(सम्मान समारोह में वक्तव्य)
(स्व.डॉ. मंगल मेहता मालवा अंचल के ख्यात लेखक रहे। समाजवादी विचारधारा से जुड़े रहे। दशपुर जनपद संस्कृति,मौन मुखर, सरपंच जैसी पुस्तकों के सम्पादक। भगवान पार्श्वनाथ पर लिखे उपन्यास आत्मरथी के लेखक का इस 31 अक्टूबर को 92वां जन्मदिन है। इस अवसर पर कभी सम्मान समारोह में दिए गए उनके भाषण को यहां प्रस्तुत कर रहे हैं। जो लेखक और उसकी रचनाओं को समझने में सहायक होगा। यह डॉ.मंगल मेहता की कहानियां भाग-5 से साभार लिया है।जो पीडीएफ फार्मेट में उनके इस जन्मदिन पर उपलब्ध कराई जाएगी।-सम्पादक)
-डॉ.मंगल मेहता
व्यक्ति, लेखक, कवि, साहित्यकार समाज की एक इकाई है। उसे समाज के बीच रहना होता है। समाज को समझना उसके लिए जरूरी होता। समाज मृतप्रायः कभी नहीं होता। उसमें पारंपरिक और नवीन विचारधाराओं का प्रभाव दिखाई देता रहता है। इन भावधाराओं को कोई किस रूप में ग्रहण करता है और अपनी प्रतिक्रिया की अभिव्यक्ति करता है- यही महत्वपूर्ण है।
समाजवादी विचारधारा का प्रभाव पड़ा। एक रियासत के जागीरदार के गांव (जीरन) में जन्म हुआ, पला, बढ़ा। फिर एक सक्रिय, आदर्शवादी, लगनशील राजनीतिक, सामाजिक कार्यकर्ता के संपर्क में आया। इसने इस विचारधारा को और पुष्ट किया- दूसरों का हक न छीनना। सहयोग, सद्भाव के लिए सदैव प्रयत्नशील रहना। समानता के लिए प्रयत्नशील रहना। प्रत्येक व्यक्ति को विकास के लिए समान अवसर मिलना जरूरी है। हर एक व्यक्ति में कोई न कोई गुण, विशेषता होती ही है। उसके महत्व को कभी न नकारना समाज के हित में है। नेतृत्व यदि इसका लाभ देश को नहीं देता तो इससे देश को ही नुकसान है। पहले यह खाई कम मालूम पड़ती है पर धीरे-धीरे पता लगता है कितनी चौड़ी हो गई, कितनी भयावह हो गई और तब समझ पाते हैं- एकता का संकट।
इस मूलभूत विचार ने दृष्टि प्रदान की। इसी आधारभूमि पर कहानियां लिखी, रेखाचित्र लिखे, शब्दचित्र लिखे, व्यंग भी लिखे पर व्यक्ति को ओछा नहीं माना। ‘मैं’ शैली का चाहे प्रयोग किया हो- प्रभाव की दृष्टि से पर अपने पर केंद्रित करके ही नहीं लिखा। आत्ममुग्धता- नारसिज्म से पीड़ित कभी नहीं रहा। भावुकता व्यक्ति के जीवन का एक पक्ष है पर सोच, विचार, तर्क को नहीं छोड़ा जा सकता इसका भी ध्यान रखा।
मामा बालेश्वर दयाल की जीवनी लिखने(शब्द गायब)… स्पष्ट है। इसमें ऐतिहासिक परिपेक्ष में कैसे एक व्यक्ति समाज की समस्याओं से संघर्ष करता आगे बढ़ता चला है। अकेला और अकेला कि फिर भीड़ उसके पीछे आ जुटती हैं। भीड़ मनोविज्ञान से वह प्रभावित नहीं होता। प्रलोभन उसे पराजित नहीं कर पाते, सरकार अपने दायरे में उसे घेर नहीं पाती। आज भी वह अकेला अपने रास्ते पर चलता दिखाई देता है।
लेखक कहीं भी अंधश्रद्धा से जकड़ा नहीं है। तटस्थ निर्ममता की सीमा तक।
भाषा में परंपरा को छोड़ा। छोटे-छोटे वाक्य, क्रिया हीन वाक्य। प्रयत्न यह किया है सजीव चित्रण हो, प्रभावपूर्ण चित्रण हो। सफलता कहां तक मिली यह पाठको पर छोड़ देता हूं।
