
मुनेश त्यागी
भारत की आजादी के महान स्वतंत्रता सेनानी नेताजी सुभाष चन्द्र बोस, सोवियत सेना से मिलने के लिए मंचूरिया जा रहे थे, तभी उनका हवाई जहाज दुर्घटनाग्रस्त हो गया, उन्हें बहुत सारी चोटें आईं और 19 अगस्त 1945 को उनकी मृत्यु हो गई। सुभाष चंद्र बोस 23 जनवरी 1897 को पैदा हुए थे। सुभाष चंद्र बोस बचपन से ही आजादी के स्वप्न द्रष्टा थे। वह ऐसे सपने देखते थे कि हमारा देश और समाज ऐसा हो कि जहां शोषण न हो, स्वार्थ वर्धन न हो, अन्याय को बनाए रखने के स्वप्न नहीं, बल्कि प्रगति के स्वप्न, जनसाधारण की सुख शांति के स्वप्न, स्वतंत्रता और हर राष्ट्र की आजादी के स्वप्न।
सुभाष चंद्र बोस की पत्नी का नाम एमिली शेंकल और उनकी पुत्री का नाम अनीता था। उनकी पत्नी ऑस्ट्रियावासी थी और वहीं पर उनकी बेटी का जन्म हुआ था। सुभाष चंद्र बोस महात्मा गांधी को अपना नेता समझते थे और आजादी को लेकर दोनों का एक ही उद्देश्य था कि भारत किसी भी तरह से आजाद हो।
गांधीजी अहिंसा और शांति के द्वारा इस आजादी को प्राप्त करना चाहते थे, तो सुभाष चंद्र बोस किसी भी तरह से हिंसा या अहिंसा या जंग के माध्यम से आजादी को हासिल करना चाहते थे, इसी उद्देश को लेकर उन्होंने इंडियन नेशनल आर्मी का गठन किया और अपने देशवासियों का आह्वान किया कि वह इस आर्मी में भर्ती हों और अंग्रेजों को सशस्त्र लड़ाई के माध्यम से यहां से मार भगाएं क्योंकि उनका मानना था कि तलवार का मुकाबला तलवार से ही किया जा सकता है।
अपने इसी उद्देश्य को लेकर उन्होंने इंडियन नेशनल आर्मी का गठन किया और इस आर्मी के माध्यम से अंग्रेजों को यहां से भगाने का काम शुरू किया। उनका काम आगे बढ़ता इससे पहले ही 19 अगस्त 1945 को एक विमान दुर्घटना में उनकी हत्या कर दी गई। इसके बाद आई एन ए के सिपाहियों की गिरफ्तारी हो जाती है उनकी रिहाई की मांग को लेकर भारतीय नौ सेना 20 फरवरी 1946 को विद्रोह कर देती है और उसके 78 जहाजों के नाविक अंग्रेजी झंडे यूनियन जैक को उतार कर फेंक देते हैं और उसके स्थान पर कांग्रेस, मुस्लिम लीग और कम्युनिस्ट पार्टी के झंडे लगा लेते हैं।
वे बगावत का ऐलान कर देते हैं और अंग्रेजों के आदेशों का पालन करने से मना कर देते हैं। यही से अंग्रेज शासन डर जाता है और भारत को आजाद करने का कार्यक्रम शुरू हो जाता है। इस प्रकार भारत को आजाद करने में भारतीय नौसेना का विद्रोह, सबसे ज्यादा बड़ा कारक है, उसकी भारत को आजाद करने में सबसे बड़ी भूमिका है।
सुभाष चंद्र बोस की विरासत बहुत अहम और महत्वपूर्ण है। सुभाष की विरासत संपूर्ण समर्पण और निरंतर बलिदान का आदर्श, समस्त भारतीयों की एकता का आदर्श है। सुभाष चंद्र बोस का कहना और मानना था कि भारत की भाषा “हिंदुस्तानी” भाषा होगी जो हिंदी और उर्दू का मिश्रण होगी।
सुभाष चंद्र बोस धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांतों पर आधारित सम्पूर्ण, स्वाधीन, समाजवादी, गणतंत्र की स्थापना चाहते थे। सुभाष चंद्र बोस की स्वतंत्रता का आदर्श था,,,, समाज की स्वतंत्रता, निर्धनों की स्वतंत्रता, सभी वर्गों की स्वतंत्रता, राजनीतिक स्वतंत्रता, धन का समान वितरण, सामाजिक असमानताओं का उन्मूलन, सांप्रदायिकता, जातिवाद तथा धार्मिक असहिष्णुता का समूल विनाश।
यह थे उनके आदर्श। उनके जीवन का एक ही अर्थ और एक ही उद्देश्य था और वह था कि हर तरह की गुलामी से आजादी, किसी भी तरह से आजादी,,,, शांति से या जंग से। अपने इस महान उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए ही उन्होंने अंग्रेजों से सशस्त्र संघर्ष के लिए, आजाद हिंद फौज का निर्माण किया था।
सुभाष चंद्र बोस छात्रों को राजनीति में लाने के हिमायती थे। वे चाहते थे कि छात्र राजनीति में हिस्सा लें, साम्राज्यवाद के खिलाफ उनकी सेना में शामिल हों और भारत को आजाद कराने के लिए आगे आएं और गांव गांव, झोपड़ियों झोपड़ियों और कारखानों में किसान मजदूरों को स्वतंत्रता के लिए, आजादी के लिए, जागृत करें, संगठित और एकजुट करें।
