दिव्यांशी मिश्रा
लगातार एवं सच्चे मन से इस बात की भावना करने से कि यह सारा विश्व भगवती का ही रुप है, मेरा मन और इन्द्रियों के सारे विषय भी जगज्जननी के ही रुप हैं, उपासना की स्थिति वास्तव में ऎसी हो जाती है कि फिर प्रत्येक वस्तु – यहाँ तक कि खान – पान, स्त्री आदि सारी भोग्य वस्तुएं भी उसकी दृष्टि में साक्षात जगदम्बा का रुप बन जाती हैं।
वास्तव में स्त्री आदि – शक्ति का ही तो एक अंश है। इस प्रकार भोग उसकी दृष्टि में भोग नहीं रह जाते। स्त्री मात्र को जगदम्बा का रुप मान लेने पर काम का रुप ही बदल जाता है, और खाने – पीने की सामग्री भी भगवती को अर्पित हो चुकने पर भोग्य विषय नही रह जाती।
शास्त्रों में लिखा है : जो मनुष्य अपनी धर्मपत्नी के साथ सम्भोग करते समय इस प्रकार की भावना नही करता कि वह साक्षात पराशक्ति है, जो उसकी आत्मा के साथ संयोग चाहती है, वह उसके साथ व्यभिचार करता है।
वही सच्चा आमिषभोजी है जो इन्द्रियों को विषयों से हटाकर आत्मा के साथ संयुक्त करता है, दूसरे तो निरे पशुघातक हैं। जो मनुष्य आदिशक्ति और आत्मा के संयोग – सुख का उपभोग करता है वह सच्चा कामुक है, अन्य सभी कामवासना के गुलाम हैं। सच पूछा जाए तो जो मनुष्य इस संसार और शरीर को, जिनसे हम बुरी तरह चिपटे हुए हैं, जगदम्बा को अर्पित कर सकता है, उसकी आध्यात्मिक शक्ति उन लोगों की अपेक्षा बहुत अधिक प्रबल है जो संसार और विषयों से कायर की भाँति दूर भागते हैं, और वे इस संसार की कठिन परीक्षा में अधिक सफलता के साथ उत्तीर्ण हो सकते हैं।
कुलार्णव मंत्र में लिखा है : उस महान ईश्वर ने विज्ञ साधकों के लिए ऐसा विधान किया है कि वे लोग उन्ही वस्तुओं के द्वारा आध्यात्मिक उन्नति का साधन करें जो मनुष्य के पतन का कारण होती हैं।
यह भी कहा है : हे विज्ञ साधकों की अधीश्वरि! विज्ञ साधकों के सम्प्रदाय में भोग ही आत्मा और परमात्मा के पूर्ण संयोग में परिणत हो जाता है, दुष्कर्म सत्कर्म बन जाते हैं और यह संसार मुक्तिधाम हो जाता है।
(चेतना विकास मिशन)






