अलीशा मुंबई
दूसरे विश्व युद्ध में जबरदस्त प्रोपैगैंडा चलता था नाज़ियों की तरफ से।
और उसका जवाब देने के लिए ब्रिटिश सरकार ने बीबीसी से बात की के वो चाहते हैं के बीबीसी भी उनकी तरफ से प्रोपेगंडा चलाये।
लेकिन बीबीसी ने मना कर दिया !
उनका कहना था के वो अपने ही देश के लोगों से झूठ नहीं बोलना चाहते।
कई मीटिंग्स हुई कैबिनेट के साथ बीबीसी की, और अंत में बीबीसी से कहा गया के ठीक है जैसा हो वैसा ही बताना बस ध्यान रहे के रिपोर्टिंग से जनता को नुक्सान नहीं होना चाहिए।
पूरे वर्ल्ड वॉर में बीबीसी ने एक एक खबर चलाई, ब्रिटैन को हो रहे नुक्सान की भी और नाज़ियों को हो रहे नुक्सान की भी। हाँ उन्होंने ये जरूर एडिट किया के अगर बोम्ब कहीं गिरा है तो कहाँ गिरा है, और लोग मरे हैं तो कितने मरे हैं।
लेकिन इसके बावजूद भी बीबीसी और ब्रिटिश सरकार के बीच लगातार तनातनी बनी रही ख़बरों को लेकर, उनके एक डायरेक्टर जनरल Frederick Ogilvie ने इस्तीफ़ा भी दिया था इसी तनातनी में।
बीबीसी की ब्राडकास्टिंग पूरे युद्ध में एक अहम् सपोर्ट सिस्टम के तौर पर रही allies के लिए। जर्मनी के इन्फ्लुएंस वाले सभी देशों में बीबीसी को सुनना बैन था, लेकिन फिर भी लोग चोरी छुपे सुनते थे, और जहां ज्यादा ही सख्ताई थी जैसे पोलैंड, वहाँ पर बीबीसी मोर्स कोड में खबरें प्रसारित करती थी।
फिर उन मोर्स कोड वाली ख़बरों को इललीगल लोकल अखबारों में छापा जाता था।
बीबीसी के पत्रकार भी इस पूरी जद्दोजहद में काफी नाराज़ रहे,
फ्रैंक गिलार्ड की रिपोर्ट को पूरी तरह सरकार ने सेंसर करने की कोशिश की जिसमे 3000 कनाडा के फौजियों के मरने की उन्होंने रिपोर्ट की थी। ये खबर लाने के लिए उन्हें काफी रिस्क लेने पड़े थे।
ऐसे ही 1945 में रिचर्ड डिम्ब्लेडे ने इस्तीफे की धमकी तक दे दी थी अगर उनकी होलोकॉस्ट की रिपोर्ट नहीं चलाई गयी तो। रिपोर्ट पर काफी बहस हुई लेकिन एक दिन बाद ही वो चला भी दी गयी थी।
सही मायने में दुसरे विश्व युद्ध ने ही बीबीसी को बीबीसी बनाया था।
जर्मनी के कब्ज़े के देशों में जहां हर कदम पर क्रांतिकारियों के लिए जान का खतरा रहता था वहाँ बीबीसी की खबर ही उनके लिए बाहर की दुनिया में खिड़की का काम करती थी, और इन ख़बरों पर विश्वास करके ही बहुत से जान पर खेल गए थे ये सोचकर के हाँ अभी भी लड़ाई बाकी है बेशक आज ग़ुलामी में क्यों ना रह रहे हों ।
बीबीसी का जनता में विश्वास स्थापित करने में इस वर्ल्ड वॉर का पूरा हाथ था। इंडिया में जबतक आजतक जैसे चैनल मशहूर नहीं हो गए थे तबतक बीबीसी ही ज्यादातर अधेड़ लोगों का फेवरेट चैनल रहा करता था 90s तक।
बीबीसी की तारीफ पूरी दुनिया में रही है उनकी बेबाक और सरकारों से ना दबते हुए रिपोर्टिंग करने के लिए जिसे के दुनियाभर के नेताओं ने अलग अलग समय पर सराहा है। खुद हमारे प्रधानमन्त्री मोदीजी ने इनकी विश्वसनीयता की काफी तारीफ की हुई है। (चेतना विकास मिशन).





