कोई भी सपना छोटा नहीं होता। उस सपने को पूरा करने का जुनून होना चाहिए। ठीक वैसा जुनून जैसा उत्तर प्रदेश के छोटे से शहर चांदपुर में रहने वाले अरविंद कुमार मित्तल का था। उन्होंने साल 1998 में चांदपुर में चांदपुर पेपर नाम से एक कंपनी शुरू की। तब उनके पास सिर्फ 50 कर्मचारी थे। उनका सपना था कि वे स्थानीय संसाधनों का इस्तेमाल करके एक सफल बिजनेस खड़ा करें।
आज, यह कंपनी एक छोटे से क्राफ्ट पेपर बनाने वाली यूनिट से बढ़कर 20 एकड़ में फैली एक बड़ी कंपनी बन गई है। इसका टर्नओवर 220 करोड़ रुपये है। इसमें 400 से ज्यादा लोग काम करते हैं। यह कंपनी चांदपुर एंटरप्राइजेज लिमिटेड के नाम से रजिस्टर्ड है। यह हर दिन 140 टन पेपर बनाती है। इसमें एमजी पोस्टर पेपर और क्रोमो पेपर शामिल हैं।

कैसा कागज बनाती है कंपनी?
पेपर बनाने के बिजनेस में दो मुख्य हिस्से होते हैं। एक हिस्सा प्रकाशन के लिए पेपर बनाता है। दूसरा हिस्सा पैकेजिंग के लिए पेपर बनाता है, जिसे एमजी पेपर कहते हैं। यह पेपर इंडस्ट्रियल कामों में इस्तेमाल होता है। चांदपुर पेपर दूसरे तरह का पेपर यानी एमजी पेपर बनाने में माहिर है। यह सफेद पेपर बनाता है जो लगभग 35-40 GSM (ग्राम प्रति वर्ग मीटर) मोटा होता है। जीएसएम पेपर की मोटाई मापने की यूनिट है।
किन काम में इस्तेमाल होता है पेपर?
यह पेपर तंबाकू के पाउच, पाउच, जूतों को लपेटने, लेबल, साबुन को लपेटने, खाने की चीजों को लपेटने, बिलिंग में इस्तेमाल होने वाले थर्मल पेपर और टेक्सटाइल इंडस्ट्री में पैकेजिंग के लिए इस्तेमाल होता है।
कैसे काम करती है कंपनी?
चांदपुर पेपर पूरी तरह से पर्यावरण के अनुकूल तरीके से काम करता है। यह हर साल 35,000 टन बेकार पेपर को रीसायकल करता है। यह हर दिन 5 लाख लीटर पानी को सिंचाई के लिए साफ करता है। इसने अब तक 962 टन CO2 उत्सर्जन को कम किया है। CO2 एक गैस है जो पर्यावरण को नुकसान पहुंचाती है।
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कंपनी बेकार पेपर खरीदती है और उसे प्रोसेस करके पेपर बनाने के लिए अच्छी क्वालिटी का मटेरियल बनाती है। फैक्ट्री कोयले का इस्तेमाल नहीं करती है। इसके बजाय, यह दूसरे और पर्यावरण के अनुकूल ऊर्जा स्रोतों का इस्तेमाल करती है।
इसका एक मुख्य स्रोत है बगास। बगास गन्ने का रस निकालने के बाद बचा हुआ रेशेदार हिस्सा होता है। दूसरा स्रोत प्लाईवुड इंडस्ट्री से मिलने वाला बायोमास है। इसमें यूकेलिप्टस के पेड़ों की छोटी शाखाओं और पत्तियों को ईंधन के रूप में इस्तेमाल किया जाता है।
रिश्तेदार का मिला साथ
अमित मित्तल अपने बहनोई देवेश कुमार सिंघल के साथ मिलकर आज बिजनेस को संभालते हैं। अमित मार्केटिंग और फाइनेंस का काम देखते हैं, जबकि देवेश प्रोडक्शन का काम देखते हैं।
फैक्ट्री के शुरुआती दिन मुश्किलों से भरे थे। अमित बताते हैं कि दो बड़ी दिक्कतें थीं। एक तो फाइनेंस का इंतजाम करना था। आजकल हमें बहुत कम ब्याज दर पर लोन मिल जाता है, लेकिन उस समय यह बहुत ज्यादा था। इसलिए पैसे का इंतजाम करना एक बड़ी बात थी। इसके अलावा, यूपी में बिजली की सप्लाई अनियमित थी। यह एक और बड़ी मुश्किल थी जिसका हमने सामना किया।
कितना कारोबार?
कंपनी रीजनल डिस्ट्रीब्यूटर और कॉर्पोरेट क्लाइंट दोनों को सर्विस देती है। पूरे भारत में 27 डिस्ट्रीब्यूटर हैं जो इसके बिजनेस का 90% हिस्सा हैं। बाकी 10% कॉर्पोरेट कस्टमर से आता है। बिजनेस के बढ़ने पर अमित कहते हैं, ‘पहला साल अच्छा नहीं था। हमने 3 से 4 करोड़ रुपये पर क्लोज किया, लेकिन साल 2014 तक हम 45 करोड़ रुपये पर पहुंच गए और साल 2018 में हमने 100 करोड़ रुपये को पार कर लिया। आज हम 220 करोड़ रुपये के रेवेन्यू पर खड़े हैं।’




