अग्नि आलोक
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मेरे प्यारे पुरुष…..

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मीना राजपूत (कोटा)

मेरे प्यारे पुरुष!
क्या तुम्हें याद है कि
शादी की शुरुआत में
मेरा शरीर
कितना कसा हुआ, सुन्दर
कितना चिकना और
मोहक था !
मैं अभी भी वही
सुन्दर महिला हूँ
जिसके साथ तुम ने
प्रेम किया था
जिसकी आँखें देख तुम
हमेशा कहते थे कि
तुम्हारी आँखों में
डूब जाना चाहता हूँ मैं…

फ़र्क इतना है कि
मैंने तुम्हें बच्चे दिये और
तुम्हारे वँश को
बढ़ाने में अपना
सहयोग दिया
उसकी क़ीमत
मेरी सुन्दरता और
अनुग्रहता का
नुकसान है!

अब मेरी बढ़ी हुई
चर्बी की वजह से
औऱ मेरे पेट पर
पड़ी धारियों के कारण
मुझ से शिकायत ना करो
और ना समझो कि
मेरा प्यार पहले जैसा
नहीं रहा.!

मेरे अन्दर
माँ की ममता का
एक गुण और आ गया
साथ ही आपकी फ़िक्र
तो हमेशा से थी और है
याद रखिये यह पेट
कभी गर्भगृह था
जिस को मैंने
नौ महीने तक
दर्द… थकान… और बजन…
के साथ गले लगाया
एक नये जीवन को
इस संसार में लायी!
(चेतना विकास मिशन)

Ramswaroop Mantri

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