दशपुर आंचल की सांस्कृतिक निधियां सदैव से अनुप्राणित करती रही। किले, खंडहर, मंदिर, पुरानी मूर्तियां, शिलालेख-किसकी मोहकता अपना जादू नहीं चलती रही पर यहां भी भावुकता में नहीं बहा। अतिशयोक्ति में बात नहीं की। ‘दशपुर जनपद संस्कृति’ का संपादन किया। कितने रोडे अटकाए गये, किसने लंगी लगाई, टांगे खींची, अब यह सब बताना निरर्थक है। उस समय भी जानकारी थी कि यही अंतिम पड़ाव नहीं है। यह तो मात्र पहला डग मात्र है- डगमगाता हुआ। इसके अलावा कुछ नहीं इसलिए अपनी जाने से मैं लंगी लगाने में, टांग खींचने में आज भी विश्वास नहीं करता। अंजाने ऐसा हो जाए तो प्रायश्चित करने में भी अपनी हेठी नहीं मानता।
सांस्कृतिक निधियों के प्रति गौरव का अनुभव तो हो पर अतीत का मोह हम पर इतना हावी न हो जाए कि वह वर्तमान को भुला बैठे और बार-बार अतीत को ही जीवित करने के लिए सोचता रहे। पुरातत्व संबंधी मेरा लेखन इस कसौटी पर कहां तक खरा उतरता है। उस लेखन पर वैज्ञानिकता, तटस्थता को महत्व दिया गया है या नहीं यह भी पाठकों पर छोडता हूं।
दशपुर अंचल की सशक्त कविताओं का संकलन ‘मौन-मुखर’ का संपादन किया। सारे देश के पत्रों में समीक्षा छपी थी। पांचेक देश के कवियों ने इसकी प्रशंसा भी की थी। यह यूरोप में भी गया। इस क्षेत्र के कहानीकारों का एक संकलन भी तैयार किया था पर प्रकाशकों के छल के कारण छप नहीं पाया।
कहानी आज भी लिखता रहा हूं। छपी भी है। इनकी संख्या भी कम नहीं है। करीब तीस तो ऐसी है जिन्हें नकारा जाना संभव नहीं होगा। कथ्य भी-शिल्प भी-भाषा भी है, चरित्र भी है, प्रयोग भी है, और प्रभाव भी है।
कहानी पर अध्ययन किया और शोध कार्य इसी पर किया। कार्य में मेहनत भी की। यह(शोध) छपा भी है। पहली लघुकथा कानपुर से छपी थी 1951 में। बड़ी कहानी ‘छक्का पंजा’ 1953 में इंदौर से छपी थी।
कहानी पर 65-66 में माया में कहानी लेखकों के विचार छप रहे थे। उसमें मेरे विचार भी छपे थे।
‘हरिभाऊ अभिनंदन ग्रंथ’ में दो लेख छपे थे। उसका एक लेख बेल्जियम से भी छपा था। कुछ लेखो के अनुवाद भी हुए।
दशपुर अंचल के सामाजिक जीवन, आर्थिक जीवन पर ‘सरपंच’ उपन्यास सहकारी रूप से (लिखवा) संपादित किया था। इसकी प्रशंसा की गई। यह ‘नवभारत’ में धारावाहिक रूप से छपा फिर ‘अक्षर’ प्रकाशन से।
फिर ‘कराहता धान कटोरा’, ‘मालजादी’ उपन्यास छपे। इन पर मैं अभी कुछ नहीं कहूंगा। पहला लिखा उपन्यास ‘चलनी में टिका जल’ छपना शेष है।
व्यंग भी लिखें। कई छद्म नामों से लिखा। कई स्तंभों में।
इस अंचल की बोली मालवी भाषा पर भी काम किया। आक्षेप था कि मालवी का गद्य नहीं है। इसके लिए क्षेत्र के विद्वानों के सहयोग से एक सार्थक प्रयत्न भी प्रस्तुत किया- ‘मालवी गद्य’।
चित्रकला के प्रति कभी रुचि रही। पर वह रुचि मात्र ही रही।
