प्रिया सिंह
_हम हिजड़े शब्द को गाली से सम्बोधित करते थे ,लेकिन आज इनके सम्बन्ध में फिल्में बन रही है. लक्ष्मी फ़िल्म आई थी ,पीछे अक्षय कुमार की। उन्होंने खुद ये रोल प्ले किया था._
आज बहुत सारे ऐसे समूह है जो लेस्बियन है. homosexual है. पहले ये सब गालियों के रूप में ही बोले जाते थे। आज का मनुष्य ये सब स्वीकार करने लायक हो गया है।
आज के मनुष्य की चेतना का स्तर उठा है. उसने अपने सम्पूर्ण अस्तित्व को स्वीकारा है। आज वेश्यालयों की भी सम्मानित स्वीकृति है।
_न्यूड क्लब भी बढ़ रहे हैं। आज लोगो मे हिम्मत आ रही है ,वो साहस कर रहे हैं।उनकी चेतना का स्तर बढ़ रहा है।उन्होंने अपने प्राकृतिक स्वरूप को स्वीकार किया है, क्योंकि वस्त्रों से नग्नता केवल छिपाई जाती है।खत्म नही होती।_
यह बात अलग है कि कुछ लोगो को भ्रांति हो जाती है कि नग्नता समाप्त हो गई। भीतर गहरे में सबको अहसास रहता है कि वस्त्रों से नग्नता छिपाने का केवल धोखा भर होता है।
पहले हम नग्नता को भी गाली की तरह प्रयोग करते थे कि तू नँगा है।
जो चीज अस्तित्व में है ,अगर हम उसको स्वीकार कर लेते हैं तो हमारी मानसिक रुग्णता उसी समय खत्म हो जाती है।
_इसी तरह आज के मनुष्य ने सेक्स को भी स्वीकारा है : poly morious जैसे शब्द आज सम्मान से लिए जाते है।आज का मनुष्य स्वीकार करता है और खुलकर कह सकता है कि मैं पोलीमोरी हूँ। अर्थात एक से अधिक लोगो के साथ प्रेम में हूँ।_
जो शब्द पहले एक गाली की तरह होते थे, वही सारे शब्दों को आज के मनुष्य ने स्वीकार कर लिया है।क्योंकि ये सब हमारे अस्तित्व में ही है।
जब तक स्वीकार नही करेंगे ,तब तक मनुष्य को दोहरा पाखण्ड करना होगा।और इस दोहरे पाखण्ड में ही उसकी सारी ऊर्जा समाप्त हो जाएगी। वो जीवन मे कुछ भी क्रेटिविटी नही ला सकेगा।
_इसी तरह क्रोध ,काम ,ईर्ष्या वासना इन सब चीजो की स्वीकृति ही इनकी मुक्ति है। जिस पल हम अपनी सभी बीमारियो को स्वीकार कर लेते हैं उसी समय मुक्ति का द्वार भी खुल जाता है।_
जैसे अस्तित्व में दिन और रात है उसी तरह हमारा अस्तित्व भी सुख दुख, भय- प्रेम,सब चीजो का मिश्रण ही है।
_जो भी समाज सारे अस्तित्व को स्वीकार कर लेता है ,वो सभ्यता विकसित होती जाती है।जैसे अमेरिका ,स्विट्ज़रलैंड या बड़े देश हैं।जहां सिंगल मदर होना स्वीकार है।_
कुछ सभ्यता ऐसी भी हैं जहां सिंगल मदर होने को गाली माना जाता है। जिस भी सभ्यता को यूँ बीमार रहना है ,रुग्ण रहना है ,वो सभ्यता पिछड़ जाती है। जो हर पहलू को स्वीकार कर लेती है वो सभ्यता नए आयाम छू लेती है जीवन के!
आज लोग vegan भी हो रहे है। आप सभी लोगो के पास नेट है तो अपनी ऊर्जा और समय को ,सही दिशा में लगाए। ऐसे लोगो से जुड़े ,जो समाज मे रहकर भी एलग तरीके से जीवन जी रहे हैं।
_परिवर्तन ही संसार का नियम है : इस वाक्य को मंत्र बना ले। रुका पानी सड़ जाता है और आसपास बदबू और बीमारी फैलाता है ,जबकि पानी बहता रहे तो स्वास्थ्य पैदा करता है ,सुगन्ध लाता है।_
इस तरह हमारी सोच रुक जाए तो मानसिक रुग्णता लाती है और अगर आगे बढ़ती ही रहे तो सारा जीवन महकता है ,नाचता है ।संगीतमय होता है।
[चेतना विकास मिशन]





