डॉ. प्रिया
क्या दिव्य-चक्षु सिद्धावस्था के पूर्व भी उपलब्ध हो सकता है? चमत्कार क्या हैं?
दिव्य-चक्षु सिद्धावस्था के पूर्व उपलब्ध नहीं हो सकता। क्योंकि दिव्य-चक्षु का उपलब्ध होना और सिद्धावस्था एक ही बात के दो नाम हैं। लेकिन टेलीपैथी, दूर—दृष्टि उपलब्ध हो सकती है। उससे कोई सिद्धावस्था का संबंध नहीं है। और वह तो ऐसे व्यक्ति को भी उपलब्ध हो सकती है, जिसकी कोई साधना भी न हो।
टेलीपैथी तो हमारे मन की ही क्षमता है। हमारे मन के पास संभावना है कि वह दूर की चीजों को भी देख ले, आंख के बिना। हमारे मन के पास संभावना है कि दूर की वाणी को सुन ले, कान के बिना। और बहुत बार तो हममें से अनेक लोग देख लेते हैं, सुन लेते हैं। लेकिन हमें खयाल नहीं कि हम क्या कर रहे हैं।
बहुत बार हमें पीछे पता चलता है, तो आज के युग की वजह से हम सोच लेते हैं, संयोग की बात है।
अगर बेटा मर रहा हो, तो दूर मां को भी प्रतीत होने लगता है। कोई सिद्धावस्था की बात नहीं है, सिर्फ एक प्रगाढ़ लगाव है। तो कितना ही फासला हो, अगर बेटा मर रहा हो, तो मां को कुछ परेशानी शुरू हो जाती है। वह समझ पाए या न समझ पाए। अगर बहुत निकट मित्र कठिनाइ में पड़ा हो, तो मित्र को भीतर बचवा शुरू हो जाती है, फासला कितना भी हो।
कोई धक्के आंतरिक तरंगों के लगने शुरू हो जाते हैं, कोई संवाद किसी द्वार से मिलना शुरू हो जाता है, जिसके हम ठीक—ठीक उपयोग को नहीं जानते हैं।
लेकिन कुछ लोग इसका ठीक उपयोग करना सीख लें, तो जरा भी अड़चन नहीं है। आप छोटे—मोटे प्रयोग खुद भी कर सकते हैं, तब आपको खयाल आएगा कि टेलीपैथी, दूर—दृष्टि, दूर— श्रवण, साधना से संबंधित नहीं है, अध्यात्म से इनका कोई लेना—देना नहीं है।
आप छोटे—मोटे प्रयोग कर सकते हैं। छोटे बच्चे के साथ करें, तो बहुत आसानी होगी। छोटे बच्चे को बिठा लें एक कमरे के कोने में, कमरे में अंधेरा कर दें, दरवाजे बंद कर दें। आप दूसरे कोने में बैठ जाएं और उस बच्चे से कहें कि तू मेरी तरफ ध्यान रख अंधेरे में और सुनने की कोशिश कर कि मैं क्या कह रहा हूं।
अपने कोने में बैठकर आप एक ही शब्द मन में दोहराते रहें— बाहर नहीं, मन में— कमल, कमल, कमल, या राम, राम, राम। एक ही शब्द दोहराते रहें। आप दो—तीन दिन में पाएंगे कि आपके बच्चे ने पकड़ना शुरू कर दिया। वह कह देगा कि राम।
क्या हुआ? फिर इससे जब आपका भरोसा बढ़ जाए कि बच्चा पकड़ सकता है, तो फिर मैं भी पकड़ सकता हूं। तब उलटा प्रयोग शुरू कर दें।
बच्चे को कहें कि वह एक शब्द को दोहराता रहे— कोई भी—बिना आपको बताए। और आप सिर्फ शांत होकर बच्चे की तरफ ध्यान रखें। बच्चे ने अगर तीन दिन में पकड़ा है, तो नौ दिन में आप भी पकड़ लेंगे। नौ दिन इसलिए लग जाएंगे कि आप विकृत हो गए हैं; बच्चा अभी विकृत नहीं हुआ है। अभी उसके यंत्र ताजे हैं, वह जल्दी पकड़ लेगा।
अगर एक शब्द पकड़ लिया, तो फिर डरिए मत, फिर पूरे वाक्य का अभ्यास भी आप कर सकते हैं। और अगर एक वाक्य पकड़ लिया है, तो कितनी ही बातें पकड़ी जा सकती हैं। और बीच में एक कमरे की दूरी ही सवाल नहीं है। जब बच्चा एक शब्द पकड़ ले कमरे में, तो उसको छह मंजिल ऊपर भेज दीजिए; वहां भी पकड़ेगा।
