अग्नि आलोक
script async src="https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-1446391598414083" crossorigin="anonymous">

*ध्यान द्वारा होने वाले परिवर्तन* 

Share

      डॉ. नेहा

ध्यान अमूमन कोई नहीं करता. बंदरों की उछल- कूद यानि योगासन तो कुछ लोग करते भी हैं. ध्यान से जी चुराते हैं. इसे कल पर टालते हैं. कल कभी नहीं आता, काल आ जाता है.

 प्रतिदिन ध्यान करने वाले इंसान को 45 दिन बाद कुछ यूनिवर्सल अनुभूतियां होने लगती हैं. जब ये अनुभूतियां प्रारंभिक रूप में आती हैं तो शरीर में कुछ बदलाव संबंधी स्पंदन दिखने लगता. कुछ  लोग अज्ञानतावश इन सबसे व्यथित हो जाते हैं. वे समझ नहीं पाते कि उनके आंख , मस्तक ,कान , नाक , गले , त्वचा पर जो हलचलें, हरकतें हो रही हैं वह क्या है ?

    जब ध्यान की शक्तियां प्राप्त होने लगती है, तो यह सभी हरकतें, हलचलें ध्यान के प्रारंभिक अनुभव के रूप मे सामने आती हैं. ऐसे लक्षण सिग्नल देते हैं कि आपके जीवन में कुछ बदलाव होने वाला है. आपकी साधना सही दिशा में जा रही है या नही. अलौकिक शक्ति उसे इंगित करती हैं.

    ध्यान साधना करते-करते उसमें दिव्य एनर्जी, दिव्य शक्ति उठती है. इन्ही ऊर्जाओं की शक्तियों की प्राप्ति के लिए ही तो ध्यान किया जाता है.

 शक्तियां क्या हैं ?

 शक्तियां शारीरिक मानसिक मजबूती के लिए, अपनी भौतिक पारलौकिक मजबूती के लिए परम् आवश्यक हैं. जिस प्रकार जिम जाकर हमारी बॉडी सुडौल बनती है, योग व्यायाम प्राणायाम से शरीर अच्छा होता है, उसी प्रकार से साधना से मनोवांछित फल मिलते हैं, सिद्धि मिलती है, जीवन की समस्याओं का शमन होता है.

  यह परिश्रम- फल एकाएक, अचानक तो मिलेगा नही. हम कोई पौधा लगाते हैं,उसे सींचते- खाद देते हैं, उसकी देखरेख करते हैं, खरपतवार दूर करते हैं, तब धीरे- धीरे पौधे में फूल आना शुरू होता है. फिर उसमे फल लगता है. वो ही फल हमारा परिश्रम- फल होता है. यही नियम ध्यान की खेती में भी लागू होता है.

  जब इंसान निरंतर ध्यान साधना करता है, जब उसके ध्यान में परिपक्वता आती है तब उसके शरीर की त्वचा पर कुछकुछ होता है. उसे एक अलग प्रकार की खुजली- सी होती है. कहीं भी हो सकती है. कुछ क्षण में ठीक भी हो जाती है. त्वचा पर ठंड- गर्म का अनुभव हो सकता है. कभी- कभी कंपकंपी, सिहरन की अनुभूति हो सकती है. यह सब हलचलें पुष्टि करती हैं कि ध्यान आगे बढ़ रहा है, परिणाम उन्नति कर रहा है.

    इन हलचलों के पीछे का क्या कारण है ? यह सब नसों- नाडियों को शुद्ध स्वच्छ करने के लिए होता है. तभी तो नसों-नाडियों में पुष्टता आयेगी. तभी तो आपका ध्यान पुष्ट हो सकेगा. शरीर में बहत्तर हजार नशें- नाड़ियां हैं. जब इनमें ऊर्जा यानि कॉस्मिक एनर्जी प्रवाहित होगी तो इनमें हलचल होना स्वाभाविक ही है.

   कभी मुख पर स्पंदन हो सकता है. चींटियां चलने- रेंगने जैसा अनुभव हो सकता है.

 यह आज्ञा चक्र से मिलने वाली जो नर्व हैं,जो नस-नाड़ियां हैं, वह सब शुद्ध होने का यह सिंबल है, लक्षण है. ध्यान साधना रत इंसान के मुखमंडल पर एक तेज होता है. 

    सबसे पहले मुखमंडल पर अजीब- सी हलचल देखने को मिलती है. महसूस होता है कि जैसे कोई कीड़ा रेंग रहा हो. चहेरे की त्वचा खिंच जाती है. मुख मंडल सुंदर लगने लगता है. किसी- किसी की नाक में खुजली होती है. लगता है नाक में कुछ रेंग रहा हो. किसी को गर्दन पर, तो किसी की पीठ पर भी ऐसा महसूस होता है. किसी-किसी को कान में गुदगुदी या खिंचाव महसूस हो सकता है.

    ऐसा वेगस नर्व के कारण भी होता है. जब ध्यान लगता है तब.  कान से ब्रह्मनाद सुनाई देना है, तो कान को भी शुद्ध होना ही पड़ेगा. किसी किसी की आंख में खुजली हो सकती है क्योंकि आज्ञाचक्र एक्टिव होगा. थर्ड आई दिव्य दृष्टि खुलनी है, इसलिए.  ऐसे ही आज्ञाचक्र और सहत्रकार चक्र पर स्पंदन होना भी स्वाभाविक है.

Ramswaroop Mantri

Recent posts

script async src="https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-1446391598414083" crossorigin="anonymous">

प्रमुख खबरें

चर्चित खबरें