी लिए गए हैं। और कुछ आदिवासी कौमें अब भी इतने लंबे संभोग में गुजर सकती हैं। और इसलिए उनके वर्तुल बन जाते हैं।_

  *टेंसन बनाम शीघ्रपतन :*

साधारणत: सभ्य समाज में वर्तुल खोजना बहुत मुश्किल है; क्योंकि जितना तनावग्रस्त चित्त होगा, संभोग उतना ही क्षणिक होगा। असल में, जितना टेंस माइंड होगा, उतना जल्दी स्खलन होगा उसका; जितना तनाव से भरा चित्त है, उतना स्‍खलन त्वरित होगा। क्योंकि तनाव से भरा चित्त असल में संभोग नहीं खोज रहा है, रिलीज खोज रहा है।
पश्चिम में सेक्स का जो उपयोग है, वह छींक से ज्यादा नहीं रह गया—स्व तनाव है जो फिक जाता है; एक बोझ है सिर पर जो निकल जाता है। ऊर्जा कम हो जाती है तो आप शिथिल हो जाते हैं। रिलैक्स होना दूसरी बात है, शिथिल होना दूसरी बात है।
रिलैक्स होने का मतलब है, विश्राम का मतलब है? ऊर्जा भीतर है और आप विश्राम में हैं। और शिथिल होने का मतलब है ऊर्जा फिक गई और अब आप निढाल पड़े रह गए हैं; अब ऊर्जा नहीं है तो आप शिथिल हो गए हैं, इसलिए सोच रहे हैं कि विश्राम हो रहा है।
तो पश्चिम में जितना तनाव बढ़ा है, उतना सेक्स जो है वह एक रिलीज, एक तनाव से छुटकारा, एक भीतरी शक्ति के दबाव से मुक्ति, ऐसी हालत हो गई है। इसलिए पश्चिम में ऐसे विचारक हैं जो सेक्स को छींक से ज्यादा मूल्य देने को तैयार नहीं हैं। जैसे नाक में एक खुजलाहट हुई है और छींक दी है तो मन हलका हो गया है, बस इससे ज्यादा मूल्य देने को पश्चिम में लोग राजी नहीं हैं कुछ।
उनका कहना ठीक भी है, क्योंकि वे जो कर रहे हैं, वह इतना ही है, वह इससे ज्यादा मूल्य का है भी नहीं। और पूरब में भी लोग उनसे धीरे— धीरे राजी होते चले जा रहे हैं, क्योंकि पूरब भी तनावग्रस्त होता चला जा रहा है। कहीं किसी दूर किसी पहाड़—पर्वत की कंदरा में कोई व्यक्ति मिल सकता है जो तनावग्रस्त न हो, जिसको सभ्यता ने अभी न छुआ हो और जो वहां जी रहा हो जहां वृक्ष और पौधों और पत्तियों और पहाड़ों की दुनिया है, तो वहां अभी भी संभोग में वह वर्तुल बनता है। और या फिर ध्यान-तंत्र की प्रक्रियाएं हैं जिनसे कोई भी वर्तुल बना सकता है।

लंबे संभोग से दीर्घकालीन तृप्ति :
उस वर्तुल के अनुभव बड़े अदभुत हैं; क्योंकि जब वह वर्तुल बनता है, तभी तुम्हें ठीक अर्थों में यह पता चलता है कि तुम एक हुए। स्त्री और पुरुष एक हुए, इसका अनुभव तुम्हें वर्तुल बनने के पहले पता नहीं चलता। उसके बनते ही मैथुन में रत दो व्यक्ति दो नहीं रह जाते, उस वर्तुल के बनते ही वे एक ही ऊर्जा के, एक ही शक्ति के प्रवाह बन जाते हैं; कोई चीज जाती और आती और घूमती हुई मालूम पड़ने लगती है और दो व्यक्ति मिट जाते हैं।
यह वर्तुल जिस मात्रा में बनेगा, उसी मात्रा में संभोग की आकांक्षा कम और दूरी पर हो जाएगी। यह हो सकता है कि एक दफा वर्तुल बन जाए तो वर्ष भर के लिए भी फिर कोई इच्छा न रह जाए, कोई कामना न रह जाए; क्योंकि एक तृप्ति की घटना घट जाए।
इसे ऐसे ही समझ सकते हो कि एक आदमी खाना खाए और वॉमिट कर दे, खाना खाए और उलटी कर दे, तो कोई तृप्ति तो नहीं होगी! खाना खाने से तृप्ति नहीं होती, खाना पचने से तृप्ति होती है। आमतौर से हम सोचते हैं—खाना खाने से तृप्ति होती है। खाना खाने से कोई तृप्ति नहीं होती, तृप्ति तो पचने से होती है।
संभोग के भी दो रूप हैं एक सिर्फ खाना खाने का और एक पचने का। तो जिसे हम आमतौर से संभोग कह रहे हैं, वह सिर्फ खाना खाना और उलटी कर देने जैसा है, उसमें कहीं कुछ पच नहीं पाता। अगर पच जाए तो उसकी तृप्ति लंबी और गहरी है। और जो पचना है वह इस विद्युत के वर्तुल बनने पर ही होता है।
यह सिर्फ सूचक है उसका कि दोनों की चित्त—वृत्तियां एक— दूसरे में समाहित और लीन हो गईं; दोनों अब दो न रहे, एक हो गए; दोनों अब दो शरीर ही रहे, लेकिन भीतर बहती हुई ऊर्जा एक ही हो गई और छलांग लगाकर एक—दूसरे में प्रवाह करने लगी।
[चेतना विकास मिशन)

Ramswaroop Mantri

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