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*नरेटिव वैल्यू बन रहा है न्यूज़ मीडिया का मर्डरर*

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          प्रखर अरोड़ा

    सम्पादकों की कोशिश होती थी कि दंगों का समाचार छापते समय खबर इस तरह लिखी जाए कि सूचना पहुँच जाए लेकिन उसे पढ़ने वालों की भावनाओं को वह कम से कम भड़काए।। तब यह कोशिश होती थी कि कम से कम खबर के अन्दर किसी एक पक्ष को दोषी या निर्दोष दिखाने की प्रवृत्ति से यथासम्भव बचा जाए। रिपोर्टर चश्मदीद बनकर लिखे, जज बनकर न लिखे।

       अब सम्पादकों की कोशिश होती है कि खबर की हेडिंग ऐसी हो कि पढ़ने वाला पढ़ते ही भड़क जाए और इमोशनली ट्रिगर होकर वह खबर को शेयर, लाइक कमेंट करने लगे। अब सम्पादक की कोशिश होती है कि समाचार इस तरह प्रस्तुत किया जाए ताकि पढ़ने वाले को अखबार मालिक के मनचाहे समुदाय को पीड़ित और अनचाहे समुदाय को दोषी नजर आए। रिपोर्टर चश्मा पहनकर लिखे ताकि वह जज की तरह फैसला सुना सके।

मीडिया की समस्या यह है कि पहले जो बीमारी सर तक सीमित थी अब वो पाँव तक आ चुकी है। मीडिया सर से पाँव तक सड़ रहा है। कैसे, इसे नीचे के दो उदाहरण से समझें।

       ज्यादातर जगहों पर उम्मीद नहीं रहती लेकिन जिस एक जगह उम्मीद थी वहाँ के सम्पादक को कल एक मैसेज भेजा कि सर, शीर्षक भड़काऊ लग रहा है। सर ने उस मैसेज को सरासर इग्नोर कर दिया। खैर, उनकी ज्यादा गलती नहीं थी क्योंकि बाद में देखा कि उनकी कम्पनी की इंग्लिश न्यूजसाइट पर वही खबर उसी शीर्षक से चल रही थी।

     हिन्दी मीडिया में ऐसे सम्पादक शायद नहीं बचे हैं जो इंग्लिश वालों को सम्पादकीय सलाह देने की हिम्मत कर सकें। 

      बेहद अफसोस की बात है कि नए पत्रकार ये हुनर न जाने कैसे साल छह महीने में ही सीख जा रहे हैं। वो कोर्स के दौरान या नौकरी के पहले साल में ही मानने लगे हैं कि सूचनाओं को स्वादानुसार मोल्ड और फोल्ड करना ही उनका काम है। कहना न होगा, नवांकुरों की इस दुष्प्रवृत्ति का पिष्टपेषण करने के लिए काफी हद तक सोशलमीडिया के बाहुबली वरिष्ठ पत्रकार भी जिम्मेदार हैं। 

दिल्ली के एक प्रतिष्ठित मीडिया संस्थान से पिछले एक-डेढ़ दशक केवल एडिटर-इन-चीफ ही निकल रहे हैं। संस्थान कैसे चलन चाहिए से लेकर भारत सरकार कैसे चलनी चाहिए, तक उन्हें सबकुछ पता होता है लेकिन यह नहीं पता होता है कि खबर का इंट्रो कैसे लिखना चाहिए, इनवर्स पिरामिड में खबर कैसी लिखी जाती है इत्यादि।

      मानक वर्तनी और व्याकरण में भाषा लिखने की उम्मीद करना फासीवाद है, ये बात रोला बार्थ ने एडमिशन लेते ही उनके कान में बता दी थी। ये अलग बात है कि यदि दूसरा कोई टाइपोज भी कर दो तो वो उसे सूली पर न लटकाए जाने की शिकायत सोशलमीडिया पर करते पाए जाते हैं।  

