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निराला जयंती पर…समकालीन कवियों की नज़र में निराला

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*सुसंस्कृति परिहार
वसंत पंचमी उत्तर काल के अपराजेय कवि निराला का जन्मदिन है ।लेकिन वे उपेक्षित वसंत से रहकर भी युग कवि बने और अपनी विरासत हमें सौंप गये । भावुकतावश वसंत पर उन्होंने कई कविताएं लिखीं ।उनकी वे खिन्न मन:स्थिति की कविताएं हैं कुछ पंक्तियां देखें-

Suryakant Tripathi 'Nirala' - The Lucknow Observer


ठूंठ यह है आज
गई इसकी कला
गया है सकल काज
अब यह वसंत से होता नहीं अधीर ।

दूसरी ओर ,उनका लोक चेतना धर्मी व्यक्तित्व पहली बार ‘वह तोड़ती पत्थर’ में मुखर हुआ है ।इन दोनों निराला के काव्यरूपों को स्मरण करते हुए हम निराला को समझने का उपक्रम करते हैं उनके समकालीन लेखकों और कवियों की रचनाओं में जो उन्होंने निराला के व्यक्तित्व और कृतित्व पर लिखीं हैं ।
प्रसिद्ध आलोचक डा०रामविलास शर्मा ने उनके व्यक्तित्व को कुछ इस तरह देखा परखा और लिखा —
वह सहज विलंबित मंथर गति ,जिसको निहार गजराज लाज से राह छोड़ दे एक बार
काले लहराते बाल ,देव सा तनु विशाल
आर्यों का गर्वोन्नत प्रशस्त अविनीत भाल
झंकृत करती थी, जिसकी वाणी में अमोल
शारदा सरस वीणा के सार्थक सधे बोल ।
सुमित्रानंदन पंत ने उन्हें इस तरह जाना पहचाना और लिखा–
छंद बंध ध्रुव तोड़,फोड़ कर पर्वत कारा
अचल रूढ़ियों की,कवि तेरी कविता धारा

माखनलाल चतुर्वेदी ने निराला को निम्न शब्दों में अभिव्यक्त किया —
शूलों के रवि पथ पर
किसने आज प्राण का तेज संभाला
किसे रूढ़ियों की दासी ने
वैभव से दे देश निकाला
पागल और न जाने क्या-क्या
कह -कह कर
कर उसे प्रताड़ित
भरमाया पर जगने पाया

निश्चय एक प्रचंड निराला

बाबा नागार्जुन तो उनकी जीवंत छवि इस तरह प्रस्तुत करते हुए क्षोभ भी प्रकट करते हैं मानो हम ही उनकी मौत के जिम्मेवार हैं देखें—
बाल झबरे , दृष्टि पैनी फटी लुंगी नग्न तन
किंतु अंतर्दीप्त था आकाश सा उन्मुक्त मन
उसे मरने दिया हमने,रह गया घुटकर पवन
अब भले ही याद में करते रहो सौ सौ हवन

अमर बहादुर अमरेश ने निराला को लोहे की तरह बताया जो अपने जीवन मोर्चे को हंसते हुए जीत लेता है —
अब तक जो सुनता आया हूं
लोहे को मोर्चा खाता है
किंतु आज देखा है मैंने
अपने जीवन के मोर्चे को हंस हंस
लोहा खा जाता है
अगर नहीं खाता लोहा तो
ये युग के तूफान बताओ
किस की छाती में सो जाते
किस हिमगिरि में यह पौरुष था ।
श्रीकांत वर्मा
की नज़र में देखें
जागो फिर एक बार
गोकि अंधकार से लड़ते हम जा रहे
टकरा तूफानों से बढ़ते हम जा रहे
काट रहे बर्फ हम रुकी हुई नदियों का
पाट रहे हम नर्क बीती शत सदियों का
किंतु नए सैनिक हमें सेनानी चाहिए
हमें एक पथ दृष्टा तूफानी चाहिए
उठो गगन के तारे कर रहे पुकार
उठो फिर सम्हाल लो वाणी की पतवार
शासन कर रहे आज शेरों पर पुनः: सियार
जागो फिर एक बार
शमशेर बहादुर सिंह ने लिखा –
भूलकर जब राह
जब जब राह भटका मैं
तुम्ही झलके हे महाकवि

सघन तम की आंख बन मेरे लिए
अटल क्रोधित प्रकृति का विश्वास बन
मेरे लिए
जगत के उन्माद का परिचय लिए
झलके प्रमन तुम
हे महाकवि , सहज तम लघु एक जीवन में

