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मेरी ‘जीवन अवधारणा’ और जीवनयात्रा

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डॉ. विकास मानव

 _जीवन क्या है ? मृत्यु क्या है ? आत्मा क्या है ? परमात्मा क्या है ? मुक्ति क्या है ? मोक्ष क्या है ? पुण्य क्या है ? पाप क्या है ?--ये सब दार्शनिक चिन्तन के विषय नहीं हैं, मनन के भी विषय नहीं हैं, बल्कि ये हैं-- सब अनुभव के विषय।_
   जो लोग इन विषयों पर विचार करते हैं, करते रहें, जन्म-जन्मान्तर तक करते रहें। कुछ भी ज्ञान प्राप्त होने वाला नहीं।

जन्म-मृत्यु, पुनर्जन्म, मुक्ति-मोक्ष आदि सब शब्द ही बने रहेंगे सदैव के लिए, अनुभव कभी नहीं बन सकेंगे। फिर भला क्या फायदा विचार ही करके ? विचार तो उनके सम्बन्ध में किया जाता है, जन्हें हम जानते हों।
  _लेकिन जो अज्ञात है, उसके सम्बन्ध में कोई विचार नहीं हो सकता। हम उसी विषय पर सोच-विचार कर सकते हैं जिसे हम जानते हैं, समझते भी हैं।_
  क्या हम कभी यह सोच सकते हैं कि जिसे हम जानते तक नहीं, उसे सोचेंगे भला कैसे ? उसकी कल्पना भी भला कैसे करेंगे हम ? विचार को छोड़िए, कल्पना भी नहीं की जा सकती। उसकी धारणा भी कैसे हो सकती है?
  _इसलिए शुरू से लेकर आज तक धार्मिकों ने और दार्शनिकों ने इन सब विषयों पर जो कुछ भी लिखा है और कहा है, उनका न कोई मूल्य है और न तो है कोई महत्व ही क्योंकि उन लोगों ने जो कुछ लिखा है और जो कुछ कहा है, वह सब सोच-सोच कर और अनुमान के आधार पर लिखा है, बोला है।_
  उनका आध्यात्मिक और दार्शनिक ज्ञान, ज्ञान नहीं है--एक सोच है, अनुमान मात्र है।

   इन सभी विषयों पर योग ने जो कुछ भी लिखा है, वह सब अनुमान पर नहीं, अनुभवों और अनुभूतियों पर आधारित है। इसके अतिरिक्त जो कुछ भी है, वह सब शब्द-जाल है, शब्दों का माया-जाल है।
  _विचारों का हेर-फेर है और है कोरी कल्पना क्योंकि जो योग कहता है, वह जीवन की सच्चाई है, जीवन का अनुभव है। हम सब लोग विचारों में जीवित हैं, अनुभव में नहीं। अनुभव में जीता है केवल और केवल योगी।_
    योग में जीना एक कला है और वह कला यह है कि संसार, समाज और परिवार से अपने आप को भौतिक दृष्टि से पूर्णरूप से अलग कर लीजिए और जुड़ जाइये केवल अपने आप से। मेरी इस क्षेत्र में सफलता का यही रहस्य है।
   _जीवन के प्रारम्भ काल से अपने आपको अलग कर लिया। न बाहर से कोई नाता-रिश्ता और न तो भीतर से ही। जुड़ गया अपने-आप से और अपनी आत्मा से। न मैं संसार का हूँ और न तो संसार ही मेरा है।_
     वैसे यदि देखा जाय तो मानव जीवन है ही क्या ? जन्म से लेकर मृत्यु पर्यन्त जीवन की सारी कथा दुःख की, कष्ट की, पीड़ा की, चिन्ता की और रोने-कलपने की कथा है।
   _जीवन की लम्बी यात्रा में एक पल के लिए भी सुख नहीं मिलता। अन्त में मृत्यु सामने खड़ी दिख जाती है। जीवन का समापन हो जाता है हमेशा-हमेशा के लिए मृत्यु की गोद में।_
  मेरी भी जीवन-कथा ऐसी ही हो--यह मैं नहीं चाहता था। मैं स्वयम् को लिखना चाहता था और लिखा भी. जो व्यक्ति संसार के संघर्ष के बीच तटस्थ रहा हो और रहा हो शांत, जो व्यक्ति जीवन के सारे उपद्रवों के मध्य निर्लिप्त रहा हो, निर्विकार रहा हो ओर रहा हो अनासक्त, वह व्यक्ति क्या भीड़ की भेड़ हो सकता है ? कदापि नहीं.
 _ऐसी ही है मेरी जीवनयात्रा। जो समग्र भाव से संसार में रहता है, केवल उसी की आत्मा पवित्र समझी जाती है और जिसकी आत्मा पवित्र है, वही परमात्मा के भी निकट है।_

(मनोचिकित्सक एवं ध्यानप्रशिक्षक लेखक चेतना विकास मिशन के निदेशक हैं.)

Ramswaroop Mantri

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