फिर दूसरे गांव में भेज दीजिए, वहां भी पकड़ेगा। ठीक समय नियत कर लीजिए, कि ठीक रात नौ बजे बैठ जाए आंख बंद करके, वहां भी पकड़ेगा। आप भी पकड़ सकते हैं। इसका कोई आध्यात्मिक साधना से संबंध नहीं है।
लेकिन बहुत—से साधु—संन्यासी इसको करके सिद्ध हुए प्रतीत होते हैं। इससे सिद्धावस्था का कोई भी लेना—देना नहीं है। यह मन की साधारण क्षमता है, जो हमने उपयोग नहीं की है और निरुपयोगी पड़ी हुई है। इसका उपयोग हो सकता है। और जितने चमत्कार आप देखते हैं चारों तरफ, साधुओं के आस—पास, उनमें से किसी का भी कोई संबंध आध्यात्मिक उपलब्धि से नहीं है।
वे सब मन की ही सूक्ष्म शक्तियां हैं, जिनका थोड़ा अभ्यास किया जाए, तो वे प्रकट होने लगती हैं।
अक्सर तो ऐसा होता है कि जो व्यक्ति इस तरह की शक्तियों में उत्सुक होता है, वह धार्मिक होता ही नहीं है, क्योंकि इस तरह की उत्सुकता ही अधार्मिक व्यक्ति का लक्षण है।
अक्सर अध्यात्म की साधना में ऐसी शक्तियां अपने आप प्रकट होनी शुरू होती हैं, तो अध्यात्म का पथिक उनको रोकता है, उनका प्रयोग नहीं करता है। क्योंकि उनके प्रयोग का मतलब है, भीतर की ऊर्जा का अनेक—अनेक शाखाओं में बंट जाना।
हम शक्ति का प्रयोग ही करते हैं दूसरे को प्रभावित करने के लिए। और दूसरे को प्रभावित करने का रस ही संसार है।
कोई आदमी धन से प्रभावित कर रहा है कि मेरे पास एक करोड़ रुपए हैं। कोई आदमी एक आकाश छूने वाला मकान खड़ा करके लोगों को प्रभावित कर रहा है कि देखो, मेरे पास इतना आलीशान मकान है। कोई आदमी किसी और तरह से प्रभावित कर रहा है कि देखो, मैं प्रधानमंत्री हो गया, कि मैं राष्ट्रपति हो गया। कोई आदमी बुद्धि से प्रभावित कर रहा है कि देखो, मैं महापंडित हूं।
कोई आदमी हाथ में ताबीज निकालकर प्रभावित कर रहा है कि देखो, मैं चमत्कारी हूं? मैं सिद्धपुरुष हूं। कोई राख बांट रहा है। लेकिन सबकी चेष्टा दूसरे को प्रभावित करने की है। यह अहंकार की खोज है।
अध्यात्म का साधक दूसरे को प्रभावित करने में उत्सुक नहीं है।
अध्यात्म का साधक अपनी खोज में उत्सुक है। दूसरे इससे प्रभावित हो जाएं, यह उनकी बात; इससे कुछ लेना—देना नहीं है, इससे कोई प्रयोजन नहीं है। यह लक्ष्य नहीं है।
दिव्य—नेत्र अलग बात है। इसलिए ध्यान रखना, दूर— दृष्टि और दिव्य—दृष्टि का फर्क ठीक से समझ लेना। दूर—दृष्टि तो है संजय के पास, दिव्य—दृष्टि उपलब्ध हुई है अर्जुन को।
दिव्य—दृष्टि का अर्थ है, जब हमारे पास अपनी कोई दृष्टि ही न रह जाए। यह थोड़ा उलटा मालूम पड़ेगा।
अध्यात्म के सारे शब्द बड़े उलटे अर्थ रखते हैं। उसका कारण है कि जिस संसार में हम रहते हैं और जिन शब्दों का उपयोग करते हैं, इनका यही अर्थ अध्यात्म के जगत में नहीं होने वाला है। वहां चीजें उलटी हो जाती हैं।
करीब—करीब ऐसा, जैसा आप झील के किनारे खड़े हैं और आपका प्रतिबिंब झील में बन रहा है।
