मुठ्ठीभर रक्तपिपासु पूंजीवादी परिवार की शह लेकर देश की सत्ता पे काबिज हो गए चंद फर्जी डिग्रीधारी और तड़ीपार अपराधी समूचे देश को विनाश के मुहाने पे लाकर खड़ा कर दिया है । अराजकता, दंगा, भ्रष्टाचार और जहालत का कोढ़ देश को भीतर ही भीतर सड़ाता जा रहा है । मगर जनता को भ्रमित करने के लिए धर्म के अफीम का निरंतर छिड़काव जारी है । तथाकथित बहुजन नेतागण जब परिवारवाद और पैसे बनाने की आपाधापी में अपने मूल लक्ष्य से भटक चुके हैं, तब ऐसे में भारत के डायवर्सिटी मैन एच. एल. दुसाध का एक जिम्मेदारी भरा कदम इस मरते हुए बहुजन राजनीति की संजीवनी है ।
इस चुनौतीपूर्ण घड़ी में एच. एल. दुसाध जैसा चट्टानी व्यक्तित्व और भीषण मेधाशक्ति का मालिक ही एक नई पार्टी का निर्माण कर मोदी एंड गैंग को पटखनी दे सकता है । इसमें जिन्हें किंचित भी संदेह हो ,वो मोदी एंड गैंग के समूचे सैकड़ों बुद्धिजीवी को अकेले एच. एल. दुसाध से एक बार राजनीतिक बहस करा कर देख लें, शंका का निवारण हो जायेगा ।
मगर फिर भी मोदी एंड गैंग को राजनीतिक पटखनी खाते देखना एक दिलचस्प मुकाबला होगा । राजनीति में मोदी के अथाह पैसों के स्रोत और उसके गुर्गों की मक्कारी और अनैतिक तरीकों से चुनाव लड़ने की शातिरपने को माननीय दुसाध किस प्रकार पटखनी दे पाएंगे ,ये वो ही जान सकते हैं । उनके राजनीतिक योजनाओं और रणनीतियों से रू ब रू होने का मुझे भी बेसब्री से इंतजार है ।
डायवर्सिटी मैन ऑफ इंडिया के इस शुरुआत को मैं भारत में गौरवशाली अशोक युग के वापसी के संकेत की तरह देखता हूं ।
डायवर्सिटी ही एकमात्र उपाय ।
यूरोप के तमाम देश इसी डायवर्सिटी के माध्यम से ही जनता के बीच न्याय को व्यवस्थित कर पाए ।अमेरिका आफर्मेटिव एक्शन के माध्यम से ही अपने विशाल प्रगति में अधिकतम नागरिकों की सेवा सुनिश्चित कर पाया है । बिना न्याय के मानव सभ्यता का स्थाई विकास संभव नहीं।
डायवर्सिटी ,जो संविधान सम्मत उपाय है , उसे बलपूर्वक राष्ट्र के सभी लाभ के पदों और अवसरों में बलपूर्वक लागू करना ही एकमात्र अहिंसक और न्यायिक उपाय है इस समाज और देश को भीषण त्रासदी से उबारने का ।
भारत के समाज में डायवर्सिटी की समझ और इसका सभी क्षेत्रों और स्तरों पर व्यापक प्रयोग की आवश्यकता को मैं माननीय दुसाध के पूर्व आलेखों को अखबार में पढ़कर ही समझ पाया। इसके पूर्व डॉ अंबेडकर से संबंधित इतिहास को पढ़ने के पश्चात मेरी डायवर्सिटी की दिशा में समझ विकसित हुई थी।अंबेडकर से संबंधित इतिहास की उन घटनाओं का जिक्र करना चाहूंगा ताकि मैं डायवर्सिटी से संबंधित आवश्यकताओं पे डॉ अम्बेडकर की गंभीरता को बतला सकूं।
19 मार्च 1955 को डॉ अनूप सिंह ,जो राज्य सभा एमपी थे,उन्होंने डॉक्टर अंबेडकर को उनका 1953 में राज्यसभा में दिया गया व्यक्तित्व याद दिलाया। उनकी उत्सुकता देखते हुए डॉक्टर अंबेडकर ने कुछ यूं जवाब दिया-
“भगवान के रहने के लिए संविधान रूपी मंदिर बनाया, परंतु इसके पहले कि उसमें भगवान आकर रहते उसमें राक्षस आकर रहने लगे।”
श्री वी के पी सिंह ने तब सवाल किया, ” मंदिर क्यों ध्वस्त करते हैं, आप असुरों को क्यों नहीं निकालते?”
