मेधा पाटकर और नर्मदा नव निर्माण अभियान के संघर्षशील साथियों के खिलाफ FIR की छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन कड़ी निन्दा करता है, और इस FIR के तत्काल निरस्तीकरण की मांग करता है। देशभर में जाने माने बुद्धिजीवियों, पत्रकारों, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को झूठे आरोपों में उलझाने की यह अगली कड़ी है, और इसी के कारण एक भय और आतंक का माहौल पैदा किया जा रहा है, जिसमें लोकतंत्र घुट रहा है और सरकार की तानाशाही को बढ़ावा मिल रहा है।
पिछले तीस वर्षों से मेधा जी और नर्मदा बचाओ आंदोलन ने विस्थापित लोगों के अधिकारों के लिए, महाराष्ट्र, गुजरात और मध्य प्रदेश के मजदूर, किसान, आदिवासी, मछुआरे समुदायों के साथ मिल कर निरंतर संघर्ष किया है। अपनी पूरी जिंदगी नर्मदा की घाटी में डूब में आ रही पूरी एक सभ्यता, असंख्य जिंदगियों को बचाने और उनके बेहतर पुनर्वास में लगा दी। नर्मदा बचाओ आंदोलन ने पूरे देश और पूरी दुनिया में विस्थापन और पुनर्वास की बहस शुरू की पर्यावरण और न्याय संगत विकास के मुद्दे को प्रमुखता से सामने लाया।
इन्ही संघर्षों के कारण देश विदेश में बड़े बांधों के दुष्प्रभावों पर अध्ययन हुआ जिस के दबाव में आकर विश्व बैंक ने भी इन बांधों में निवेश करने से मना कर दिया। नर्मदा घाटी के इस महत्वपूर्ण संघर्ष ने देश भर में हो रहे लोगों के विस्थापन को एक चुनौती दी, और ऐसे विकास के मॉडल पर सवाल खड़े किए, जिससे आदिवासी, ग्रामीण, वंचित समुदायों का विनाश हो रहा हो।
दर्ज FIR न तो नर्मदा घाटी के उस अन्याय पूर्ण विकास और दमन की दास्तां को बदल पाएगी और न उसके खिलाफ हुए ऐतिहासिक संघर्ष को बदनाम कर पाएगी।
मीडिया से प्राप्त जानकारी के अनुसार एक अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के सदस्य, प्रीतम राज बडोले ने बड़वानी थाने में मेधा पाटकर, रूमी जहांगीर, विजया चौहान, कैलाश अवास्या, मोहन पाटीदार, आशीष मंडलोई, केवलसिंह बसावे, संजय जोशी, श्याम पाटिल, सुनीति एसआर, नुरजी पदवी व केसव वासवे पर धोखाधड़ी की शिकायत दर्ज की है। यह सब नर्मदा नवनिर्माण अभियान के ट्रस्टी हैं, और इनमे से कई स्वयं विस्थापित परिवारों से हैं। इस प्रायोजित FIR में जिन ट्रस्टियों के विरुद्ध शिकायत की गई है, उनमें से आशीष मंडलोई का वर्ष 2012 में देहांत हो चुका है। और नूरजी पदवी वर्तमान ट्रस्टी नही हैं।
इससे पहले भी मेधा पाटकर पर ऐसे ही पैसों की हेरा फेरी के बेबुनियाद इल्जाम लगाए गए हैं, जिस को सुप्रीम कोर्ट ने 2007 में निरस्त कर शिकायतकर्ता पर ही अर्थदंड लगाया था। सीबीए का विश्वास है कि पूर्व के केस की तरह वर्तमान का केस भी द्वेषभावना से राजनैतिक उद्देश्यों के कारण लगाया गया है।
हाल ही में गुजरात के दंगो में न्याय की लड़ाई लड़ने वाली जुझारू वकील तीस्ता सीतलवाड़, और पूर्व डीजीपी आर बी श्रीकुमार की गिरफ्तारी, तथ्य शोधक मुहम्मद जुबैर की गिरफ्तारी, मानवाधिकार के अंतर्राष्ट्रीय संगठन एमनेस्टी और उनके मुख्य कार्यकर्ता आकार पटेल पर कई करोड़ों का अर्थदंड – ये सब दर्शाते हैं कि किस सुनियोजित तरीके से सरकार अपने आलोचकों को चुप करना चाहती है। हम अपनी आवाज़ ऊंची कर के निम्न मांगे करते हैं-
1. उक्त प्रीतम राज बड़ोले द्वारा दर्ज किये गए FIR को निरस्त किया जाए, और उस पर आगे कोई कार्यवाही नहीं कि जाए।
2. देशभर में सामाजिक और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के खिलाफ झूटे प्रकरणों के सिलसिले को बंद किया जाए। भीमा कोरेगांव केस, दिल्ली दंगो का केस, तीस्ता सीतलवाड़, आर बी श्रीकुमार, सिद्धिकी कप्पन, संजीव भट्ट, मोहम्मद ज़ुबैर इत्यादि राजनैतिक बंदियों को रिहा किया जाए।
3. देशभर में जो वयक्ति और संगठन, संविधान के भीतर रह कर सामाजिक, आर्थिक न्याय के लिए लड़ाई लड़ रहे हैं, उन पर दमनात्मक प्रहार बंद किये जायें। अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाना हमारा अधिकार ही नहीं, ज़िम्मेदारी भी है।
संयोजक मंडल सदस्य
छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन
सुदेश टेकाम मनीष कुंजाम बेला भाटिया नंदकुमार कश्यप विजय भाई शालिनी गेरा
रमाकांत बंजारे आलोक शुक्ला
जिला किसान संघ राजनांदगांव, छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा (मजदूर कार्यकर्त्ता समिति), आखिल भारतीय आदिवासी महासभा, जन स्वास्थ कर्मचारी यूनियन, भारत जन आन्दोलन, हसदेव अरण्य बचाओ संघर्ष समिति (कोरबा, सरगुजा), माटी (कांकेर), अखिल भारतीय किसान सभा (छत्तीसगढ़ राज्य समिति) छत्तीसगढ़ किसान सभा, किसान संघर्ष समिति (कुरूद) दलित आदिवासी मंच (सोनाखान), गाँव गणराज्य अभियान (सरगुजा) आदिवासी जन वन अधिकार मंच (कांकेर) सफाई कामगार यूनियन, मेहनतकश आवास अधिकार संघ (रायपुर) जशपुर जिला संघर्ष समिति, राष्ट्रीय आदिवासी विकास परिषद् (छत्तीसगढ़ इकाई, रायपुर) जशपुर विकास समिति, रिछारिया केम्पेन, भूमि बचाओ संघर्ष समिति (धरमजयगढ़)





