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अधर्म का नाश हो (खंड-1) – (अध्याय-18)

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संजय कनोजिया की कलम”✍️

प्रोफ० आनंद कुमार अपनी टिपण्णी में आगे कहते हैं..”इसी के साथ वर्ग संगठन, शिक्षा, सिंचाई, लगान माफ़ी और ज़मींदारी उन्मूलन जैसे आर्थिक न्याय के उपायों पर ज़ोर दिया. बाबा साहब की रणनीति में ‘मनुवादी/ब्रह्मणवादी’ के खिलाफ आंदोलन पर ज़ोर था. उनकी रणनीति में ब्रिटिश राज और फिर कांग्रेस राज से सहयोग में कोई परहेज़ नहीं था. वायसराय काउंसिल, संविधान सभा और कांग्रेस सरकार में सक्रिय योगदान किया. तीसरे, बाबा साहब क़ानून और वोट की ताक़त को महता देते थे. सिविल नाफ़रमानी के समर्थक नहीं थे. लोहिया वोट-फावड़ा-जेल के ज़रिए परिवर्तन के पक्षधर थे. चौथे, बाबा साहेब ने बारी बारी से जाति और वर्ग को अपनी राजनीति का आधार बनाया. इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी से लेकर शेडयूलड कास्ट फ़ेडरेशान और अंत में रिपब्लिकन पार्टी की योजना रखी. इसमें महाराष्ट्र के समाजवादियों से सहयोग माँगा. लोहिया से भी एकता का प्रस्ताव था. जबकि लोहिया ने 1934 से गांधीजी के साथ 14 साल और गांधी के बाद 19 साल समाजवाद को भारतीय समाज की ग़रीबी और ग़ैरबराबरी का टिकाऊ समाधान माना. इसके लिए सप्तक्रांति का कार्यक्रम बताया. पाँचवे, बाबा साहेब के विश्लेषण में जाति की केन्द्रीयता थी. ब्रिटिश ग़ुलामी या पुरुष सत्ता से जुड़े दोषों पर कम ध्यान था. लोहिया भारत की प्रतिभा को 1) जाति और 2) योनि के कटघरों में क़ैद मानते थे. जाति तोड़ो और नर-नारी समता दोनों को सप्त क्रांति का हिस्सा मानते थे. इन दोनों के लिए साम्राज्यवाद के विनाश और स्वराज की स्थापना को अनिवार्य मानते थे.
दोनों में उम्र का 30 साल का फ़ासला था. बाबा साहेब और समाजवादियों के बीच 1937 से 1952 के बीच राजनीतिक सहयोग का सम्बंध था. लोहिया समाजवादियों ने बाबा साहेब के 1956 में देहांत के बाद, दलितों के साथ सफ़ाई कर्मचारी संगठन, मेहतर आंदोलन, मंदिर प्रवेश और अन्य संघर्षों में एकजुटता बढ़ायी. इसलिए उत्तराधिकारी होने की दावेदारी पेश की जा सकती है. लेकिन यह अम्बेडकरवादियों का अधिकार है कि वह लोहिया को अपना माने या न मानें. दूसरी तरफ़, यह समाजवादियों की ज़िम्मेदारी है कि जातिविमर्श जारी रखें और बाबा साहब आम्बेडकर को मार्क्स और गांधी की तरह अपना शिक्षक और मार्गदर्शक मानें”…(3) सामाजिक न्याय के सिपाही, वरिष्ठ पत्रकार, चौथी दुनियाँ पत्रिका के मुख्य संपादक, पूर्व सांसद श्री संतोष भारती जी…”बहुत महत्वपूर्ण लेखमाला, बधाई”…(4) धर्मनिरपेक्ष विचारक, वरिष्ठ पत्रकार, अमर उजाला पत्रिका के मुख्य संपादक श्री विनोद अग्निहोत्री जी,..”ऐसे दौर में जब विचार की राजनीति पर बाजार की राजनीति हावी है और वैचारिक असहमति का स्थान व्यक्तिगत विरोध या शत्रुता लेती जा रही है तब भारतीय स्वतंत्रता संग्राम सामाजिक न्याय दलित विमर्श धर्म निरपेक्षता और समाजवादी मूल्यों की अलग अलग धाराओं और चिंतन के प्रवर्तकों के विचारों और उनकी जीवन यात्रा के विभिन्न पहलुओं को कलमबद्ध करके सोशल मीडिया के ज़रिये प्रसारित करके संजय कनौजिया जी ने ऐतिहासिक काम को अंजाम दिया है। ये कोशिश सार्वजनिक विमर्श को एक नया आयाम देगी और विशेषकर युवा पीढ़ी की विचार प्रक्रिया में एक सार्थक हस्तक्षेप साबित होगी।इसके लिए आपको बधाई”..!