बाबा साहब अंबेडकर ने जवाब दिया-
(शतपथ ब्राह्मण पुस्तक से देवासुर संग्राम की घटना का उल्लेख करते हुए।)
“आप ऐसा कर ही नहीं सकते और हमें वह शक्ति अभी आई नहीं है कि असुरों को भगा सके।”
(साभार – हरगोविंद विश्वकर्मा)
संविधान में समस्या नहीं बल्कि उन मनुवादी लोगों में हैं जो महत्वपूर्ण ओहदे पे तो है मगर संविधान को लागू रखने की उनके मन में ना ही कोई इच्छा है और ना ही कोई कोशिश करते हैं संविधान की मर्यादा को बनाए रखने की।
उपरोक्त बात को बेहतर समझने के लिए संविधान सभा में बाबा साहब के अंतिम व्यक्ति व 25 नवंबर, 1949 का एक अंश दुहराना चाहूंगा –
“हमें सिर्फ राजनीतिक लोकतंत्र से संतुष्ट नहीं होना चाहिए। हमें अपने राजनीतिक लोकतंत्र का सामाजिक लोकतंत्र बनाना चाहिए। राजनीतिक लोकतंत्र तब तक स्थाई नहीं हो सकता, जब तक इसकी बुनियाद में सामाजिक लोकतंत्र ना हो। इसकी शुरुआत इस तथ्य को मान्यता देकर की जा सकती है कि भारतीय समाज में दो चीजें सीधे से अनुपस्थित है। इनमें एक है- समानता | सामाजिक धरातल पर भारत में एक ऐसा समाज है जो श्रेणी पद और समानता पर आधारित है और आर्थिक धरातल पर हमारे समाज की हकीकत यह है कि इसमें एक तरफ कुछ लोग पास अकूत संपदा है। दूसरी तरफ बहुतेरे लोग निपट भुखमरी में जी रहे हैं। 26 जनवरी 1950 को हम एक अंतर्विरोध पूर्ण जीवन में प्रवेश करने जा रहे हैं। राजनीति में हमारे पास समानता होगी जबकि सामाजिक और आर्थिक जीवन में हमा समानता से ग्रस्त होने राजनीति में हम एक मनुष्य एक वोट एक वोट एक मूल वाले सिद्धांत को मान्यता दे चुके होंगे। सामाजिक और आर्थिक जीवन में तथा अपने सामाजिक आर्थिक ढांचे का अनुसरण करते हुए हम ‘ एक मनुष्य – एक मूल्य’ वाले सिद्धांत का निषेध कर रहे होंगे। ऐसा अंतर्विरोध भरा जीवन हम कब तक जीते रहेंगे? सामाजिक- आर्थिक जीवन में समानता का निषेध कब तक करते रहेंगे?
अगर हम ज्यादा दिनों तक इसे नकारते रहे तो इसका कुल नतीजा यह होगा कि हमारा राजनीतिक जनतंत्र ही संकट में पड़ जाएगा। इस अंतर्विरोध को हम जितनी जल्दी खत्म कर सके उतना अच्छा वरना असमानता के शिकार लोग राजनीतिक लोकतंत्र के इस ढांचे को ही उड़ा देंगे जिसे इस सभा ने इतनी मुश्किल से खड़ा किया। जिस दूसरी चीज का हमारे यहां सर्वथा अभाव है वह भ्रातृत्व ( fraternity) की भावना।
भ्रातृत्व के सिद्धांत का क्या अर्थ है? इसका अर्थ है सभी भारतीयों के बीच भाईचारे की भावना , बशर्ते आप भारतीयों को एक जन समुदाय मानते हो। यह एक ऐसा सिद्धांत है जो सामाजिक जीवन को एकता और एकजुटता प्रदान करता है। लेकिन इसे हासिल करना कठिन है। कितना कठिन है, इसका अंदाजा यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ अमेरिका के संदर्भ में जेम्स ब्राइस द्वारा लिखे गए ग्रंथ अमेरिकन कॉमनवेल्थ को पढ़कर लगाया जा सकता है। ब्राइस के ही शब्दों में-
