भारतीय जनता पार्टी के मैहर से विधायक नारायण त्रिपाठी ने विंध्य प्रदेश बनाने का संघर्ष छेड़ा तो प्रदेश की राजनीति में उबाल आ गया था। हालांकि त्रिपाठी इस मांग पर बीजेपी की प्रदेश अध्यक्ष वीडी शर्मा ने उन्हें बुलाकर पार्टी की लाइन से हटकर कोई बात नहीं करने की हिदायत जरूर दी थी। लेकिन इसके बावजूद भी नारायण त्रिपाठी ने अलग विंध्य प्रदेश की मांग को लेकर संघर्ष करने की तैयारी कर ली है। वे पार्टी लाइन से हटकर कुछ दिनों से अलग अलग क्षेत्रों में जाकर समर्थन जुटाने में लगे हैं। हाल ही में उन्होंने सतना जिले के में सभा की और कहा पार्टी छोड़कर व्यक्ति प्रमोशन चाहता है। हम सपा में थे और कांग्रेस में गए तो प्रमोशन मिला। कांग्रेस से भाजपा में आए तो प्रमोशन मिला। ज्ञात रहे एक नवंबर 1956 को मध्य प्रदेश का गठन होने से पहले विंध्य अलग प्रदेश था। यही वजह है कि विंध्य प्रदेश की मांग समय समय पर उठती रही है। पूर्व विस अध्यक्ष श्रीनिवास तिवारी भी अलग प्रदेश बनाए जाने के पक्षधर थे उन्होंने विंध्य प्रदेश की मांग को लेकर विधानसभा में एक राजनैतिक प्रस्ताव भी रखा था। जिसमें उन्होंने कहा था कि मध्यप्रदेश और उत्तरप्रदेश के विंध्य और बुंदेलखंड क्षेत्र को मिलाकर अलग विंध्य प्रदेश बनाया जाना चाहिए।
भाजपा ने निकाल लिया असंतोष को ठंडा करने का रास्ता
मप्र भाजपा में असंतुष्ट नेताओं की लंबी फेहरिस्त है। पहले मंत्रिमंडल विस्तार में स्थान ना मिल पाने और बाद में प्रदेश कार्यकारिणी से भी बाहर रखे जाने की वजह से कई वरिष्ठ नेता असंतुष्ट चल रहे हैं। उनका उनके व्यवहार से आए दिन झलक जाता है कि वह नाराज हैं। वे अब भी मंत्री बनने का इंतजार कर रहे है। इनमें सिंधिया समर्थक नेता भी शामिल है। अब भाजपा ने इन नेताओं को संतुष्ट करने का प्लान तैयार किया है। इसके लिए प्रदेश में को-ऑपरेटिव सोसाइटी संशोधन लागू कर दिया गया है। सूत्रों की मानें तो सरकार असंतुष्ट नेताओं को संतुष्ट करने के लिए मंत्री का दर्जा देगी। दरअसल कई बार विधायक रह चुके पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को अब तक सत्ता और संगठन में कोई पद नहीं मिल सका। इससे उनकी नाराजगी बढ़ गई। प्रदेश में फिलहाल 38 जिला कोऑपरेटिव बैंक है। इनमें से 34 में अध्यक्ष पद पर सांसद-विधायकों को एडजस्ट किया जा सकता है। बता दें कि सांसद-विधायक पहले भी इन बैंकों के सदस्य होते थे, लेकिन सरकार ने इस एक्ट में संशोधन करते हुए इस प्रावधान को हटा दिया था।
भवन अनुज्ञा को लेकर बिल्डरों और कॉलोनाइजर्स का खेल होगा खत्म
शासन द्वारा मध्यप्रदेश भूमि विकास नियम 2012 के नियम 6 के उप नियम (3) में संशोधन किया गया है। इसके तहत अब बिल्डरों और कॉलोनाइजर स्कोर 300 वर्ग मीटर मीटर तक के प्लाट पर मकान बनाने के लिए भवन अनुज्ञा की अनुमति नगर निगम से लेनी अनिवार्य कर दी गई है। पंजीकृत वास्तुविद और इंजीनियरों के जरिए जारी की गई भवन अनुज्ञा अब मान्य नहीं होगी। जबकि आम लोगों को 300 वर्ग मीटर पर मकान बनाने के लिए पंजीकृत वास्तु और स्ट्रक्चरल इंजीनियरों के जरिए जारी की गई भवन अनुज्ञा वैध मानी जाएगी। ऐसा नियम लागू हो जाने की वजह से अब बिल्डर कॉलोनाइजर इस तरह की भवन अनुज्ञा लेकर एफएआर और स्टांप शुल्क में कोई खेल नहीं कर पाएंगे। बता दें कि पूर्व में रेरा भी इस मामले में आपत्ती उठा चुका था।
कांग्रेस विधायकों को दे सकती है महापौर का टिकट
प्रदेश कांग्रेस में नगरीय निकाय चुनाव को लेकर तैयारियां जोरों पर है। इस बीच पूर्व मंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सज्जन सिंह वर्मा ने कहा है कि कांग्रेस विधायकों को महापौर का टिकट दे सकती है। उन्होंने कहा ऐसा कोई प्रतिबंध नहीं है कि नगर निगम में कोई विधायक और उनके परिवार को महापौर का टिकट कांग्रेस नहीं दे सकती है। यदि कोई विधायक है तो महापौर का चुनाव नहीं लड़ सकता है, ऐसा नहीं हैं। कुछ विधायक जिनमें दम है, जिनमें माद्दा है, उस जगह पर विधायकों को भी चुनाव लड़ाएंगे। साथ ही 75 से 80 प्रतिशत युवाओं को नगरीय निकाय चुनाव में मौका दिया जाएगा। कांग्रेस संगठन और नेताओं द्वारा नगर निगम चुनाव को लेकर लगातार बैठकें की जा रही हैं और नगरीय निकाय चुनाव की समीक्षा भी की जा रही है। वर्मा ने कहा कि निकाय चुनाव में दोनों नेताओं कमलनाथ और शिवराज की लोकप्रियता की परीक्षा नगरीय निकाय चुनाव में होगी।