दो महत्वपूर्ण बात अम्बेडकरवादियों को गंभीरता से समझ लेनी चाहिए..बाबा साहब के जीवन की सबसे महत्वपूर्ण और कहा जाए तो अंतिम रचना (ग्रन्थ) जो उनके परिनिर्वाण के बाद प्रकाशित होकर 1957 में सार्वजनिक हुआ, और इसको विस्तार देने में बाबा साहब को साढ़े पांच साल लगे..कहा तो यह भी जाता है कि 5 दिसंबर की रात के बाद यानी 6 दिसंबर 1956 की, पहली रात में भी बाबा साहब उस ग्रन्थ की प्रस्तावना लिख रहे थे..उस ग्रन्थ का नाम है “बुद्धा एंड हिज धम्मा”..समझने की बात है, कि बौद्ध धर्म का यह 2000 साल से भी कहीं अधिक पुराना ग्रन्थ “त्रिपिटक” रहा है, तो बाबा साहब को “बुद्धा एंड हिज धम्मा” लिखने की क्या जरुरत पड़ी ?..ज़ाहिर है बाबा साहब जब हिन्दू धर्म का व देवी देवताओं का विरोध करते थे तो “त्रिपिटक” में रखीं गईं किवदंतियों को कैसे बर्दाश्त कर सकते थे..जब उन्होंने त्रिपिटक का अध्यन किया होगा तब तो उन्होंने अपना सर ही पकड़ लिया होगा..उन्होंने पाया कि इतनी मनगढंत और बेबुन्यादि बातो का उल्लेख हो रखा है, जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती थी..बाबा साहब ने चार मुख्य समस्याओं को उठाया..(1) पहली समस्या यह कि सिद्वार्थ के प्रर्वजा लेने में जो बात कही गई, कि उन्होंने एक बूढ़े-रोगी-विवाहित और एक लाश देखी..बाबा साहब कहते हैं कि में नहीं मानता की 29 वर्षीय सिद्वार्थ ने अपने जीवन में ऐसे दृश्य ना देखें हों ऐसा मुमकिन नहीं..(2) 4 आर्य सत्य, बौद्धिज्म में बाद में समाहित की गईं हैं..क्या यह सही में बुद्ध के मूल शिक्षाओं का भाग है, कि जीवन-मरण दुःख है और इस दुःख से आप बाहर नहीं आ सकते, यदि जीवन-मृत्यु दोनों ही दुःख हैं तो गौतम बुद्ध भी क्या कर सकते हैं और बौद्ध धर्म भी क्या कर सकता है, तब तो कोई भी बौद्ध धर्म की ओर नहीं मुड़ेगा..(3) बुद्ध जो आत्मा को नहीं मानते थे, क्या बुद्ध ने सही में पुनर्जन्म और कर्म के सिद्धांत को रखी है ?..क्या ये पुनर्जन्म और कर्म ब्राह्मणो वाला है ?..(4) क्या भिक्कुओं का काम केवल मनुष्य को धम्म तक ही सीमित कर उपदेश देने तक का है, क्या भिक्कु एक सामाजिक कार्येकर्ता नहीं ?..क्या उसका काम समाज का सेवक बनकर सेवा करना नहीं ?..इसी समस्याओं का उत्तर देता है और हल भी निकाला गया है, बाबा साहब रचित ग्रन्थ “बुद्धा एंड हिज धम्मा”में..इस ग्रन्थ को लेकर बाबा साहब का उद्देश्य यह था कि वह चाहते थे कि मेरे बाद मेरा समाज अच्छे मार्ग पर चले..बुद्ध का जीवन और मार्ग का सत्य वर्णन हो सुसंगत हो..जो बुद्धि और विज्ञान पर खरा उतरता है, वही बुद्ध का है और जो विज्ञान को सुसंगत नहीं लगता है वह सब ब्राह्मण का है..बाबा साहब ने बुद्ध का उल्लेख कभी “लार्ड बुद्धा” नहीं किया, बल्कि “द बुद्धा” किया..भले ही हिंदी-मराठी या अन्य भाषाओँ में यह शब्द, तथागत हो जाता है या भगवान बुद्ध हो जाता है.. इसीलिए इस ग्रन्थ की रचना रची गई..!
एक दलित चिंतक व लेखक, डॉ० सुरेंद्र अज्ञात की पुस्तक “बुद्ध धम्म-कुछ प्रश्न कुछ उत्तर”….

धारावाहिक लेख जारी है
(लेखक-राजनीतिक व सामाजिक चिंतक है)

Ramswaroop Mantri

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