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ध्यान-तंत्र शिवत्व है वैदिक, धार्मिक, साम्प्रदायिक नहीं 

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      . विकास मानव 

सावित्रीभिर्वचां शशिमणिशिलाभङ्गुरुचिभिः

वशिन्याद्यभिस्त्वां सह जननि संचिंतयति यः।

स कर्ता काव्यानां भवति महतां भङ्गिरिचभिः

वाचोभिर्वग्देवीवदनकमलामोदमधुरायः ॥ 

     तंत्र शिव से शिवत्व प्राप्ति का मार्ग है। पारे से पारा होने का विज्ञान तंत्र है। शिव पारा है। मनुष्य के शरीर का जैसे-जैसे शोधन और संस्कार होता जाता है मनुष्य पारे में बदलने लगता है। 

    लल्लीश्वरी जिन्होंने मंत्र के माध्यम से स्वयं को पूर्णतया शिव में बदल दिया था और ये शिव का स्वरूप पारे के कण था। पारा स्वयं ही केंद्र है। पारा यदि शिव है तो केंद्र ही है।

     पारा यदि मनुष्य शरीर में जाएगा तो सीधा ही अपने केंद्र की ओर जाएगा। ये केंद्र आत्म शरीर है। ध्यान रहे हम तांत्रोक्त रस विद्या के पारे की बात कर रहे हैं। पारे के इसी गुण का कई संप्रदाय उपयोग करते हैं। सिर्फ शरीर में केंद्र को बदल देते हैं। जैसे भक्ति मार्गी हृदय को केंद्र बना देते हैं। ज्ञान मार्गी मस्तिष्क को केंद्र बना देते हैं। तंत्र मार्गी काम केंद्र को केंद्र बना देते हैं। नाथ संप्रदाय के लोग एंडोक्राइन ग्लांड्स को केंद्र बना देते हैं और वहां परिवर्तन करके अपने उदेश्य की प्राप्ति कर लेते हैं। केंद्र बदलने से पारे की दिशा बदली जा सकती है। पर स्वभावतः केंद्र की ओर गति करेगा।

      तपस्या, मंत्र साधन, योग आदि से पूर्व जन्म कृत दोषों का निवारण कर्म बहुत मुश्किल होता है। तंत्र साधक साधिका पारे के माध्यम से इस कार्य को आसानी से कर लेते हैं। जब कभी मार्ग अवरुद्ध हो जाता है या मार्ग में कोई रुकावट न आए तो भी इस प्रकार के पारे का उपयोग किया जाता है। योगतंत्र के संन्यासी वहां तक पहुंचे जहां कर्म संचित होते है। बल्कि उन्होंने अपने पारे को वहां तक पहुंचाया जहां कर्मों की हार्ड ड्राइव थी। पारा वहां तक पहुँच तो जाता है लेकिन करता कुछ नहीं है। जो लोग कहते हैं पारा योगवाही है वो समझ लें पारा कुछ भी नहीं करता है।

      जो लोग कहते हैं पारा विष है वो भी इसे ठीक से समझ ले पारा कुछ भी नहीं करता है। जब तक पारा किसी से योग न कर ले। पारा विष से योग करेगा तो विष, पारा अमृत से योग करेगा तो अमृत।

      तब खोज शुरू हुई कर्म दोषों का नाश कैसे किया जाए। इस कार्य में स्वर्ण सक्षम है। लेकिन स्वर्ण स्वयं वहाँ तक पहुँच नहीं सकता है। दूसरा स्वर्ण कर्मों का नाश तो कर रहा है लेकिन आयु को बहुत नहीं बढ़ा सकता है। तो दूसरा कारक अभ्रक लिया गया। पारा, अभ्रक और स्वर्ण तीनों की आत्माएं लेकर एक किया गया। पारा आत्मा ही है, अभ्रक सत्व भी आत्मा ही है और स्वर्ण बीज भी आत्मा ही है।             

       आत्मा-आत्मा से एकाकार कर सकती है। इसे एक चौथी आत्मा तक भेजा गया। चौथी आत्मा का मतलब है साधक साधिका, जिसे सेवन कराया गया उसकी आत्मा तक। जघन्य श्रेणी के पाप कर्म उन्हें भोगना ही होता है। लेकिन ये कार्य एक ही जन्म में हो जाए तो ही सही है। ये कार्य मनुष्य के स्वस्थ रहते हो जाए तो ही ठीक है। तो तब तक इस धरती पर रहा जाएगा जब तक समूल कर्म नाश नहीं हो जाता है। ये योगतंत्र संन्यासियों के ग्रंथों का पारे को लेकर निचोड़ है। अजर अमर तब तक रहा जाएगा जब तक सभी कर्मों का इसी जन्म में समाधान नहीं हो जाता है।

      जब आप मन के जगत से आत्मा के जगत और फिर ब्रह्म की दिशा में चलते हैं तो कई बार कई कर्म आपके चारों ओर बेहद विषम स्थिति बना देते हैं। अब न आगे जा सकते हैं और पीछे लौटने के रास्ते खुद बंद करते आए हैं। 

अब क्या करें ? 

