डॉ. विकास मानव
ऊर्जा वास्तव में जड़ है। वह केवल चेतना द्वारा नियंत्रित होती है। निर्जीव नजर आने वाले कुर्सी व पत्थर में भी चेतना है। किसी भी पदार्थ के एक सेंटीमीटर के एक अरबवें हिस्से में परमाणु होता है।
इस परमाणु का दस लाख वां हिस्सा नाभिक है जिसमें प्रोटोन व न्यूटॉन होते हैं। नाभिक के चारों और इलेक्ट्रोन कण 85000 मील प्रति सैकेण्ड की रफ्तार से चक्कर लगाते हैं। इस नाभिक व इलेक्ट्रोन को मुक्त करने पर ऊर्जा निकलती है।
अगर आप एकाग्र होकर किसी की मानसिक तरंगों को पकड़ते हो तो दूर बैठे दो व्यक्ति भी मन ही मन आपस में बात कर सकते हैं। यह आज के वाईफाई सिस्टम जैसा है।
वर्तमान में मोड्यूलेटर माइक्रोवेव तरंगों सहित अन्य तरंगों को सिग्नल के रूप में ग्रहण करता है जबकि मन की मन से बात मानसिक तरंगों से होती है।
अब ब्रह्मण्ड यानी यूनिवर्स नाम का अस्तित्व खत्म हो चुका है। कई सारे ब्रह्मण्ड मिलने से अब इसे यूनिवर्स की जगह मल्टीवर्स कहा जाने लगा है। हमारे चारों और 9 खरब आकाशगंगा हैं।
पृथ्वी की आकाशगंगा के एक छोर से तीन लाख किलोमीटर प्रति सैकेण्ड की रफ्तार से यात्रा करें तो एक लाख वर्ष में हम एक आकाशगंगा के दूसरे छोर पर पहुंच पाएंगे।
ऐसी स्थिति में मन से मन को मानसिक तरंगों के द्बारा वाइ फाइ के सृजन पर काम करना निहायत ही जरूरी है ।
एक आकाशगंगा यानी ब्रह्माण्ड की 14 भुजाएं हैं। एक भुजा में हमारे जैसे 200 से 300 सौरमण्डल हैं।सूर्य के चारों और 3570 करोड़ किलोमीटर की परिधि है जिसमें आने वाले वस्तु को वह अपनी ओर खींचता है। करीब 3.8 अरब वर्ष पर पृथ्वी पर प्रकाश संश्लेषण के जरिए जीवन की शुरुआत हुई।
इन सब तत्थों के आलोक में ध्यान साधना के आधार पर ही वसुधैव कुटुम्बकम को मानसिक वाइफाइ से जोड़ कर धरती पर शांति स्थापित किया जा सकता है।