कुछ साल पहले,अमेरिकन प्रोटेस्टेंट एपिस्कोपल चर्च के तीन वार्षिक सम्मेलन में पूजा पद्धति के बदलाव को लेकर चर्चा चल रही थी। इस दौरान यह जरूरी पाया गया कि छोटे वाक्यों वाली प्रार्थना में ऐसी प्रार्थना भी शामिल की जानी चाहिए जो समुचित जनता के लिए हो।
नई इंग्लैंड के प्रतिष्ठित धर्माचार्य ने इसके लिए शब्दों का प्रस्ताव रखा – ‘ ओ लॉर्ड ब्लेस आवर नेशन ( हे प्रभु हमारे राष्ट्र पर कृपा करो। ) ‘ , उस शाम को झटके में इसे स्वीकार कर लिया गया। लेकिन अगले दिन जब इसको पुनर्विचार के लिए लाया गया तो गृहस्थ ईसाइयों ने राष्ट्र पर कई तरह की आपत्तियां उठाई। उनका कहना था कि इस शब्द के जरिए राष्ट्रीय एकता और कुछ ज्यादा ही ठोस रूप दे दिया गया है। नतीजा यह हुआ कि प्रार्थना के इस शब्द को हटा दिया गया पुराने वक्त की जगह नया वाक्य आ गया और वह यह था- ‘ हे प्रभु इस संयुक्त राज्य पर कृपा करो।…’
देश के प्रथम प्रधानमंत्री,पंडित नेहरू ने देश की सभी सार्वजनिक और शासकीय संस्थाओं पर ब्राह्मण एवं तत्सम ऊंची जातियों का कब्जा करा दिया और इसके माध्यम से संविधान के बजाय मनुस्मृति पर अमल करना शुरू कर दिया। जिसकी वजह से आगे चलकर चौधरी चरण सिंह के साथ उनका विवाद भी हुआ था। न्यायपालिका पर उच्च वर्गों का संपूर्ण नियंत्रण , आरक्षण प्रतिनिधित्व प्रणाली के विरोध में षड्यंत्र,अंधाधुंध निजी करण। अनियंत्रित पूंजीवाद ,शिक्षा का निजीकरण व्यवसायीकरण और ब्राह्मणीकरण ,ओबीसी की जाति का जनगणना का विरोध आदि। इसी बात का जीवंत प्रमाण है कि शासक जातियों की आस्था संविधान में नहीं, बल्कि मनुस्मृति में इसलिए आजाद भारत में आज अनुसूचित जाति ,अनुसूचित जनजाति ,ओबीसी एवं धर्मांतरित अल्पसंख्यकों की समस्या भयानक रूप धारण कर चुकी है। इकोनामिक एंड पॉलीटिकल वीकली पत्रिका में छपी एक खबर के मुताबिक अभी हाल में 2015 में तमिलनाडु में आई बाढ़ में जो राहत बचाव कार्य किए गए, उनमें जमकर जातीय भेदभाव हुआ। दलितों के लिए जो भी सामग्री एनजीओ द्वारा वितरण। के लिए लाए गए थे। उनको सवर्णों द्वारा लूटा गया या फिर उनको वितरण होने से रोका गया। अब इस जहालत और इस गंदी मानसिकता को क्या कहें। यह तो उनको आतंकवादियों से भी गए गुजरे हैं जो गैर धर्म वाले को बेरहमी से मार देते हैं। आतंकी आक्रमण अपनी जगह है लेकिन जातिवाद से बड़ा क्रूर और अमानवीय अपराध और कोई नहीं। इस तरह की मानवीय त्रासदी में भी जातीय हिंसा लोग करने से नहीं रुकते। भारतीय संविधान के जन्म के समय से ही मनुवादी इसे नष्ट करने और विकृत करने का षड्यंत्र करते आ रहे हैं। उदाहरण के लिए क्रीमी लेयर सुप्रीम कोर्ट का शब्द नहीं है। क्रीमी लेयर को मधु लिमए ने सुप्रीम कोर्ट में एफिडेविट दाखिल कर पार्टी बनाकर लाया था। मधु लिमए सुप्रीम कोर्ट का वकील नहीं था बल्कि वह वकील ही नहीं था। मधु लिमए ने मंडल कमीशन में कहा कि मैं पार्टी बनना चाहता हूं। उसमें सुप्रीम कोर्ट में एफिडेविट दाखिल किया। सुप्रीम कोर्ट ने उसकी बात को स्वीकार कर लिया। मधु लिमए की बात को स्वीकार करने के बाद बॉम्बे हाई कोर्ट के वकील बी सी कामले