    चारों ओर घोर अंधेरा। इस हालत में कहीं से कोई मदद नहीं मिलती है। क्योंकि ये आपका ही निर्मित किया अंधेरा होता है।कभी आपने किसी के लिए किया होगा। अब आपके मार्ग को चारों ओर से रोक लिया है। कभी किसी जन्म में आपने किसी के सारे रास्ते बंद किये था अब ये ही पलटकर आपके ही रास्ते पर आ गया है। ये ही स्थिति आपको नरक में खींचकर ले जाती है या फिर वापस जगत में खींच लाती है। 

अब क्या करें?

तो योगतंत्र के संन्यासी हमेशा होश पूर्ण मार्ग अपनाते हैं। योगतंत्र के संन्यासियों ने कहा हम समाधान पहले निकालेंगे तब ही ब्रह्म यात्रा को शुरू करेंगे। उन्होंने साफ शब्दों में कहा है मरने के बाद की मुक्ति पर हमें भरोसा नहीं। इसलिए योगतंत्र संन्यासियों के लिखे ग्रंथों में आयुर्वेद भी है और कीमिया भी है। लेकिन ये जगत के काम की नहीं है। किसी धोखे में न पड़ें| न तो ये किसी तरह का स्वर्ण निर्माण है और न ही किसी को स्वस्थ करने का विज्ञान है। योगतंत्र संन्यासी का आयुर्वेद शरीर, मस्तिष्क, हृदय और आत्मा के स्तरों पर चिकित्सा करता है और संन्यासी की कीमिया शरीर की कीमिया है।

    तो योगतंत्र मार्ग के लोगों के लिए इस पारे का वर्णन कहा है।वर्णन इसी पारे का सभी के पास है लेकिन ये पारा किसी के पास नहीं होता है।

    एक पारा रोग निवारण का होता है। दूसरा पारा मार्ग दिखाने वाला। तीसरा पारा कर्म दोषों के नाश करने वाला और पारा ब्रह्म भी है। पारे के अनेक रूप हैं।पारे पर विजय नहीं प्राप्त की जा सकती है। बस पारे को अनुकूल बनाया जा सकता है। लेकिन इसके लिए गहरी श्रद्धा चाहिए होती है। पारे के विज्ञान तो है लेकिन ये जगत निर्माण का और जगत को शून्य करने का है। पारे से सब कुछ बनाना संभव है।

     ये सब बातें इसलिए कहीं क्योंकि आपके पास जितने भी ग्रंथ उपलब्ध हैं उनकी जड़े योगतंत्र के संन्यासी से जुड़ी हैं। कुछ तो सीधे ही संन्यासियों के लिखे हैं। इन्हें समझने के लिए किसी वास्तविक, दक्ष संन्यासी की ही मदद लें। अन्यथा हजार साल का समय कम नहीं होता है।उसके बाद भी आपको बात समझ नहीं आ रही है। ये ग्रंथ योगतंत्र के संन्यासियों ने संन्यास मार्गियों के लिए लिखे हैं। जो अभी मार्ग में हैं, संघर्ष कर रहे हैं। ये ग्रंथ रस वैदक या आयुर्वेद के लिए नहीं कहे गए हैं। पढ़कर आप लोगों को धोखा इसलिए होता है क्योंकि एक तो लिखने में गलत भाषा का प्रयोग किया है। दूसरा आपका सोना बनाने के लालच।

     ज्यादातर ये सब कुछ कीमिया वालों का ही किया धरा है। इसमें आपके जवाब होते नहीं हैं बस आप लगे हैं अपने जवाब खोजने में। ये अलग बात है कीमिया वालों को भी इसमें कुछ मिला नहीं है। अगर कुछ मिला होता तो ये ग्रंथ तुम्हें नहीं मिलते|

         शिव से शिवा में उतरकर तंत्र संसार में आया. इस विद्या का नाम विज्ञान भैरव तंत्र है.