उनका कहना था कि हमें भारत को आजाद कराने के लिए “स्वतंत्रता की सेना” बनानी पड़ेगी और इसमें हर किसी को शामिल होना पड़ेगा। उनका मानना था कि हमें दासता, अन्याय और असमानता से कोई समझौता नहीं करना है तथा जनता को जागृत करने के लिए गहन तथा विस्तृत प्रचार और परिवर्तनकारी साहित्य की जरूरत है।
उनका कहना था कि स्वतंत्रता का जागरण करने के लिए हमें मिशनरी पैदा करने होंगे। हमारे मिशनरियों को किसान और मजदूरों के बीच जाना होगा, उन्हें संगठित करना होगा, उन्हें महिलाओं को जागृत करना होगा। चीन के छात्रों की तरह हमारे छात्रों को गांवों, कस्बों, कारखानों और खेतों में आजादी का संदेश ले जाना होगा, पूरे देश की जनता को एक कौने से दूसरे कौने तक, संगठित करना होगा। आजादी का रास्ता कांटों भरा रास्ता है मगर हमें इसी रास्ते पर चलना होगा।
आजादी के दीवाने और महान स्वतंत्रता सेनानी सुभाष चंद्र बोस का कहना था कि “इसमें मुझे तनिक भी संदेह नहीं है कि हमारी गरीबी, निरक्षरता और बीमारी का उन्मूलन और वैज्ञानिक उत्पादन और वितरण से संबंधित समस्याओं का प्रभावी समाधान “समाजवादी मार्ग” पर चलकर ही प्राप्त किया जा सकता है।” उन्होंने “तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आजादी दूंगा” का नारा दिया और “दिल्ली चलो” का नारा दिया। नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने ही गांधी जी को 1944 में “राष्ट्रपिता” की उपाधि प्रदान की थी और गांधी जी को “राष्ट्रपिता” के नाम से पुकारा था और उनका प्रसिद्ध नारा है “जय हिंद” जिसे इंकलाब जिंदाबाद की तरह हर मीटिंग में और अभिवादन के रूप में प्रयोग किया जाता है। यह नारा उनके सहयोगी आबिद हसन ने दिया था।
नेताजी सुभाष चंद्र बोस भारत में हिंदू मुस्लिम एकता के सबसे बड़े हामी और प्रवर्तक थे। अपने दोस्त आबिद हसन के साथ वह दक्षिणी अफ्रीका से जापान पहुंचे और जब वे तैवान से रूस के लिए जा रहे थे तो उनके साथ उनके प्रिय दोस्त हबीबुर्रहमान थे। उन्होंने जो अंतरिम सरकार बनाई थी उसमें आठ मंत्री थे, जिनमें चार हिंदू और चार मुसलमान थे। उनकी आजाद हिंद सेना के तीन जनरल थे ढिल्लों, सहगल और शाहनवाज।
नेताजी, महिलाओं की आजादी के जबरदस्त समर्थक थे। उनका मानना था कि जब तक इस देश की महिलाएं स्वतंत्र और आजाद नहीं होंगी, तब तक हमारा देश आजाद नहीं हो सकता, यह संपूर्ण रूप से आजाद नहीं हो सकता, इसलिए उन्होंने अपनी सेना में रानी झांसी रेजीमेंट बनाई थी। इसका नेतृत्व कैप्टन लक्ष्मी सहगल कर रही थीं।
आइए, युगों की दासता और गुलामी, शोषण, अन्याय और भेदभाव की जंजीरों को काटने के लिए, आजादी के लिए, समाजवादी और धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांतों पर आधारित समाज व्यवस्था कायम करने के लिए, नेताजी के बताये मार्ग पर अग्रसर हों। हमारा देश 1947 में आजाद हुआ मगर 75 साल की आजादी का इतिहास बता रहा है कि यह आजादी हासिल करने के बाद का भारत, सुभाष चंद्र बोस के स्वप्नों का भारत नहीं है। यह जो आजादी है, सुभाष चंद्र बोस के सपनों की आजादी नहीं है। हमें फिर से आजाद होना है, गुलामी से, शोषण से, अन्याय से, जुल्मों सितम से, जातिवाद से, सांप्रदायिकता से, गरीबी से, भुखमरी से, गरीबी से, भ्रष्टाचार से, अमीरी गरीबी से, ऊंच नीच और छोटे बड़े की मानसिकता से और धर्मांधता और अंधविश्वासों से।
हमें फिर से एक स्वतंत्रता संग्राम की शुरुआत करनी होगी और आजादी के दीवाने नेताजी सुभाष चंद्र बोस के सपनों का भारत बनाने की शुरुआत करनी होगी और यह काम किसानों मजदूरों की अगुवाई और उनकी एकता, उनका संगठन, उनकी सरकार और सत्ता ही कर सकती है। इसके अलावा पूंजीपति वर्ग और उसकी सरकार, आम जनता की, किसानों की, मजदूरों की, मेहनतकशों की, महिलाओं की, नौजवानों की और विद्यार्थियों की किसी भी समस्या का हल नहीं कर सकती। सुभाष चंद्र बोस का प्यारा नारा “जय हिंद”