     यदि कोई ओल्ड-स्कूल सम्पादक इन नवांकुरों को कुछ समझाना भी चाहे तो वह विफल हो जाता है कि क्योंकि सोशलमीडिया के बाहुबली की पोस्ट पढ़-पढ़कर मतवाले हो चुके नौजवानों को न्यूज सेंस या कॉपी को लेकर कुछ सलाह देना,  खुद को कुत्ते से कटवाने जैसा हो चुका है।

       मीडिया की नई पीढ़ी के लिए न्यूज वैल्यू से ज्यादा अहमियत नरेटिव वैल्यू की बन चुकी है। 

       सोशलमीडिया बाहुबलियों द्वारा विचारपोषित यह नई जमात ही पत्रकारिता का भविष्य है जिसे कई दर्जन मासूमों की मौत, सौ से ऊपर घायल, हजारों के पलायन की खबर से ज्यादा अर्जेंट न्यूज जंतर-मंतर पर एक डेढ़ महीने से जारी धरने से जुड़ी बिट-न्यूज लगती है! 

मीडिया जितना ही बुरा हाल मीडिया विश्लेषकों का है। सोशलमीडिया पर भी मीडिया की चिंता करने वाले अक्सर बड़ी-बड़ी समस्याओं पर विचार करते हैं। शीर्षक और/या कॉपी में मन्दिर-मस्जिद-चर्च जलाने की बात लिखने को लेकर वो ज्यादा चिंता नहींं करते। किस तरह की खबरें चुनी जा रही हैं इसपर वो चर्चा नहीं करते।   

      अगर वो चर्चा करें तो समझ लीजिए कि कोई संस्थान विशेष या सम्पादक विशेष या रिपोर्टर विशेष उनके निशाने पर है। वो अपने प्रिय संस्थान, सम्पादक या रिपोर्टर की ऐसी करतूतों को नजरअंदाज करते जाते हैं कि हर चीज पर वही नजर थोड़ी रखेंगे! वो भी मानव हैं, कोई दानव थोड़ी हैं। 

यह भी कहना चाहूँगा कि यह पोस्ट केवल पत्रकारों के लिए लिख रहा हूँ। गैर-पत्रकार इस पोस्ट के कमेंट बॉक्स में मजे न लें क्योंकि पत्रकारिता की दुर्गति का प्रमुख कारण वह मध्यवर्ग ही है जो हद दर्जे का स्वार्थी और अहंकारी है और चाहता है कि सारे पाप करने के बाद गुलजार के गीतों, गालिब की शायरी, पुरानी शराब, गलावटी कबाब का सेवन करते हुए गरीबों की दुर्दशा पर संवेदनशील चर्चा करके खुद को अतमानवीय अतिसंवेदनशील महामानव समझता रहे लेकिन वास्तविक जीवन में वह कम ही किसी नैतिक आदर्श के लिए खड़ा होता है!   

     मैं जिन मध्यवर्गीय पेशों से परिचित हूँ उनके निजी अनुभव को आधार पर कह सकता हूँ कि आज भी सबसे ज्यादा आदर्शवादी लोग मीडिया में काम करते हैं। कम से कम मेरी पीढ़ी के लिए तो यह बात पूरी तरह सच है। 

       हमारे समय का सामाजिक सच यही है कि बहुमत को नैतिकता और आदर्श की याद तभी आती है जब उसकी जात, जमात, जिला, मजहब, मुल्क, विचारधारा, पार्टी इत्यादि पर आँच आती है। यही कारण है कि जिन भी पुराने लेखकों का जीवन देखें तो वो ‘एकांतिक मुंशी’ की तरह काम करते नजर आते हैं। 

     यक़ीनन 21वीं सदी के शुरुआती दशक की हकीकत आने वाली पीढ़ियों को उस लेखक की लिखत में मिलेगा जो चुपचाप कहीं कुछ लिख रहा होगा। ऐंवें गैंवें छप रहा हो होगा या नहीं छप रहा होगा लेकिन वो खुद को या खुदा को हाजिर नाजिर मानकर पूरी ईमानदारी से अपने अनुभव कलमबन्द कर रहा होगा।

Ramswaroop Mantri

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