विज्ञान भैरव तंत्र का जगत बौद्धिक नहीं है। वह दार्शनिक भी नहीं है। तंत्र शब्‍द का अर्थ है – विधि, उपाय, मार्ग। इसलिए यह एक वैज्ञानिक ग्रंथ है। विज्ञान ‘’क्‍यों‘’ की नहीं, ‘’कैसे’’ की फिक्र करता है। दर्शन और विज्ञान में यही बुनियादी भेद है। 

   दर्शन पूछता है – यह अस्‍तित्‍व क्‍यों है? विज्ञान पूछता है – यह आस्‍तित्‍व कैसे है? जब तुम कैसे का प्रश्‍न पूछते हो, तब उपाय, विधि, महत्‍वपूर्ण हो जाती है। तब सिद्धांत व्‍यर्थ हो जाती है। अनुभव केंद्र बन जाता है।

     विज्ञान का मतलब है – ‘चेतना है’। भैरव एक विशेष शब्‍द है, तांत्रिक शब्‍द, जो पारगामी के लिए कहा जाता है। इसीलिए शिव को भैरव कहते हैं और देवी को भैरवी. वे जो समस्‍त द्वैत के पार चले जाते हैं।

पार्वती पूछती हैं :

आपका सत्‍य रूप क्‍या है? यह आपका आश्‍चर्य-भरा जगत क्‍या है? इसका बीज क्‍या है? विश्‍व चक्र की धूरी क्‍या है? 

  वे कहती हैं :

यह चक्र चलता ही जाता है—महा परिवर्तन, सतत प्रवाह। इसका मध्य बिंदु क्‍या है? इसकी धूरी कहां है? अचल केंद्र कहां है? रूपों पर छाए लेकिन रूप के परे यह जीवन क्‍या है? देश और काल, नाम और प्रत्‍यय के परे जाकर हम इसमे कैसे पूर्णत: प्रवेश करे? मेरे संशय निर्मूल करें.

लेकिन संशय निर्मूल कैसे होंगे? किसके ऊपर से? क्‍या कोई उत्‍तर है जो कि मन के संशय दूर कर दे? मन ही तो संशय है। जब तक मन नहीं मिटता है, संशय निर्मूल कैसे होंगे?

     शिव उत्‍तर देंगे। उनके उत्‍तर में सिर्फ विधियां हैं—सबसे पुरानी, सबसे प्रचीन विधियां। लेकिन तुम उन्‍हें अत्‍याधुनिक भी कह सकते हो। क्‍योंकि उनमें कुछ जोड़ा नहीं जा सकता। वे पूर्ण है, एक सौ बारह विधियां। 

   उनमें सभी संभावनाओं का समावेश है; मन को शुद्ध करने के, मन के अतिक्रमण के सभी उपाय उनमें समाएँ है। शिव की एक सौ बारह विधियों में एक और विधि नहीं जोड़ी जा सकती। कुछ जोड़ने की गुंजाइश ही नहीं है। यह सर्वांगीण है, संपूर्ण है, अंतिम है। 

   यह सब से प्राचीन है और साथ ही सबसे आधुनिक, सबसे नवीन। पुराने पर्वतों की भांति ये तंत्र पुराने हैं, शाश्‍वत जैसे लगते हैं।  साथ ही सुबह के सूरज के सामने खड़े ओस-कण की भांति ये नए हैं। ये इतने ताजे हैं।

    ध्‍यान की इन एक सौ बारह विधियों से मन के रूपांतरण का पूरा विज्ञान निर्मित हुआ है। 

   बुद्धि को मात्र एक यंत्र की तरह काम में लाओ, मालिक की तरह नहीं। समझने के लिए यंत्र की तरह उसका उपयोग करो लेकिन उसके जरिए नए व्‍यवधान मत पैदा करो। 

   तो जिस समय मेरी किसी ध्यान विधि का प्रयोग करना, तुम अपने पुराने ज्ञान को पुरानी जानकारियों को एक किनारे धर देना। उन्‍हें अलग ही कर देना। वे रास्‍ते की धूल भर है।

     इन विधि का साक्षात्‍कार निश्‍चित ही सावचेत मन से करो; लेकिन तर्क को हटा कर करो। इस भ्रम में मत रहो कि विवाद करने वाला मन सावचेत मन है। वह नहीं है। क्‍योंकि जिस क्षण तुम विवाद में उतरते हो, उसी क्षण सजगता खो जाती है। सावचेत नहीं रहते हो। तुम तब यहां हो ही नहीं।