अगर झील में रहने वाली मछलियां आपके प्रतिबिंब को देखें, तो आपका सिर नीचे दिखाई पड़ेगा और पैर ऊपर। वह आपका प्रतिबिंब है। प्रतिबिंब उलटा होता है। अगर मछली ऊपर झांककर देखे, पानी पर छलांग लेकर देखे, तो बहुत हैरान हो जाएगी; आप उलटे मालूम पड़ेंगे ऊपर! मछली को लगेगा कि आप शीर्षासन कर रहे हैं, क्योंकि सिर ऊपर, पैर नीचे! और उसने सदा आपको नीचे देखा था, सिर नीचे, पैर ऊपर।
आप उलटे दिखाई पड़ेंगे। प्रतिबिंब उलटा हो जाता है। संसार प्रतिबिंब है। इसलिए संसार में शब्दों का जो अर्थ होता है, ठीक उलटा अर्थ अध्यात्म में हो जाता है। यही खयाल दृष्टि के बाबत भी रखें। दृष्टि का अर्थ है, देखने की क्षमता।
दृष्टि का अर्थ है, दूसरे को देखने की योग्यता। लेकिन अध्यात्म में तो दूसरा कोई बचता नहीं है। इसलिए दूसरे का तो कोई सवाल नहीं है। और दृष्टि का अर्थ सदा दूसरे से बंधा है, आब्जेक्ट से, विषय से। तो दृष्टि का वहां क्या अर्थ होगा?
महावीर ने कहा है कि जब सब दृष्टि खो जाती है, तब दर्शन उपलब्ध होता है। जब सब देखना—वेखना बंद हो जाता है, जब कोई दिखाई पड़ने वाला भी नहीं रह जाता, जब सिर्फ देखने वाला ही बचता है, तब दर्शन उपलब्ध होता है। जब देखने वाला, द्रष्टा ही बचता है, तब, तब दिव्य—दृष्टि उपलब्ध होती है।
यहां दिव्य—दृष्टि कहना बड़ा उलटा मालूम पड़ेगा। क्यों कहें दृष्टि? जब दृष्टियां खो जाती हैं सब, जब सब बिंदु, देखने के ढंग खो जाते हैं, जब सब माध्यम देखने के खो जाते हैं और शुद्ध चैतन्य रह जाता है, तब दृष्टि क्यों कहें? लेकिन फिर हम न समझ पाएंगे। हमारा ही शब्द उपयोग करना पड़ेगा, तो ही इशारा कारगर हो सकता है।
दूर—दृष्टि तो दृष्टि है। दिव्य—दृष्टि, समस्त दृष्टियों से मुक्त होकर द्रष्टा मात्र का रह जाना है। तब जो अनुभव होता है, वह अनुभव ऐसा नहीं होता कि मैं बाहर से किसी को देख रहा हूं। तब अनुभव होता है कि जैसे मेरे भीतर कुछ हो रहा है। सारा जगत जैसे मेरे भीतर समा गया हो। सब कुछ मेरे भीतर हो रहा हो।
स्वामी राम को जब पहली दफा समाधि का अनुभव हुआ, तो वे नाचने लगे। रोने भी लगे, हंसने भी लगे, नाचने भी लगे। जो पास थे इकट्ठे, उन्होंने कहा कि आपको क्या हो रहा है? आप उन्मत्त तो नहीं हो गए हैं? स्वामी राम ने कहा कि समझो कि उन्मत्त ही हो गया हूं। क्योंकि आज मैंने देखा कि मेरे भीतर ही सूरज उगते हैं, और मेरे भीतर ही चांद—तारे चलते हैं। और आज मैंने देखा कि मैं आकाश की तरह हो गया हूं; सब कुछ मेरे भीतर है। और आज मैंने देखा कि वह मैं ही हूं जिसने सबसे पहले सृष्टि को जन्म दिया था। वह मैं ही हूं जो अंत में सारी सृष्टि को अपने में लीन कर लेगा। मैं उन्मत्त हो गया हूं।
यह बात पागल की ही है। हमें भी लगेगा कि पागल की है। लेकिन लगना इसलिए स्वाभाविक है कि हमें ऐसा कोई भी अनुभव नहीं है, जहां दूसरा विलीन हो जाता है और केवल देखने वाला ही रह जाता है। यह जो अर्जुन को घटित हो रहा है, वह दिव्य—दृष्टि है। जो संजय के पास है, वह दूर—दृष्टि है।