मंदसौर जिले के गांवों का मनोवैज्ञानिक अध्ययन किया था जो ‘गांव मन एक अध्ययन’ (शीर्षक)से छपी भी। इसी प्रकार इसके बांछड़ा समुदाय का भी अध्ययन किया था। नवभारत टाइम्स में 1972 में एक लेख छपा था इस पर। जिले के उद्योगों पर भी लिखा- कलम उद्योग, छपाई उद्योग, बांधनी वगैरा-वगैरा।
अनुवाद भी किए थे। अमेरिकी कवि एमिली डिकिंसन की कविताओं का अनुवाद। करीब दस कविताएं अनुवादित रूप में कानपुर के ‘विद्रोही भारत’ में छपी होगी। लुहसूं की कहानियों का अनुवाद भी किया था। कुछ भेंट वार्ताएं भी प्रकाशित हुई।
प्रत्येक कवि की भांति मैंने भी किशोरावस्था में कविताएं लिखी।(तब) ‘विक्रम’ में छपी। कविताओं में प्रकृति चित्रण को अपने तरीके से व्यक्त किया। श्री रामविलास शर्मा या श्री नईम से भिन्न। उसमें कवि की अनुभूतियां है। स्थिरता के स्थान पर चेतनता है। कहना चाहिए जीवंतता है। (‘जून एक जून’- कविता का पठन)
कविताओं में बिंबात्मकता को महत्व दिया है और बिम्ब के साथ मन: स्थिति भी जुड़ गई है यथा-(‘थिर रहा चांदनी’- कविता का पठन)
प्रतीक को भी अपनी रीति से प्रयोग किया है यथा आसमान को बड़ेपन, नेतापन, खोखलेपन के प्रतीक के रूप में प्रयोग किया और धीरे-धीरे तीनों ही अर्थ खुलते जाते हैं यह कविता है- ‘आसमान’ जो ‘वीणा’ में प्रकाशित हुई।(‘आसमान’ -कविता का पठन)
पूर्वदीप्ति, चेतनप्रभाव आदि का प्रयोग किया है। संभव है इस कारण तत्काल समझ में आने में कठिनाई आती हो। यही नहीं कविता का अपना टोन भी होता है और वह भी अभिव्यक्ति में बहुत सहायता करता है। मेरी एक कविता- ‘उजाले में उजाले हो गए’ (धारा-उपधारा संग्रह) में दो-तीन टोन है । यदि आप इन्हें समझ लेते हैं तो पूरी कविता के कथ्य को समझने में कोई रुकावट नहीं होती।
चित्रकला का प्रभाव भी मेरी कविता पर पड़ा है। अनुभूतिजन्य एक चित्र देखिये- (‘पीपल गाछ’- का पठन)
दुरुहता का कारण एक यह भी है कि शब्दों के माध्यम से मन:स्थिति तक पहुंचाने का यत्न किया जाने लगता है। पूर्वदीप्ति, चेतनप्रवाह का पहले उल्लेख किया जा चुका है। एक कविता ‘गाथा’ इसका उदाहरण है।
कविता में भाषा को लेकर नए-नए प्रयोग किए हैं। मुहावरों को तोड़कर भिन्न रूप से प्रयोग कर अपनी रीति का प्रयोग किया है। मालवी बोली के शब्दों का प्रयोग किया है। कविता में लयात्मकता लाने का प्रयत्न किया है। उसे गद्य नहीं बनने दिया। हर कविता में एक विचार और चिंतन दिया है। हर कविता में यह बात मिलेगी। अस्तित्ववाद का प्रभाव दिखाती एक कविता प्रस्तुत है- (‘बहा क्षण’- का पठन)
आजकल वर्तमान परीस्थिति का विश्लेषणात्मक अभिव्यक्ति का प्रयोग(कविता में) कर रहा हूं जो ‘डिम्पल’ में प्रति माह छप रही है। आशा है पूरे वर्ष छपती रहेगी। इसमें कविता के तत्वों को कहीं भी आघात पहुंचाने का यत्न नहीं हुआ। यह है मेरी कविता यात्रा।
आप सोचे मैं कहां तक असफल रहा या सफल भी हुआ।
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