   ध्यान विधियां किसी धर्म की नहीं है। वे ठीक वैसे ही हिंदू नहीं है जैसे सापेक्षवाद का सिद्धांत आइंस्‍टीन के द्वारा प्रतिपादित होने के कारण यहूदी नहीं हो जाता है। रेडियों, टेलीविजन ईसाई नहीं है। ये विधियां हिंदुओं की इजाद अवश्‍य है, लेकिन वे स्‍वयं हिंदू नहीं है। इस लिए इन विधियों में किसी धार्मिक अनुष्‍ठान का उल्‍लेख नहीं रहेगा। 

    किसी मंदिर की जरूरत नहीं है। तुम स्‍वयं मंदिर हो। तुम ही प्रयोगशाला हो, तुम्‍हारे भीतर ही पूरा प्रयोग होने वाला है। विश्‍वास की भी जरूरत नहीं है।

तंत्र धर्म नहीं है, विज्ञान है। किसी विश्‍वास की जरूरत नहीं है। कुरान या वेद में, बुद्ध या महावीर में आस्‍था रखने की आवश्‍यकता नहीं है। न ही किसी विश्‍वास की आवश्‍यकता है।

   प्रयोग करने का महा साहस पर्याप्‍त है, प्रयोग करने की हिम्‍मत काफी है। एक मुसलमान प्रयोग कर सकता है। वह कुरान के गहरे अर्थों को उपलब्‍ध हो जाएगा। एक हिंदू अभ्‍यास कर सकता है। वह पहली दफा जानेगा कि वेद क्‍या है? वैसे ही एक जैन इस साधना में उतर सकता है, बौद्ध इस साधना में उतर सकता है, एक ईसाई इस साधना में उतर सकता है.

  वे जहां है, तंत्र उन्‍हें आप्‍तकाम करेगा। उनके अपने चुने हुए रास्‍ते जो भी हो, तंत्र सहयोगी होगा।

    यही कारण है कि जनसाधारण के लिए तंत्र नहीं समझा गया। सदा यह होता है कि जब तुम किसी चीज को नहीं समझते हो तो उसे गलत जरूर समझते हो। क्‍योंकि तब तुम्‍हें लगता है कि समझते जरूर हो। तुम रिक्‍त स्‍थान में बने रहने को राज़ी नहीं हो।

दूसरी बात कि जब तुम किसी चीज को नहीं समझते हो, तुम उसे गाली देने लगते हो। यह इसलिए कि यह तुम्‍हें अपमानजनक लगता है। तुम सोचते हो, मैं और नहीं समझूं, यह असंभव है। इस चीज के साथ ही कुछ भूल होगी। तब तुम गाली देने लगते हो। तब तुम ऊलजलूल बकने लगते हो। कहते हो कि अब ठीक है। इसीलिए तंत्र को नहीं समझा गया। और तंत्र को गलत समझा गया। 

तीसरी बात :  चूंकि तंत्र द्वैत के पार जाता है, इसलिए उसका दृष्‍टिकोण अति नैतिक है। कृपया कर इन शब्‍दों को समझो: नैतिक, अनैतिक, अति नैतिक।.

    नैतिक क्‍या है हम समझते है; अनैतिक क्‍या है हम समझते है; लेकिन जब कोई चीज अति नैतिक हो जाती है, दोनों के पार चली जाती है, तब उसे समझना कठिन है।

     तंत्र अति नैतिक है। तंत्र कहता है – कोई नैतिकता जरूरी नहीं है। कोई खास नैतिकता जरूरी नहीं है। सच तो यह है कि तुम अनैतिक हो, क्‍योंकि तुम्‍हारा चित्त अशांत है। इसलिए तंत्र शर्त नहीं लगाता है कि पहले तुम नैतिक बनो तब तंत्र की साधना कर सकते हो। तंत्र के लिए यह बात ही बेतुकी है। 

    कोई बीमार है, बुखार में है, डाक्‍टर आकर कहता है: पहले अपना बुखार कम करो, पहले पूरा स्‍वस्‍थ हो लो और तब मैं दवा दूँगा।

    यही तो हो रहा है, चोर साधु के पास जाता है और कहता है, मैं चौर हूं, मुझे ध्‍यान करना सिखाएं। साधु कहता है, पहले चोरी छोड़ो, चोर रहते ध्‍यान कैसे कर सकते हो। एक शराबी आकर कहता है, मैं शराब पीता हूं, मुझे ध्‍यान बताएं। और साधु कहता है, पहली शर्त है कि शराब छोड़ो तब ध्‍यान कर सकोगे।

