पिछली बार अपुन ने बुद्ध के उपदेश के हवाले से बात की थी। बात लोगों को पसंद आई। क्योंकि वह धर्म के बहानें से थी। यदि वही बात अपुन दूसरे तरीके से करता तो डरे लोग पसंद तो करते पर अपुन को ज्यादा डराते। अपुन का संपादक दो बार सोचता। लाभ-हानि का जांचता फिर रचना छपता ही नहीं। अपुन का दिमाग छठे-चौमासे काम करता है। अपुन चिंतन भी तभी करता है। इस बार चिंतन के दौरान अपुन को लगा की देश में कितने देश है! अमीर देश, गरीब देश। शहरी देश, ग्रामीण देश। एक देश उनका जो फटेहाल, नौकरी की जुगाड़, दाल-रोटी, सर पर छत की चिंता में लगा रहता है। जो एकजुट नहीं हो सकता। जिनकी बात कोई नहीं करता, सुनता। दूसरा भरें पेट, पैसें, पढ़ाई वाला देश जो सोशल मीडिया पर सोनम, शेयर, धर्म और अंधविश्वास में व्यस्त रहता। किसी के पीछे पड़ जाता है तो फिर उसे ‘धोकर’ ही मानता हैं। चैनल जो चिल्लाकर धर्म-जाति की बातों से ऊपर नहीं आते। वहां मूल मुख्य मुद्दों पर बात-बहस नहीं होती। अपुन इस चिंतन में ही था कि चेखोव का एक किस्सा पढ़ने को मिला। अपुन यहां खुल्लेआम कहना चाहता है कि अपुन को कम्युनिस्ट का ‘क’ भी नहीं आता। इसलिए अपुन को टुकड़े-टुकड़े गेंग का मेंबर नहीं बताने का। चेखोव साहित्यकार था, पुतिन के देश का। सालों पहले वह कह गया कि आदमी को उसके पसंद के ज्ञान के काम में लगा दो तो फिर वह परेशानी की बात भी नहीं करेगा। लगता है आजकल सभी को अपने ज्ञान और पसंद के कामों में लगा दिया गया हैं। या यूं कहिए की जिन्हें समस्या का ज्ञान होता था उन्हें वहां से हटा दिया हैं। आप भी पढ़िए किस्सा-
दास्तान-ए-चेखोव
एक दिन तीन सजी-धजी महिलाएं चेखोव के यहां आई। चेखोव का कमरा कपड़ों की सरसराहट और तेज परफ्यूम की गंध से भर गया। महिलाएं बड़ें अदब से उनके सामने बैठ गई और राजनीति में गहरी दिलचस्पी का दिखावा करते हुए प्रश्न पूछने लगी- “अन्तोन पाव्लाविच, आपका क्या विचार है, युद्ध का अंत क्या होगा?”
चेखोव ने खांस कर गला साफ किया। कुछ देर सोचते रहें फिर गम्भीर और विनम्र स्वर में बोलें-“शायद शांति हो जाएगी”
“हां, हां, बेशक! पर जीत किसकी होंगी?”
“मेरे ख्याल में जो ताकतवर होंगा वहीं जीतेगा।”
“और ज्यादा ताकतवर कौन हैं?”- महिलाओं ने चट से पूछ लिया।
“वह जो अच्छा खाते हैं और ज्यादा पढ़ें लिखें हैं।”
“वाह,क्या पते की बात है।”-एक महिला खुशी से चिल्ला उठी।
“आपको कौन ज्यादा अच्छे लगते हैं?”-दूसरी महिला ने पूछा। चेखोव ने स्नेह भरी नजरों से उसकी ओर देखा और फिर विनम्र स्वर में बोले- “मुझे मार्मलेड (एक तरह का मुरब्बा जो फलों के रस और छिलकों से बनता है)अच्छा लगता है। आपको अच्छा लगता हैं?”
“बहुत”- एक बोली। “बड़ी प्यारी चीज हैं।”- दूसरी ने जोड़ा। फिर तीनों बड़े जोश से आपस में उसके बारे में बातें करने लगी। उन्हें मार्मलेड के बारे में जानकारियां भी बहुत थी। वे प्रसन्न थी कि उन्हें अपने दिमाग पर जोर नहीं डालना पड़ रहा था, दिखावा नहीं करना पड़ रहा था।
जाते समय उन्होंने अन्तोन पाव्लाविच चेखोव से वादा किया कि वे उनके लिए मार्मलेड भेजेंगी।
उनके जाने के बाद चेखोव हंसे और बोले हर आदमी को उसके पसंदीदा ज्ञान क्षेत्र में ही बात करने का अवसर देना चाहिए। इससे वह खुश रहता है।





