शंभू राय
आधुनिकता की चकाचौंध से भरी,
भागदौड़ भरी इस जिंदगी में…!
प्रतिस्पर्दा कर रहे हैं सभी,
सामंजस्य स्थापित करने के लिए,
साथ इसके…!
तेज गति से गतिशील है जिंदगी,
समय नहीं ठहरता यहाँ,
किसी के लिए…!
दे नहीं पा रहे हैं हम वक्त,
अपने प्रियजनों को..!
साथ बिताने के लिए कुछ खुशनुमा पलों को..!
हो रहे हैं उत्पन्न आपसी भ्रम भी,
इसी कारण कोमल रिश्तों में,
बर्बाद हो रही हैं जिंदगी हमारी।
कोई कारण नहीं हैं एक बताने को..!
डोर होते जा रहे हैं कमजोर रिश्तों की,
अहसास भी समाप्त होते जा रहे हैं..!
अंदर से हमारे….!
दिल के करीब रहने वाले, .
रिश्ते दूर हो गए और दूर के रिश्ते, .
अपने से लगने लगे अब हमें!
कल तक नहीं जानते थे हम जिसे,
वो ही खास हो गए अब…!
सिर्फ प्रगति करना ही लक्ष्य नहीं,
इस जीवन का..!
सुकून भी तो चाहिए हमें…!
संघर्षशील जीवन के गमों को भूलाने के लिए,
रूह रहती है उदास हमारी..!
बेचैनी भी बढ़ने लगती है,
इस संसार के अकेलेपन से,
चाहे हो जीवन में सारे ऐशो-आराम।
फिर भी भटक रहा हैं मनुष्य इधर-उधर,
खुद की तलाश में…!
होकर हताश रिश्तों के उलझनों से,
दूर करता जा रहा है खुद को,
इस दुनिया से…!
लेकिन रिश्ते होते हैं अनमोल,
खरीद नहीं सकता कोई मोल देकर।
गाँठ होती हैं जिस रिश्ते की मजबूत,
साथ निभाते हैं वे ही अकसर।
छोड़कर जिद अपनी जरा…!
महत्व देना होगा ही हमें…,
कोमल रिश्तों को…!
अड़कर जिद पर अपनी कभी यहाँ,
बचाएं नहीं जा सकते…!
मधुरता रिश्तों की।
शंभू राय
सिलीगुड़ी, पं० बंगाल