     तंत्र तुम्‍हारी तथा कथित नैतिकता की, तुम्‍हारे समाजिक रस्‍म-रिवाज आदि की चिंता नहीं करता है। इसका यह अर्थ नहीं है कि तंत्र तुम्‍हें अनैतिक होने को कहता है। नहीं, तंत्र जब तुम्‍हारी नैतिकता की ही इतनी परवाह नहीं करता। तो वह तुम्‍हें अनैतिक होने को नहीं कह सकता। तंत्र तो वैज्ञानिक विधि बताता है कि कैसे चित्त को बदला जाए। 

     एक बार चित्त दूसरा हुआ कि तुम्‍हारा चरित्र दूसरा हो जाएगा। एक बार तुम्‍हारे ढांचे का आधार बदला कि पूरी इमारत दूसरी हो जाएगी।

     इसी अति नैतिक सुझाव के कारण तंत्र तुम्‍हारे तथाकथित साधु-महात्‍माओं  को बर्दाश्‍त नहीं हुआ। वे सब उसके विरोध में खड़े हो गए। क्‍योंकि अगर तंत्र सफल होता है तो धर्म के नाम पर चलने वाली सारी नासमझी समाप्‍त हो जाएगी।

तंत्र कहता है कि उस अवस्‍था का नाम भैरव है जब मन नहीं रहता—अ-मन की अवस्‍था है। तब पहली दफा तुम यथार्थत: उसको देखते हो – जो है। जब तक मन है, तुम अपना ही संसार रचे जाते हो, तुम उसे आरोपित, प्रक्षेपित किए जाते हो, इसलिए पहले तो मन को बदलों और तब मन को अ-मन में बदलो।

  ध्यान विधियां सभी लोगों के काम आ सकती है। हो सकता है, कोई विशेष उपाय तुमको ठीक न पड़े, इसलिए तो शिव अनेक उपाय बताए चले जाते है। कोई एक विधि चुन लो जो तुमको जंच जाए। 

    यह जानना कठिन नहीं है कि कौन सी विधि तुम्‍हें जँचती है। हम यहां प्रत्‍येक विधि को समझने की कोशिश करेंगे। तुम अपने लिए वह विधि चुन लो जो कि तुम्‍हें और तुम्‍हारे मन को रूपांतरित कर दे। यह समझ, यह बौद्धिक समझ बुनियादी तौर से जरूरी है।

   सच तो यह है कि जब तुम अपनी सही विधि का प्रयोग करते हो तब झट से उसका तार तुम्‍हारे किसी तार से लगाकर बज उठता है।

   एक विधि लो उसके साथ तीन दिन खेलो। अगर तुम्‍हें उसके साथ निकटता की अनुभूति हो, अगर उसके साथ तुम थोड़ा स्‍वस्‍थ महसूस करो, अगर तुम्‍हें लगे कि यह तुम्‍हारे लिए है तो फिर उसके प्रति गंभीर हो जाओ। तब दूसरी विधियों को भूल जाओ, उनसे खेलना बंद करो, और अपनी विधि के साथ टीको, कम से कम तीन महीने टिको।

     चमत्‍कार संभव है, बस इतना होना चाहिए कि वह विधि सचमुच तुम्‍हारे लिए हो। यदि तुम्‍हारे लिए नहीं है तो कुछ नहीं होगा। तब उसके साथ जन्‍मों-जन्‍मों तक  प्रयोग करके भी कुछ नहीं होगा।

   ध्यान विधियां तो समस्‍त मानव-जाति के लिए है।  उन सभी युगों के लिए है जो गुजर गए है और आने वाले है।  किसी भी युग में एक भी आदमी नहीं हुआ और न होने वाला ही है, जो कह सके कि ध्यान विधियां मेरे लिए व्‍यर्थ हैं : असंभव , यह असंभव है।

      प्रत्‍येक ढंग के चित के लिए यहां गुंजाइश है। तंत्र में प्रत्‍येक किस्‍म के चित्त के लिए विधि है। कई विधियां है जिनके उपयुक्‍त आदमी अभी उपलब्‍ध नहीं है, वे भविष्‍य के लिए है। और ऐसी विधियां भी है जिनके उपयुक्‍त मनुष्‍य रहे ही नहीं। वे अतीत के लिए है। बस डर मत जाना, अनेक विधियां है जो तुम्‍हारे लिए ही हैं।

Ramswaroop Mantri

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