उत्तराखंड के एक अनाम कवि ने उनके अप्रतिम साहसिक व्यक्तित्व पर कहा है –
सहो अमर कवि !अत्याचार सहो जीवन के
सहो धारा के कंटक ,निष्ठुर वज्र गगन के
कुपित देवता है तुम पर हे कवि ,गा गाकर
क्योंकि अमर करते करते तुम
दुख सुख मर्त्य भवन के कुपित दास हैं
तुम पर क्योंकि न तुमने शीश झुकाया
तुमने राग मुक्ति का गाया ।

डॉ रामविलास शर्मा ने एक जगह और निराला को कुछ इस तरह उद्धृत किया है
युग कवि अपराजेय निराला
जिसको मिला गरल का प्याला
ढहा और तन टूट चुका है
पर जिसका माथा ना झुका है
नीली नसें खींची है कैसी
मानचित्र की नदियों जैसी
शिथिल त्वचा ढल ढल है छाती
छाती लेकिन अभी संभाले थाती
और उठाएं विजय पताका
ये कवि है अपनी जनता का
भारत के इस रामराज्य पर
हे कवि तुम! साक्षात व्यंग्यशर

शिवमंगल सिंह सुमन ने निराला जी के प्रति अपनी काव्य पंक्तियां इस तरह समर्पित की हैं —
पर अभी तना है वक्ष
धमनियां रक्तमयी

छाती धड़ धड़
मांसल जंघा
उन्मुक्त सांस
दृढ़ अडिग चरण
आया यौवन तुम झूम उठे
झूमा मधुबन

उन्मद कन कन
सब रहे देखते लुटे लुटे
वृंदावन कुंजों में मनहर
फिर किसी विगत मूर्छा का स्वर
कल्पना लोक में लौट पड़ा मंथर मंथर

निराला ने एक ओर ‘राम की शक्ति पूजा’ जैसी कविता लिखकर रामायण कथा काव्य के क्षेत्र में नवीन उद्भावना और मौलिक काव्य चिंतन का परिचय दिया तो दूसरी ओर ‘पंत और पल्लव’ शीर्षक निबंध में पंत की अनुकरण की प्रवृत्ति पर चोट भी की। ज़ाहिर है निराला छाया युगीन कविताओं के साथ-साथ छाया युग के बाद की कविताओं में भी प्रासंगिक बने रहे ।निराला पर छायावादी संस्कार अंत तक नहीं रहे उनके परिवर्ती काव्य में प्रगतिवादी चेतना के विकास को देखकर ही नलिन विलोचन शर्मा को भी कहना पड़ा कि ‘निराला छायावाद के अभिमन्यु थे ‘लेकिन इस अंतर के साथ की चक्रव्यूह भेद करने के बाद भी वे पराजित नहीं हुए। कुकुरमुत्ता, झींगुर डटकर बोला,राजे ने रखवाली की जैसी कविताएं उन्हीं दिनों की हैं । जिनके ज़रिए व्यंग्य ,आक्रोश,और प्रतिशोध का स्वर प्रस्फुटित हुआ।इसी क्रम में निराला की कविता ‘महंगू महंगा रहा’ की व्याख्या करते हुए रामविलास शर्मा जी ने लिखा था -‘महंगू को विश्वास है कि जब बड़े आदमी अपनी धन-संपत्ति छोड़ेंगे तभी देश मुक्त होगा ।’ बाद में उन्होंने निराला के काव्य को देश को संकट में मुक्त करने का माध्यम बताया।निराला ने कविता पर अपने एक निबंध में लिखा है ‘सामाजिक चेतना संसार के भिन्न भिन्न देशों में भिन्न भिन्न प्रकार से आई है पर पूंजीवाद और रूढ़िवाद के ख़िलाफ़ सभी हैं।’निराला विद्रोही और क्रांतिकारी कवि हैं।
कुल मिलाकर निराला ने शिव की तरह हलाहल पचाकर साहित्य को अपनी रचनाओं के जरिए जो अमृत दिया है संभवतः इसीलिए वे महाप्राण,मृत्युंजय, अपराजेय विभूषणों से विभूषित हुए। उनका जीवन और कृतित्व युगों तक लेखकों को प्रेरणा देता रहेगा।ये बात उनके समकालीन लोगों द्वारा दी गई टिप्पणियों से भी सामने आती है।

Ramswaroop Mantri

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