ने भी पार्टी बनने के लिए सुप्रीम कोर्ट में एफिडेविट दाखिल किया। बी सी कामले तत्कालीन रिपब्लिक पार्टी के नेता थे। वह थोड़ा जिद्दी और और सत्यनिष्ठ व्यक्ति थे। सुप्रीम कोर्ट ने बी सी कामले को मंडल कमीशन में पार्टी बनने की एप्लीकेशन को रद्द कर दिया। मधु लिमए वकील नहीं था। फिर भी उसकी बात को सुप्रीम कोर्ट ने माना, लेकिन बी सी कामले हाई कोर्ट का वकील और जुडिशल का व्यक्ति होने के बावजूद उसके बाद को नहीं माना, क्योंकि न्यायपालिका को लगा कि बीसी कामले अंबेडकरवादी है, उसने अंबेडकर को पढ़ लिया होगा। अंबेडकर पहले ही ब्राह्मणवादियों को नंगा करके आये थे। यदि बी सी कामले को पार्टी बना दिया गया तो वह न्यायपालिका के अंदर बदमाश ब्राह्मन्वादियों को नंगा करने लगेंगे। इसलिए बी सी कामले को पार्टी बनाने से इंकार कर दिया। मधु लिमए ने अपने एप्लीकेशन में क्रीमी लेयर के फार्मूले को डालकर सुप्रीम कोर्ट को सजेस्ट किया। बाद में यही बात किताब में पब्लिश की गई। मधु लिमए ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि जैसे जैसे लोगों का इनकम बढ़ता जाएगा। वैसे-वैसे लोग आरक्षण से माइनस होते चले जाएंगे। यह स्कीम मधु लिमए ने सुप्रीम कोर्ट में पेश की सुप्रीम कोर्ट ने इसे स्वीकार करके क्रीमी लेयर को संविधान में लाया। इस तरह से ओबीसी के आरक्षण में क्रीमी लेयर लाकर न्यायपालिका ने ओबीसी के साथ धोखाधड़ी की। मनु वादियों ने न्यायपालिका को माध्यम बनाकर ऐसा किया।
आज भी न्यायपालिका की कॉलेजियम सिस्टम के माध्यम से हो रहे इस षड्यंत्र से कौन वाकिफ नहीं है ? कार्यपालिका केविभिन्न ऑफिसों में जो अन्याय का गंदा खेल खेला जा रहा है उससे कौन वंचित वर्ग का भारतीय प्रभावित ना हुआ होगा? 85% बहुजन समाज पीस रहा है 10% मनु वादियों के षड्यंत्र और उनके काले नेटवर्क के परिणाम स्वरूप।
सत्ता , आर्थिक स्रोतों और सभी प्रशासनिक पदों पे काबिज बहुजन समाज ही अपने समाज के साथ न्याय को सुनिश्चित कर सकता है। ब्राह्मणशाहियों से कोई उम्मीद नहीं है । डायवर्सिटी को व्यापक तरीके से लागू करने के पश्चात ही न्याय की संभावना रहती है वरना हमारा समाज पिसता रहेगा ।
आज भविष्य के प्रति हताशा का भयावह वातावरण है , जो इस सरकार में पहली बार युवाओं ने महसूस किया है।
इसमें कोई शक नहीं कि इस देश को निराशा और अन्धकार में लालची सत्ताधारियों ने धकेल दिया है, और मिडिया भी ,सच दिखने के बजाये ,सवाल करने के बजाये ,उन्ही के साथ है।
जब तथाकथित बहुजन नेता मोदी एंड गैंग के सामने अपने घुटने टेक चुके हैं, जनता को उनसे से कोई उम्मीद ना रही है। बहुजन राजनीति में शून्य आ गया है तब ऐसी विकट परिस्थिति में बहुजन समाज को मोदी और उसके गुर्गों के जंजाल से उबारने का रास्ता माननीय दुसाध अपने चट्टानी कंधों पे रख रहे हैं। माननीय दुसाध के इस साहसिक कदम का पूर्ण समर्थन करना सम्पूर्ण बहुजन समाज के सम्मान से जिंदा रहने की जरूरत है ।
नवगठित ‘बहुजन डायवर्सिटी पार्टी





